सिएमसी भेलोर ! वन्स मोर !!मुकुन्द आचर्य

माता पिता जिस तरह अपनी कमजोर सन्तान को स्नेह का बडÞा सा हिस्सा जाने अनजाने, लोग मानें न मानें, दे बैठते हैं, ठीक उसी तरह भगवान भी अपने कमजोर-वकलोल भक्त के लिए सब कुछ करते हैं। अब मेरी ही बात लीजिए, भगवान ने सोचा, यह बज्रमर्ूख भक्त अपनी इच्छा से तो कुछ करेगा नहीं, इसके लिए मुझे ही कुछ करना होगा। ऐसा सोचकर कसकर एक लात भगवान ने मुझे जडÞ दी।
भगवान ने एक लात मुझे लगाई। हिमालय की गोद नेपाल से उछलकर मैं भारत तमिलनाडू के सिएमसी अस्पताल भैलोर में चारों खानें चित्त होकर गिर पडÞा। वैसे कहने के लिए कहा जा सकता है- मैं और मेरे कुछ अपने जन रक्सौल से सत्याग्रह के वातानुकूलित डब्बे में अच्छी तरह पैक होकर भारत की राजधानी दिल्ली पहुँचे। अनेक भेष बनाकर भीख माँगनेवाले, अनेक विचित्र आवाज के साथ खाद्य-अखाद्य सब कुछ बेचनेवाले, सुन्दरी बने हुए हिंजडÞे-सबों ने ऐसा समाँ बाँधा कि सत्याग्रह की धिमी चाल भी घोडÞी की दुलकी चाल की तरह भली लगी।
खिडÞकी से बाहर झांकने पर एक रहस्य खुला। भारत में खाद्यान्न क्यों इतना सस्ता है, यह प्रश्न मुझे कुपुत्र की तरह बार बार सालता रहता था। बाहर चारों ओर कहीं मक्के मतवालों की तरह झूम रहे थे, कही दूर दूर तक गेहूँ गर्मजोशी से गले मिलने के लिए गीत गा रहे थे, कहीं धान सबका ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे।
काठमांडू धुम्बाराही के एक सज्जन श्री नवराज घिमिरे ने हमारे छोटे से कुनबे को जमकर हँसाया। पता ही नहीं चला हम कब दिल्ली में दाखिल हो गए। एक रात दिल्ली में बिताकर, दिल्ली को कृतार्थ करते हुए, दूसरे रोज सुबह दिल्ली से भेलोर के लिए आरक्षित आसन में विराजमान होकर दूसरे रोज रात को काठपाडी स्टेशन में उतरे। एक रात ही सही महंगे होटल का लुत्फ भी उठाया गया।
दूसरे रोज दूर का एक साला नजदीक में मिल गया। वह भी इलाज के लिए वहां नमूदार हुआ था। दूर देश में दूर का ही सही, साला मिला जाय तो इस से बढिÞया बात और क्या हो सकती है। साले के मिलते ही सस्ते लज की तलाश खत्म हर्ुइ। हुआ न फायदा !
भेलोर की प्रचण्ड गर्मी रुपी मरुभूमि में र्सजन रोहिन मित्तल मुझे एक शीतल वटवृक्ष की तरह मिल गए। इसे मैं प्रभु कृपा ही मानता हूँ। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, ऐसी कृपा सिर्फआस्तिकों को मिलती है। डा. मित्तल से मिलकर बात करते ही मेरी आधी बिमारी भाग खडी हर्ुइ।
क्रिश्चियन मेडिकल कलेज, भेलोर की विशालता देखकर मैं तो हक्का-बकका रह गया ! रोगियों के कुम्भ को कैसे सम्भाल पाता है, यहाँ का व्यवस्थापन पक्ष – देखकर दाँतों तले ऊँगली दबानी पडÞती है। काबीले-तारीफ हैं, यहाँ के इन्तजामात !
सन् १९०० में एक महिला डा. इडा सोफिया स्कडंर द्वारा स्थापित इस अस्पताल को आज देखने पर लगता है कि असली जवानी तो इस पर अब छायी है। अभी मैं सत्तर के अगल-बगल से गुजर रहा हूँ, जवानी की बातें ज्यादा न करुँ तो मेरे लिए सेहतमंद रहेगा।
मेरी बातों पर आप को यकीन न आता हो तो भगवान से एक अच्छी सी बिमारी माँगकर चले आईए सिएमसी भेलोर। एक पन्थ दो काज को र्सार्थक कीजिए। बगल में लक्ष्मी जी का गोल्डेन मन्दिर है। कुछ दूर जाने पर तिरुपति वालाजी के दर्शन हो सकते हैं। मैनें भी सपरिवार भगवान का दर्शन किया और प्रसाद के रुप में आधा किलो का लड्डू एक मिनट में भकोस गया। कुछ और दूर जाने की कूवत हो तो चल चलिए रामेश्वरम् ! जीवन धन्य-धन्य हो जाएगा ! भले ही आप धनधान्यबिहीन हों।
अब आईए डाक्टर और मरीज के सम्बन्ध के विषय में। काठमांडू के डाक्टरों ने मुझे सिर्फडराने का काम किया। उनकी बातों को सुनकर लगता था, ये तो लाइसेन्स प्राप्त कर्साई हैं। सहयात्री नवराज घिमिरे भी यही कहते थे। इसीलिए उपचार के लिए पत्नी को वे दिल्ली ले जा रहे थे।
मगर डा. रोहिन मित्तल से मिलने के बाद कुछ उम्मीद बँधी, वैसे तो अपरेशन के लिए भर्ना होने पर रक्तचाप ऊपर की ओर भागने लगा था। बहादुर की तरह मैंने खुद को समझाया। वैसे भी भारत के शहरों में बहुत सारे नेपाली बहादुर बनकर अपनी बहादुरी और देश की गरीबी दोनों साथ साथ दिखा ही रहे ।
कहा है न, अध जल गगरी छलकत जाय, भरी गगरिया चुप्पे जाय।
आजकल अहंकारी लोग वरसाती नदी की तरह हमेसा उफनते रहते हैं। दो अक्षर पढÞ लिया सन्तन को दुःख दिया। मगर एक सुप्रसिद्ध सफल र्सजन होने पर भी डा. रोहिन मित्तल फलों से झुकी हर्ुइ डाली की तरह विनम्र और रोगी के वास्तविक शुभचिन्तक हैं। अन्धे को क्या चाहिए – दो आँखे। डा. ऐसी ही हों तो रोगी का भला होगा ।
आप कभी कही हो आईए न। याद कीजिए शायर इस्माइल मेरठी ने कहा था-
सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां
जिंदगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहां।
किसी भी सफर में दो-चार पीस अच्छे लोग मिल जाएँ तो समझिए बल्ले बल्ले ही है। इसीलिए तो मैं कहता हूँ सिएमसी भेलोर ! वन्स मोर !! वन्स मोर !!
याद रखीए, जीवन स्वयं एक अनन्त यात्रा है। भले ही हम अपनी कूपमंडुÞकता छोडंÞे न छोडेÞं !

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