सीमांकन सम्बन्धी विवाद कैसे समाधान हो सकता है ?

पाँच महीने से तराई÷मधेश आन्दोलनरत है । आन्दोलन का मुख्य मुद्दा सीमांकन परिवर्तन, समावेशी–समानुपातिक प्रतिनिधित्व की सुनिश्चिता, जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र आदि है । इन में से कुछ मुद्दा संविधान संशोधन के द्वारा सम्बोधन भी हो चुका है । लेकिन इसमें मधेशी मोर्चा असन्तुष्ट है । आन्दोलन की प्रमुख मांग– ‘सीमांकन परिवर्तन’ में कोई सम्बोधन नहीं हो पाया है । सीमांकन सम्बन्धी विवाद को कैसे समाधान किया जा सकता है ? अब मधेशी मोर्चा की रणनीति क्या होनी चाहिए ? यही प्रश्न हिमालनी सम्वाददाता लिलानाथ गौतम ने कुछ सर्वसाधारणों पूछा है । प्रस्तुत है, उसका सम्पादित अंश–

मधेश में दो ही प्रदेश होना चाहिए
सुवास ठाकुर, राजविराज, सप्तरी

सुवास ठाकुर, राजविराज, सप्तरी

 पाँच महीनों तक आन्दोलन जारी रहने के बाद संविधान में संशोधन हुआ है । लेकिन इस संशोधन ने भी मधेशी जनता की मांग को सम्बोधन नहीं किया । पहली बात तो संविधान का संशोधन मधेशी मोर्चा की सहमति में नहीं हुआ है । लेकिन सरकार कहती है– मधेशी मोर्चा की मांग सम्बोधन हो चुकी है । समावेशी–समानुपातिक मुद्दा को भी सम्बोधन किया गया है । लेकिन उसका अनुभव मधेशी जनता नहीं कर पा रही है । आन्दोलन की प्रमुख मांग, सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा को अभी तक सम्बोधन नहीं किया गया है । प्रमुख राजनीतिक दल सीमांकन परिवर्तन के लिए तैयार तो दिख रहे हैं, लेकिन कैसे परिवर्तन किया जाएगा, वह नहीं कहते हैं । जिसके चलते जनता के लिए पीड़ादायी आन्दोलन नहीं रुक पा रहा है । मधेशी मोर्चा ने अभी मधेश में जो दो प्रदेशों की मांग की है, यह मांग जायज है । इस को पूरा करना ही चाहिए । समग्र मधेशी जनता ही चाहती है । जब तक यह मांग पूरी नहीं की जाएगी, तब तक मधेशी जनता आन्दोलन रोकने की मनस्थिति में नहीं दिखाई देती । यह बात सत्य है कि आन्दोलन और नाकाबन्दी के कारण जनता पीड़ा झेल रही है । रोजीरोटी में समस्या आ रहा है । सौ रुपैयाँ लीटर का पेट्रोल पाँच सौ में खरीद–विक्री हो रहा है । लेकिन वर्तमान सरकार इसके प्रति थोड़ा भी सम्वेदनशील नहीं दिखाइ देती है । अखिर यह सब कबतक जारी रहेगा ? देश की आधी जनसंख्या वर्तमान संविधान के प्रति सन्तुष्ट है । ५० प्रतिशत जनता की आवाज सुनने के लिए सरकार तैयार नहीं हो रही है । हम प्रश्न करते हंै– यावत समस्या समाधान के लिए सरकार क्या कर रही है ? मधेशी मोर्चा को वार्ता में बुलाया जाता है, लेकिन सरकारी प्रतिनिधि ही अनुपस्थित हो जाते हंै । यह रणनीति कबतक चलेगी ? आन्दोलन के क्रम में दर्जनों अपनी जान गंवा चुके है, लेकिन हमारी सरकार उससे बेखबर दिखाई देती है । सरकार सम्वेदनशील नहीं होने के कारण ही हम जैसे सर्वसाधारण दुःख झेल रहे हैं । समस्या समाधान के लिए मधेशी मोर्चा और सरकार दोनों को सम्वेदनशील होना चाहिए ।

सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा मोर्चा का नहीं, भारत का है
 

गोविन्दसिंह थापा, नयाँ बानेश्वर, काठमाडौं

गोविन्दसिंह थापा, नयाँ बानेश्वर, काठमाडौं

सीमांकन सम्बन्धी अभी जो मुद्दा और विवाद सामने आया है, वह मधेशी मोर्चा का मुद्दा नहीं है, भारत का है । मधेशी मोर्चा तो पर्दा के आगे है, वास्तविकता भीतर । इसीलिए सीमांकन सम्बन्धी जिस तरह का विवाद देख रहे हैं, यह कभी भी समाधान नहीं हो सकता । बेस तो यही है– संघीयता सम्बन्धी मुद्दा को स्थगित किया जाए और आर्थिक समृद्धि के लिए देश को अग्रसर किया जाए ।
लेकिन विडम्बना ! अभी देश आर्थिक नाकाबन्दी को झेल रहा है । यह अघोषित नाकाबन्दी भारत ने ही किया है, मधेशी जनता ने नहीं । इस के पीछे बहुत कारण और स्वार्थ हो सकता है । भारत के स्वार्थ के अनुसार ही हमारे मधेशी दल चलते हंै । इसलिए मधेशी दलों का कोई भी राजनीतिक मुद्दा नहीं है । भारतीय सत्ता जो चाहती है, मोर्चा वही करता है । हाँ हमारे देश का किसी भी नेताओं का सम्बन्ध, राष्ट्रहित के लिए पड़ोसी मुल्क अथवा वहाँ की नेताओं से हो सकता है । यह सामान्य भी है । लेकिन हमारे मधेशी नेताओं का सम्बन्ध उस तरह का नहीं है । उदाहरण के लिए नेपाल सरकार वार्ता के लिए बालुवाटार बुलाते है, वे लोग भारतीय दूतावास, लैनचौर जाते है । यह सब किस लिए ? इसिलिए यह सिर्फ आरोप ही नहीं, मधेशी मोर्चा का व्यवहार प्रमाणित करता है ।
हम सब जानते है– अभी मधेशी मोर्चा के नाम में जो आन्दोलन हो रहा है, वह भी मोर्चा का स्वविवेक से नहीं हो रहा है । अगर भारत चाहता है तो यह आन्दोलन क्षणभर में समाप्त हो सकता है । इसलिए आन्दोलन की योजना मोर्चा नहीं बना रहा है । इस में भारतीय सत्ता का तत्कालीन और दीर्घकालीन स्वार्थ जुड़ा हुआ है । भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का तत्कालीन स्वार्थ नेपाल को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाना हो सकता है । नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाना है या धर्मनिरपेक्ष ? नेपाल में कितना संघीय राज्य, किस तरह बनाया जाए ? अथवा ना बनाया जाए ? यह प्रश्न यहाँ की जनमत निर्धारण करेगी । भारत अथवा अन्य विदेशी मुल्क नहीं । लेकिन विदेशी शक्ति राष्ट्र के दबाव के कारण ही आज नेपाल को संघीय राज्य में ले गया है । 

पा“च विकास क्षेत्र ही, पा“च प्रदेश होना चाहिए
 

वाल्मिकी यादव, वीरगंज, पर्सा

वाल्मिकी यादव, वीरगंज, पर्सा

वर्तमान सीमांकन के प्रति सिर्फ मधेशी समुदाय ही नहीं, अन्य समुदाय भी असन्तुष्ट है । क्योंकि जनता की चाहना और आवश्यकता को मध्यनजर करके संघीय राज्य का सीमांकन नहीं किया गया है । यहाँ तो ‘ओली प्रदेश’ और ‘देउवा प्रदेश’ बनाया गया है । अर्थात् नेताओं की व्यक्तिगत महत्वांकाक्षा के अनुसार सीमांकन किया गया है । सबसे पहले जातीय नामांकन के आधार पर सीमांकन करने की बहस खूब हुई । ऐसी अवस्था में मधेशी समुदाय ने भी अपनी जाति और समुदाय विशेष का संघीय राज्य बनाने के लिए मांग किया । और ‘एक मधेश प्रदेश’ का मांग को आगे बढ़ाया । यह मांग कितनी उचित है ? इसका अलग विश्लेषण हो सकता है । लेकिन उसके लिए मधेशी जनता बाध्य थे । क्योंकि यहाँ तो मधेशी जनता की आवाज को भारतीय मांग कहा जाता है । अभी भी राजेन्द्र महतो को भारतीय कह कर प्रचार हो रहा है । चालीस लाख भारतीय को नेपाली नागरिकता प्रदान किया गया है, ऐसी बात हो रही है । अगर ऐसा ही है तो महतो को नेपाली नागरिकता देकर मन्त्री बनाने वाला कौन है ? चालीस लाख भारतीयों को नेपाली नागरिकता देने वाला कौन है ? इसकी छानबीन नहीं होनी चाहिए ? सीमा क्षेत्र में रहकर नेपाल का सीमा अतिक्रमण होने से रोकनेवाला नेपाली सेना नहीं, मधेशी जनता है । इस तथ्य को क्यों भूल जाते हैं, यहाँ के शासक वर्ग ? लेकिन जब मधेशी जनता बराबर अधिकार मांगती है तो उसको भारतीय कहा जाता है । ऐसा क्यों हो रहा है ? मधेश का भू–भाग नेपाल का होता है, लेकिन वही भू–भाग में रहनेवाला कैसे भारतीय हो गए ? गलत तो है लेकिन ऐसे ही अनेक प्रश्न के कारण आज देश में विखण्डन की आवाज उठ रही है । इसलिए सदियों से सत्ता में रहने वालों को अपनी मानसिकता परिवर्तन करनी चाहिए । हम मधेशी भी नेपाली हैं, इस का एहसास होना चाहिए । धोती लगाने वाला और टोपी लगाने वाला दोनों को बराबर अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए । उसके बाद मधेश में जितना भी प्रदेश बनाया जाए, कोई फर्क नहीं पडेÞगा । अर्थात् एक वा दो प्रदेश ही चाहिए, ऐसा नहीं है ।
संघीय राज्य के द्वारा जनता को राज्य प्रदत अधिकार सहज रूप में मिलना चाहिए, हर नागरिकाें को आर्थिक समृद्धि हासिल होना चाहिए । लेकिन हमारे यहाँ अभी तक इस तरह की कोई भी बहस नहीं हो रही है । आर्थिक सम्वृद्धि सम्बन्धी दृष्टिकोण से देखा जाए तो पाँच विकास क्षेत्र ही पाँच संघीय राज्य के लिए उपर्युक्त होता है । प्राविधिक दृष्टिकोण से भी पाँच विकास क्षेत्र सब से उपर्युक्त है । सिर्फ मधेश की भू–भाग को लेकर एक वा दो प्रदेशों की बात करने वालों को इस तथ्य पर अध्ययन करना चाहिए । क्योंकि मैंने यह बात कोई हचुवा में नहीं कहा है, अध्ययन और चिन्तन भी किया हूँ । लेकिन ‘मधेशी’ और ‘पहाडी’ कह कर जो विभेद हो रहा है, वह नहीं होना चाहिए । उसके बाद समानुपातिक और समावेशी मुद्दा को ही खारिज कर देना बेहत्तर होगा । क्योंकि योग्य और सक्षम व्यक्ति को ही अवसर मिलना चाहिए, मैं ऐसी मान्यता रखता हूँ । नहीं, जातीय वकालात ही करना है और उसी के अनुसार संघीय राज्य बनाना है तो मधेशी जनता ने अपनी क्षेत्र में अपनी जाति के लिए वकालत किया और संघीय राज्य मांगा है तो क्या गलत किया ?
मै एक उदाहरण पेश करता हूँ– मधेशी जनता ने अपने निर्वाचन क्षेत्र से बहुत पहाड़ी समुदाय के नेताओं को चुनाव जिता कर भेजा है । लेकिन मै ‘वाल्मिकी यादव’ काठमांडू अथवा अन्य हिमाली क्षेत्रों से क्या चुनाव जीत सकता हूँ ? पहाड़ी समुदाय मुझे विश्वास कर सकता है ? इन प्रश्नों को ठोस जवाब चाहिए । अर्थात् अभी दो समुदाय के बीच जो अश्विास है, उसको विश्वास में बदलना होगा ।
नेताओं की व्यक्तिगत और पार्टीगत स्वार्थ के कारण ही आज जातीय और क्षेत्रीय समस्या उत्पन्न हो रही है । इससे हम लोग को बाहर निकलना चाहिए । पाँच महीनों से जारी मधेश आन्दोलन अब समाप्त होना चाहिए । जितना भी आन्दोलन हो, समस्या समाधान का अन्तिम विकल्प तो सम्वाद ही है । बिना सम्वाद कोई भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता । आन्दोलन और नाकाबन्दी के कारण जनता दुःख झेल रहा है । जनता के लिए राजनीति करने वालों को यह बात समझना चाहिए । इसके लिए दोनों पक्ष इमान्दार होना चाहिए । नेताओं की व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण नेपाल को सोमालिया बनने से बचाना होगा ।

 

जितना हो सके कम प्रदेश होना चाहिए
 

प्रेमकृष्ण थापा, कटुजे, भक्तपुर

प्रेमकृष्ण थापा, कटुजे, भक्तपुर

मधेश आन्दोलन के द्वारा उठायी गयी महत्वपूर्ण माँग– समावेशी–समानुपातिक मुद्दा संविधान संशोधन के द्वारा सम्बोधन हो चुका है । जहाँ तक सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा है, उस में तो नेताओं की व्यक्तिगत स्वार्थ जुड़ा हुआ है । सबसे पहले मधेशी दलों ने भीतरी मधेश के अलावा १७ जिला को ‘एक मधेश प्रदेश’ मांगा था । अभी २२ जिलों का दो प्रदेश मांग रहे है । यह दोनों मांग संघीयता सम्बन्धित सिद्धान्त के विपरित ही है । पहली बात तो यह है कि नेपाल जैसे छोटा मुल्क में संघीय राज्य नहीं, विकेन्द्रीकरण का सही और पूर्ण प्रयोग होना चाहिए था । लेकिन विभिन्न कारणों से अभी देश संघीय राज्य में प्रवेश कर चुका है । अब हम लोग इसको नहीं रोक सकते हंंै । संघीय राज्य में जाना ही है तो पाँच विकास क्षेत्र को संघीय राज्य बनाना चाहिए था । सामथ्र्य और अन्य कारणों से भी सबसे उपर्युक्त हो सकता था । लेकिन अभी तो सात–आठ प्रदेशों की बात हो रही है । इस तरह ज्यादा प्रदेश बनाना ठीक नहीं है । क्योंकि ज्यादा प्रदेशों की खर्च उठाने का क्षमता हमारे पास नहीं है ।
अभी आन्दोलन के नाम में मधेशी मोर्चा ने देश को बन्धक बनाया है । आर्थिक नाकाबन्दी किया है । जिसके चलते देश का अर्थतन्त्र पूर्णरूप में ध्वस्त हो चुका है । जितना जल्द हो सके, आन्दोलन वापस होना चाहिए । 

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