सीमांकन और संघीय ढाँचा के बिना निर्वाचन कराने की तैयारी : सरासर बेईमानी है

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गंगेश कुमार मिश्र , कपिलबस्तु , १८ नवम्बर | संविधान संशोधन – सीमांकन और संघीय ढाँचा निर्धारण किए बिना, स्थानीय निकाय निर्वाचन कराने की तैयारी; सरासर बेईमानी है।
इन्तज़ार, इन्तज़ार, इन्तज़ार; बस इन्तज़ार; कितना ? पता नहीं। समझौते दर समझौते होते रहे,कार्यान्वयन के लिए समय सीमा निर्धारित की जाती रही, समय आता और सीमा बढ़ाई जाती, फ़िर समय आता; ” टायँ- टायँ फिस्स ” ; जहाँ थे वहीं रह गए। यह तो हाल है, गणतन्त्रात्मक प्रजातान्त्रिक देश नेपाल का; आधारहीन बातें, करते नहीं सकुचाते लोग। लगभग दो दशक बाद, स्थानीय निकाय निर्वाचन कराने की सुगबुगाहट है; बिलकुल नये प्रारूप में। अब गाँव विकास समिति ( गा.वि.स.) नहीं होंगे, उनके स्थान पर गाँव पालिकाएँ होंगी: भारी-भरकम जनसंख्या के साथ।
कुछ भी हो, यह योजना है सरकार की; अब चुनाव हो पाता है या नहीं; यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। चुनाव के लिए तैयारी हो रही है, व्याकुलता बढ़ रही है।
यहाँ एक बात की चर्चा करना अहम् है, नेपाल के संदर्भ में; यहाँ बूँदाबाँदी होती रहती है। कभी 22 बूँदे, 8 बूँदे; तो कभी 3 बूँदे; ये सब बारिश के बूँदें नहीं,  अपितु समय-समय पर किए गए समझौतों की संख्या रूप बूंदे हैं। जो असफल होने की शतप्रतिशत गारन्टी होते  हैं, जिनका कभी क्रियान्वयन नहीं होता।
Premature baby, हमारा सातवाँ संविधान; जिसे जन्मते ही सघन चिकित्सा-कक्ष में पहुँचा तो दिया गया ( संशोधन के लिए ), परन्तु उपचार कुछ हो नहीं पाया और उसे स्वस्थ करार घोषित कर दिया गया। इधर कामरेड झल्लू बाबू (झलनाथ खनाल ) कहते हैं,  पहले बच्चे को दौड़ा लिया जाय; ईलाज़ तो होता रहेगा; क्या दिक्कत है बच्चे (संविधान ) में ?
ख़ैर सोचने वाली बात, यह है कि बिना संशोधन के संविधान का कार्यान्वयन कैसे संभव है ? और फ़िर अड़चन क्या है, इसके संशोधन में ? जिसे तीन दलों ने मिलकर आनन-फानन में, पारित करवा लिया; वही मिल बैठकर संशोधित क्यों नहीं कर लेते ? लेकिन ऐसा करेंगे नहीं, संघीयता का मुद्दा ये भूल चुके हैं; ये जैसे-तैसे स्थानीय निकाय निर्वाचन करवा लेना चाहते हैं। जिससे संविधान में प्राण फूँक सकें; और जिससे इसकी आयु बढ़ाई जा सके।
लेकिन सीमांकन कार्य नहीं हो पा रहा है।
दुर्भाग्य है देश का, मधेश का कि आज सत्ता उस व्यक्ति के हाथों में है; जो घूम-घूम कर प्रदेशों का नामकरण ( खम्बुवान, लिम्बुवान, मिथिला, कोचिला ) करता रहा। लेकिनआज चुप हैं प्रचण्ड जी अपने पूर्ववर्ती सहोदरों की तरह, संघीयता खतरे में है और ऐसे में स्थानीय निकाय निर्वाचन कराने की तैयारी; सरासर बेईमानी है।

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