सिंहदरवार बड़ा पागलखाना है, जहां ६०१ महा पागल बदंर की तरह कुछ न कुछ करते रहते हैं

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बिम्मी शर्मा,बीरगंज , ७ दिसिम्बर | पागलखाने में रह रहे पागलों से समाज और देश को जितना खतरा नहीं है उतना खतरा बाहर चलते फिरते सामान्य से दिखने वाले असामान्य लोगों से है । यह लोग ही हैं जो दूसरे को पागल समझते हैं पर वह खुद ही पागल है । बेचारा पागल तो अपना ही हुलिया बिगाड़ता है, उसे अपना होश हवास नहीं रहता । यह बाहरी तौर पर सामान्य दिखने वाले लोगों का खुद का होश, हवास बिगड़ा रहता है और यही लोग देश और समाज का हुलिया बिगाड़ कर दूसरों को चैन से जीने नहीं देते ।
यह लोग वह बेचैन आत्मा है जो हर बात को उल्टा देखते हैं, समझते हैं और उल्टा ही समझाते भी है । इन्हें हर इंसान टेढ़ा लगता है पर यह खुद को एकदम सीधा मानते हैं । अपने से अलग तरह से जीने वाले और जीवन को अपने ही अंदाज में लेने वाले को यह पागल कहते है । इन्हें ईमानदारी से जीवन यापन करने वाला, नैतिकता और विवेक के साथ सोने उठने वाला हर इंसान पागल लगता है ।
जो पान खा कर इधर, उधर थुकता है, केला का छिलका सरे राह फेकंता है, शराब पी कर गटर में लुढक जाता है उसे यह सब न करने वाला सभ्य इंसान तनिक नहीं भाता है । और खुद के अपमानित होने या असभ्य कहलाने के डर से दूसरों को पागलपन का खिताब दे कर सुशोभित करता है । क्योंकि उसे मालूम है देश और समाज में इमानदार और नैतिकवान इंसानों की संख्या कम है । इसी लिए इन्हें दबा कर ही रखा जाना चाहिए । इसी लिए अपने से फरक विचार धारा वाले लोगों को झट से पागल कह कर बदनाम कर देता है । लेकिन वह यह नहीं जानता कि दूसरों की खिल्ली उड़ाने से वह खुद ही नीचे गिर रहा है । वह अपने आप को महा पागल सावित कर रहा है ।
इस समाज में वही इंसान जी सकता है जो दलाली करता है, उठाई गिरी करता है, एक छोटे से सर्फ के पैकेट में अपनी इमानदारी बेच देता है । जिसका बहुत सारे मर्द या ढेर सारी औरतों से सम्बन्ध है वही हर जगह अपना चारीत्रिक प्रमाण पत्र पेश कर के चरित्रवान बनता या बनती है । जो भ्रष्टाचार के दलदल में डूबा हुआ है वही इमान की बातें करता है । इंसान भीतर से जो नहीं है वही बाहर से बने और दिखने का प्रयत्न करता है । चेहरे और स्वभाव की लीपापोती में ही यह लोग जिदंगी बिता देते हैं । और सार्वजनिक मंचो पर दूसरों को स्वांग या नाटक न रचने का उपदेश देते हैं ।
कुछ महीने पहले एक आदमी ने अपनी बहन को पागल कह कर घर से निकाल दिया । बहन को जबरदस्ती पागल घोषित कर केयर सेटंर में भेज कर पैतृक संपति से उस को बेदखल करने के लिए यह प्लान बनाया था । मां को भी उसके खेत से आने वाले पैसे नहीं दिए और जमीन बेचने में अड़ंगा डाल कर दुख दिया । अब ईश्वर का चमत्कार ऐसा हुआ कि वह खुद ही पागल हो गया ।
जब यह समाज और इस में बसने वाले लोग दूसरों की भावना नहीं समझते । उसकी शारीरिक और मानसिक पीड़ा नहीं समझ पाते या उस पर मलहम नहीं लगाना चाहते हैं तब आराम से अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए उसे पागल करार कर देते है । किसी को पागल कह कर उसे सामाजिक रुप में प्रताडि़त करने में ज्यादातर अपने ही रिश्तेदार लगे रहते है । क्योंकि इस में उन का स्वार्थ छिपा होता है । अपने ही खून के रिश्ते या किसी अपने को पागल कह कर पागल खाना भेज कर उसे मटियामेट कर देने से उनकी संपति पर अपना एकाधिकार जो हो जाएगा ।
यहां सब एक दूसरे को पागल बनाने पर तुले हुए हंै । पहले खुद संघीयता मांगते है और जब देश को प्रदेश में बांटने का वक्त आता है तब खुद ही संघीयता का विरोध करने लगते है । पहले संविधान आधा अधूरा लाते हैं जब उसी आधे अधूरे संविधान को संशोधन कर पूरा करने के लिए सरकार निर्णय लेती है तब अपना रुतबा दिखाने के लिए विरोधी पार्टी खुद ही संविधान संसोधन का विरोध कर के देश का माहौल बिगाड़ देती है । चित भी इनकी और पट भी इनकी । यह मौका देख कर पागल भी बन जाते है और बाद में सामान्य स्थिति में आ कर देश के नागरिको कों अपनी नौटंकी से पागल बना देते है । देश में हर दिन कहीं न कहीं पागलपन का प्रदर्शन होता ही रहता है ।
कभी अपनी मांग पूरी करने के लिए सड़क में ही अपना पागलपन दिखाते हैं । कभी रेलिगं तोड़ते हंै, कभी चक्का जाम करते हैं तो कभी टायर जला कर अपने पागलपन का प्रदर्शन करते हैं । बेचारे जो सचमुच के पागल हैं या जिनकी मानसिक अवस्था खराब है । वह विभिन्न राजनीतिक पार्टियों का यह रौद्र रूप या पागलपन देख कर खुद ही डरे, सहमे रहते हैं । सडक की छाती पर राजनीतिक दल अपने राजनीतिक हित के लिए जो सनक करते हैं उसके सामने सचमुच का पागल भी शरमा जाएगा ।
देश का सब से बड़ा प्रशासनिक निकाय सिंह दरवार एक बड़ा पागलखाना है जहां पर ६०१ महा पागल बदंर की तरह कुछ न कुछ करतब करते ही रहते हैं । कभी भाषण के नाम पर अंट, शंट बड़बड़ाते हंै तो कभी देश और जनता के नाम पर गलत निर्णय कर के खून के आंसू रुलाते हैं । इन ६०१ महा पागलों को लगता है कि यही ठीक है और बांकी सब खराब । यह अपने ईगो के कारण देश का बंटवारा करने से भी नहीं हिचकते है । कहते है कि सचमुच के पागल को भूख बहुत लगती है । और हमारे देश के नेता, मंत्री और सासंद भी बहुत ही भुक्खड हैं । इसी लिए तो हरेक विकास योजना में यह मोटी रकम कमीशन के रूप में खा जाते हैं । देश के बजट का बड़ा हिस्सा यह खुद ही खा कर हजम कर लेते है । और अख्तियार से डर कर अपनी भूख और खाना को छुपा कर विदेशी बैंक में जमा करते है । तो देखा यह देश एक बहुत बड़ा पागलखाना है । कहीं राह चलते किसी राजनीतिक दल के किसी पागल नेता या कार्यकर्ता से न टकरा जाईएगा । क्या पता वह आपको भी कहीं पागल न कर दे । (व्यग्ंय)
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