सिर चढ कर बोलता राजतन्त्र का भूत

कुमार सच्चिदानन्द:आषाढ के घुमडते मेघों के साथ जब पर्ूव महाराज ज्ञानेन्द्र का भक्तिभाव हिलोरें मारता है, और उसके शमन के लिए जब वे देश के विभिन्न स्थानों के देव-देवियों के मन्दिर की यात्रा करते हैं तो नेपाल की राजनीति में आशंका के बादल गहराने लगते हैं। बाढ की विभीषिका से पीडिÞत क्षेत्रों में जब वे हिमानी ट्रस्ट के माध्यम से राहत सामग्रियों का वितरण करते और कराते हैं तो एक हताशा की स्थिति दिखलाई देने लगती है। हमारे राजनेताओं को पर्ूव महाराज एक भूखे शेर की तरह दिखलाई देने लगते हैं जो गर्ुराती आँखों से नवस्थापित गणतन्त्र को निगलने के लिए तत्पर हैं। एक पर्ूवप्रधानमन्त्री, जो नेपाली राजनीति में विद्वान भी माने जाते हैं, यह बयान देने के लिए विवश होते हैं कि अगर वे देश के प्रधानमन्त्री होते तो ज्ञानेन्द्र को गिरफ्तार कर जेल भेज देते। कहा जा सकता है कि वे एक भूखे शेर को पिंजडेमें बन्द करने की मनसा रखते हैं। लेकिन वे प्रधानमन्त्री नहीं है। इसलिए यह बयान मौजूदा सरकार पर नैतिक दबाव डÞालता है कि पर्ूव महाराज की गतिविधियों को वह नियन्त्रित करे। लेकिन इस तरह का आक्रोश फिलहाल जो देखा जा रहा है, उसके मूल में सम्पर्ूण्ा नेपाली राजनीति की असफलता है, जिसके कारण उनके मन में एक भय की स्थिति है। यह भय एक तरह से मौजूदा राजनीति की हताशा सिद्ध कर रहा है।

nepali raja

सक्रियता का रहस्य

नेपाल में बहुदलीय राजनैतिक व्यवस्था है और अनेक दल यहां सक्रिय हैं। जिनकी अपनी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएं हंै। यद्यपि ज्ञानेन्द्र या उनके परिवार का कोई भी सदस्य प्रत्यक्ष रूप से राजनीति की मुख्यधारा में नहीं हंै। लेकिन नेपाल की राजनीति के एक केन्द्र के रूप में उन्हें न समझना एक महान राजनैतिक भूल मानी जाएगी, क्योंकि उनके जनाधार को अभी भी इस देश में नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। दूसरा यथार्थ यह है कि विगत सात वर्षों में हमारे देश ने जो लोकतान्त्रिक यात्रा की है, उसकी रेखाएं इतनी उलझी हर्ुइ हैं कि आम लोगों में उसके प्रति एक निराशा का भाव पैदा हुआ है। यही निराशा ज्ञानेन्द्र की राजनीतिक पुनर्यात्रा का प्रस्थान विन्दु हो सकती है। कारण, विगत वर्षों मंे हमारी राजनीति में जो दिशाहीनता, उद्देश्यहीनता, कर्तव्यहीनता और दलगत स्वार्थ तथा संर्घष्ा उभरकर सामने आया है, उससे जन-मन का असंतोष एक नई दिशा ले सकता है और उस नई दिशा के एक मात्र विकल्प के रूप में राजपरिवार के सदस्य को देखा जा सकता है। इस बात को हमारे राजनेताओं को समझ लेना चाहिए कि लम्बी लम्बी बातों से उनकी गति और प्रवाह को रोका नहीं जा सकता। उन्हें रोकने के लिए एक मात्र उपाय संविधान, शान्ति, सुव्यवस्था और सामाजिक न्याय है।
आज कोई भी राजनीतिक दल यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि नेपाल मंें राजतन्त्र की पुनर्वापसी हो सकती है। इसका सबसे बडÞा कारण है- २०६३ के बाद देश में अब तक जो राजनीतिक और संवैधानिक विकास हुआ है, उसमें राजतन्त्र के लिए कोई जगह नहीं। फिर विगत में प्राप्त सत्ता, शक्ति, अवसर और स्वार्थ ने उन्हें इस ढंग से मोहित कर लिया है कि वे सच्चाई को नहीं देख पा रहे है। लेकिन एक बात तो कबूल किया ही जाना चाहिए कि राजनैतिक दलों के साथ जो जनर्समर्थन होना चाहिए, उसमें ह्रास आया है। कार्यकर्ताओं की बात छोडÞ दें तो राजनीतिक दलों के प्रति आम लोगों का निराशाभाव दिनानुदिन गहराता ही जा रहा है और यह निराशा समग्र रूप से नेपाली राजनीति के प्रति है। इसके दो निहितार्थ हंै, जो दोनों ही पक्षों के लिए सकारात्मक भी है और नकारात्मक भी। सकारात्मक इस अर्थ में माना जा सकता है कि विगत सात वर्षों में नेपाल की राजनीति में जो दिशाहीनता और अराजकता देखी गई है उसके प्रति किसी जनव्रि्रोह की फिलहाल सम्भावना नहीं है और नकारात्मक इस अर्थ में कि आम लोगों की यही तटस्थता तीसरी शक्ति के उदय का कारण बन सकती है।
राजनीतिक रूप में नेपाल एक ऐसा राष्ट्र है- जहाँ व्यवस्था परिवर्तन आम घटना सी रही है। इसका प्रमाण विगत साठ-सत्तर वर्षों का हमारा इतिहास रहा है। इसलिए अभी जो व्यवस्था चल रही है या जिसका प्रारूप राजनीतिक दलों के मस्तिष्क में घूम रहा है, उसे अन्तिम मान लेना एक तरह से रेगिस्तान में शत्रु को पास आते देखकर शुतुरमर्ुग की तरह बालू में सिर छुपा लेना है। इस देश में हर नई व्यवस्था और नए चेहरे को आम लोगों ने सहजता से स्वीकार किया ही है। यह अलग बात है कि समय समय पर उनके प्रति विरोध के स्वर भी उन्होंने मुखर किए हैं। इसलिए आम जनता के इस मिजाज को समझना राजनीतिक दलों के लिए आवश्यक है। आज हमारी राजनीति में सर्वोच्चता और र्सवशक्तिमान होने का जो मनोविज्ञान है, वही देश को फिर राजनीतिक अनिश्चितता की ओर धकेल रहा है। पर्ूव महाराज ज्ञानेन्द्र को चाहे हम वनवास दे दें, नजरबन्द कर दें, जेल में डाल दें या निर्वासित कर दें, यह समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि राजपरिवार के अन्य सदस्य भी हैं, मोह राजतन्त्र के प्रति विकसित हो रहा है। व्यक्ति कोई भी हो सकता है। इसलिए उनका आधार कभी भी विकसित हो सकता है। पाकिस्तान के विगत के इतिहास को हम देखें तो निर्वासित रह कर भी सत्ता में वापसी के कई उदाहरण हमें मिल जाएँगे। वर्मा और दक्षिण अप्रिmका की राजनीति को देखें तो जेल में रह कर भी सत्ता में वापसी के उदाहरण हमें मिल जाएंगे। इसलिए वास्तव में अगर हमारी राजनीति चाहती है कि इस देश में राजतन्त्र की काली छाया की पर्ुनर्वहाली न हो तो उन्हें शान्ति, सुव्यवस्था और संविधान के प्रति प्रतिवद्ध होना होगा और राज्य में नागरिक सम्मान सुनिश्चित करना होगा, अन्यथा राजतन्त्र का भूत उन्हें परेशान करता ही रहेगा। आज  बाबुराम भट्टर्राई ने मुँह खोला है, कल दूसरे, तीसरे खोलेंगे ओर धीरे-धीरे ये खुद हास्यास्पद स्थिति में चलते चले जाएँगे।
पर्ूव महाराज ज्ञानेन्द्र शाह यह बात भलीभाँति जानते हैं कि किसी भी रूप में नेपाल में राजतन्त्र की वापसी सहज नहीं है। मौजूदा सन्दर्भों में राष्ट्रीय और अन्तर्रर्ाा्रीय शक्तियाँ दोनों ही उनके पक्ष में नहीं हैं। लेकिन तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि उनके वंश के सदियों का इतिहास इस देश में रहा है। राजतन्त्र की शक्ति और शान शौकत उन्होंने देखी है। अतः इसके प्रति उनका मोह होना स्वाभाविक ही माना जा सकता है। फिर राजतन्त्र का विस्थापन भी इस देश में उस रूप में नहीं हुआ कि उसकी जडÞ ही नष्ट हो गई हो। इसलिए जडÞें हैं तो अंकुरण की भी सम्भावना है। सबसे बडÞी बात है कि आज हमारे राजनीतिक दल या नेता इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि मौजूदा राजनीतिक-संवैधानिक पृष्ठभूमि में कोई छ्रि्र ऐसा नहीं, जहां से राजतन्त्र का जिन्न निकलकर देश पर छा जाए। प्रत्यक्ष रूप से जो दो अन्तर्रर्ाा्रीय शक्तियाँ कूटनैतिक स्तर पर नेपाल में अधिक प्रभावी हैं, वे भी उनके पक्ष में नहीं हैं। लेकिन उन्हें सचेत होना चाहिए कि नेपाल की राजनीतिक अनिश्चिता, संवैधानिक गतिरोध और दलों की अतार्किक खींचातानी किसी न किसी रूप में अप्रत्याशित स्थिति को निमन्त्रण दे रही है। यह सच है कि आम जनता के मन में राजतन्त्र या संवैधानिक राजतन्त्र फिलहाल अन्तिम विकल्प के रूप में स्थित नहीं हुआ। लेकिन कोई नवीन और राजनीतिक रूप से गतिशील विकल्प सामने न होने से इस विकल्प की कौंध तो लोगों के मन-मस्तिष्क में है ही। गौरतलब है कि राजभवन हत्याकाण्ड के बाद देश में सरकार और राजनीतिक दलों के प्रति अविश्वास का जो वातावरण बना, उससे निजात पाने के लिए अछूत सी मानी जानेवाली नेकपा माओवादी पार्टर्ीीी ऐसा विकल्प बनी थी, और दीवारों पर उनके र्समर्थन या आहृवान के नारे लिखे गए थे। लेकिन आज उससे भी मोहभंग की अवस्था है।
जहाँ तक अन्तर्रर्ाा्रीय सम्बन्धों की बात है तो कहा जा सकता है कि नेपाल के अनेक राष्ट्रों से राजनायिक सम्बन्ध हैं। सभी अपने-अपने स्तर पर यहाँ प्रभावी हैं। लेकिन उत्तर और दक्षिण यहां अधिक प्रभावी हैं। आज जो भी राजनीतिक दल विचारधारा के आधार पर चीन से अपनी निकटता समझते हैं, उन्हें यह तथ्य भी समझना चाहिए कि पर्ूव महाराज के पतन का एक महत्वपर्ूण्ा कारण चीन मोह भी रहा है जो ढÞाका के र्सार्क सम्मेलन में जाहिर हुआ था। इस बात का एहसास चीन को भी है। क्योंकि उनके सत्ता छोडÞने के तुरन्त बाद ही अपनी कूटनैतिक असफलता को देखते हुए चीन ने तत्काल अपने राजदूत को वापस बुला लिया था। जहां तक भारत का सवाल है- तो उस बात को सभी जानते हैं कि भारत राजसंस्था के लिए न केवल पडÞोसी राष्ट्र है, बल्कि उनके सम्बन्ध सूत्र वहां बिखरे पडÞे हैं, जिन में से कई नाम भारत की राष्ट्रीय राजनीति की अग्रिम पंक्ति में क्रियाशील हैं। इनका राजपरिवार के प्रति सहानुभूति होना स्वाभाविक है। फिर भारतीय जनता पार्टर्ीीैसी राजनीतिक पार्टर्ीीो भारतीय संसद में प्रमुख विपक्षी घटक है, हिन्दूत्व के एजेण्डे पर राजसंस्था के प्रति सहानुभूति रखती है। यह भी सच है कि धर्मशास्त्र के नाम पर ज्ञानेन्द्र की भारत यात्रा होती रहती है और इस दौरान उनकी राजनीतिक मुलाकातें भी होती हैं। इसलिए आज कोई भी दल को इस गफलत में नहीं रहना चाहिए कि आज जो अन्तर्रर्ाा्रीय शक्तियाँ उनके प्रति तटस्थ हैं, कल उदार नहीं हो सकतीं। परिस्थितियों का सृजन तो हमारे राजनीतिक दल खुद कर रहे हैं।
नेपाल की राजनीति में फिलहाल राप्रपा को छोडÞकर शेष पार्टियाँ राजनीतिकि रूप से ज्ञानेन्द्र को अछूत मान रही हैं। ऐसा वे लोकतन्त्र या गणतन्त्र की पृष्ठभूमि में कर रही हैं। लेकिन राजनीति में कोई भी दल या विचारधारा आम लोगों की दृष्टि में अछूत नहीं होती। समय सर्न्दर्भ में सभी प्रासंगिक और अप्रासंगिक होते हैं। उदाहरण के तौर पर भारत की भारतीय जनता पार्टर्ीीो लिया जा सकता है। धर्म निरपेक्षता के नाम पर अनेक दल उन्हें अछूत मानते हैं। लेकिन सबसे बडÞे गठबन्धन के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने का इतिहास भी इसी पार्टर्ीीे नाम है। आज भी यह भारत की प्रमुख प्रतिपक्षी पार्टर्ीीै और सत्ता के दरवाजे पर दस्तक दे रही है। अगर सचमुच राजावादी या राजा अछूत हैं तो उनसे कार्यगत एकता करने के लिए वामपंथी पार्टियाँ क्यों समय-समय पर तैयार दिखलाई देती हैं – क्यों वाम और दक्षिण पंथ एक भूमि पर एकाकार होते दिखाई देते हैं। स्पष्ट है कि यह सारा भ्रम लोगों को गुमराह किए जाने के लिए पैदा किया जाता है। लेकिन आज आमनागरिक इतना सचेत है कि ऐसे भ्रामक प्रचार का उसके लिए कोई अर्थ नहीं होता। यही कारण है कि पर्ूव महाराज की यात्राओं और समारोहों में क्रमशः जन उपस्थिति बढÞ रही है और उसके पीछे संगठित प्रायोजक भी अपेक्षाकृत कम रहे हैं।
आज देश में सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश के नेतृत्व में चुनावी सरकार है, जिसके कैविनेट में बडेÞ-बडेÞ नौकरशाह हैं। लेकिन चुनाव का माहौल बना सकने में वे अभी भी सक्षम नहीं हो पाए हैं। दूसरी ओर प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्ववाली सरकार भी अब तक के अपने कार्यकाल में कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकी, जिसके आधार पर उन्हें जनता अपना आदर्श माने। फिर इतने दिनों के कार्यकाल में इस सरकार में शामिल लागों के क्षुद्र स्वार्थ उभरकर सामने आए हैं, जिससे लोगों में यह धारणा पक सी गई है कि सरकारों के नाम पर इस देश में बोतलें तो बदलती हैं मगर शराब वही रहती है। यह सरकार अपनी सफलता असफलता के लिए जिम्मेदार पाँच दलीय उच्चस्तरीय संयन्त्र को मानती है। और यह संयन्त्र अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए सरकार को हावी नहीं होने देता।
कुल मिलाकार आज आम लोगों में राजनीति से मोहभंग की अवस्था है और यह स्थिति क्रमशः गहराती ही जा रही है। इसी जमीन पर नए विकल्प की पौध क्रमश विकसित हो रही है और यह विकल्प मौजूदा राजनीति से बाहर मात्र राजपरिवार है। अंगुली दिखाकर या गाली देकर उसके बहाव को रोकना सम्भव नहीं। इसके प्रवाह को अगर रोकना है तो हमारे राजनीतिक दलों को जिम्मेदार होना ही होगा, बातों से अधिक कर्म में भरोसा करने की कला विकसित करनी होगी और देश के लिए तीव्र विकास की दिशा तय करनी होगी।

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