सुख की चाह, दुःख को बुलावा

कुछ समय पर्ूव की बात है, मैं अपने एक मित्र से मिला था। उसने एक-दो महिने पहले मुझसे पूछा था कि क्या तुम सुखी हो – उस प्रश्न से एक बार तो मैं चांैका, फिर संयत हो मैंने उससे कहा कि सुख ऐसी चीज है, जिसके बारे में ज्यादा न सोचें तो अच्छा है। भगवत् कृपा से जीवन जैसे चल रहा है, चलने दो। मेरी इस बात से वह बहुत खुश हुआ। उसने कहा- आपकी बात से मैं भी सहमत हूँ। मैंने भी एक किताब में पढÞा था कि जब कोई आदमी बीमार होता है तो यदि वह अपनी बीमारी के बारे में ज्यादा न सोचे तो उसके लिए अच्छा होता है। इसी तरह से इनसान भी सुख और दुःख के बारें मे ज्यादा न सोचे तो अच्छा है। उस समय हम लोगों की बात पूरी हो गई और सन्तुष्ट हो हम अपने-अपने रास्ते चल पडेÞ।
जिसने मुझसे प्रश्न पूछा था, वह आदमी समाज में अच्छे मुकाम पर है। भौतिक रूप से वह सम्पन्न है। उसका काम-धंधा भी अच्छा चल रहा है, फिर भी उसने मुझसे कहा मैं जीवन में कुछ नहीं कर पाया। सब कुछ होने पर भी चारों ओर निराशा ही दिखती है। मैं सोचने लगा कि इतना होने के बाद भी वह आदमी निराश था तो इसका कारण क्या हो सकता है – फिर मुझे लगा कि व्यक्ति बडे-बडे सपने पाल लेता है, किंतु उनका पूरा होना तो सम्भव नहीं होता, इसलिए वह दुःखी होता है। वस्तुतः जीवन की हकीकत उसे मालूम नहीं रहती उसे अपनी बुद्धिमत्ता पर, अपनी कुशलता पर मिथ्या अभिमान होता है तथा भाग्य पर भी उसे बहुत भरोसा होता है। किंतु व्यवहार में कुछ और ही घटित होता है। जब उसका स्वप्निल मोहजाल देर-सबेर टूट जाता है तो वह उसे सहन नहीं कर पाता और दुःखी हो जाता है। ऐसा होना आम बात है। अतः ऐसे सुख की चाह नहीं करनी चाहिए, जो दुःख को जन्म दे।
दुःखी होने का एक और कारण भी है- इंसान को लगता है कि जब वह इस दुनियाँ से चला जाएगा तो उसका कोई नाम नहीं रहेगा। उसे लगता है कि वह बहुत बडÞा आदमी हो गया होता तो उसका नाम होता। इसका उसे मन ही मन असन्तोष होता है। वह भूल जाता है कि आजतक दुनिया के इतिहास में लाखों की संख्या में बडÞे-बडेÞ लोग हो चुके हैं। परंतु कौन किसको जानता है, यह मागकी हस्ती एक दिन तो मिटनेवाली ही है। नाम बर्डाई की चाह, दुख का महान कारण है। हमारे जाने के बाद हमरा नाम नहीं होगा, यह सोच-सोच कर जो हम दुःखी जीवन जी रहे हैं, इससे बडÞी मर्ूखता और क्या हो सकती है – अपनी महत्त्वाकांक्षा की पर्ूर्ति के लिए मनुष्य को कोशिश करते रहना चाहिए। पर इसे लालसा न बनने दें। अपनी शान्ति भंग न होने दें। अपना विवेक न खोएं।
यदि आप सच्चा नाम चाहते हैं तो उसका एक आसान-सा तरीका है कि लोगों से प्यार करना सीखें। इस बारे में एक उदाहरण प्रस्तुत है- बहुत साल पहले एक छोटा सा लेख मैंने पढा था, जो एक सच्ची घटनापर आधारित था। यह घटना शायद अमेरिका के किसी शहर में घटी थी। एक साधारण व्यक्ति, छोटे से कसबे में रहता था। उस कसबे के बजार से जब वह गुजरता था तो करीब हर दुकानदार से दुवा सलाम करते हुए जाता था। वह हर किसीसे मधुर सम्बन्ध बनाए हुए था। जब उस आदमी की मृत्यु हर्ुइ तो पूरा कसबा उसके अन्तिम संस्कार में शामिल था।
जीवन के लिए सुख के संसाधनों की बात की जाए तो यूरोप और अमेरिका के विकसित देशों में एक आम नागरिक के पास जीवन-यापन करने के लिए बहुत कुछ है। उनकी न्यूनतम जरूरतें पूरी हो जाती हैं। सरकार की ओर से उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है। सुख के कई साधन उनके पास होते हैं, फिर भी उन्हें सुख की इतनी चाहत लगी रहती है कि बहुत से लोग इन सब चीजों से ऊब जाते हैं। अति सुख के चक्कर में वे नशीली दवाइयों के आदी हो जाते हैं और अपनी जिन्दगी बरबाद कर लेते हैं। अतः इन साधनों में सुख मत खोजों, यह सुख का, आनन्द का रास्ता नहीं है। असली सुख की चाह है तो बाहर की ओर मत देखों, अपने अन्दर की ओर झाँकों। अतः यदि सुख की चाह है तो दुःख रूपी तृष्णा का परित्याग करो। र्
कई लोग कहते हैं कि जीवन का क्या भरोसा। कभी भी जीवन खत्म हो सकता हैं, दर्ुघटना, बीमारी से या और कोई कारण से। तो फिर मौजमस्ती क्यों न की जाए। उनकी यह बात सही है। जीवन का कोई भरोसा नहीं, परन्तु मौजमस्ती करने से वे क्या पा लेंगे – जीवन का अन्त तो होगा ही, परंतु मौजमस्ती करने से जो काम करने में वे पीछे रह जाते हैं, या पर्ढाई करने में पीछे रह जाते हैं, उसके कारण उन्हें आगे जाकर जो तकलीफ उठानी पडती है, इसे वे भूल जाते हैं। अतः मौजमस्ती को भूलो और अपने सच्चे स्वरूप का स्मरण करो। ऐसी मौजमस्ती करो कि तुम उनका गुलाम न बना। जिन्दगी मौजमस्ती के लिए नहीं है। यह कुछ कर गुजरने के लिए है। मैं तो प्रायः गीता और रामायण का उदाहरण देता हूँ- कर्म किए जा फल की चिन्ता मत कर। हमंे अपना जीवन वैसे ही बिताना चाहिए। राजा जनक को विदेह माना गया है। वे राजा थे फिर भी उन्हें योगियों, ऋषि-मुनियों से श्रेष्ठ माना गया है। सुनने में तो यह बात कितनी अजीब लगती है कि वे राजा के सब सुख भोगते थे, फिर भी ऋषि-मुनियों से श्रेष्ठ हो गए, क्योंकि वे सुखों के गुलाम नहीं थे। सुख के प्रति आसक्त नहीं थे। वे एक आदर्श जीवन बिताते थे।
कहने का सार यह है कि अपनी भौतिक तरक्की के लिए कोशिश करें, पर अपना विवेक न खोएं, विवेक रहेगा तो चूक नहीं होगी। मनोरंजन करें, पर उसका गुलाम न बनें। नशीली चीजों के व्यसन से बचें। दूसरों की यथाशक्ति मदद करें। रात को सोने से पर्ूव शान्त चित्त से दिनभर की बातों पर विचार करें। अच्छे लोगों की संगति करें। कुछ समय एकान्त में सतचिन्तन करें, इससे तृष्णा मरती है और सच्चे अभ्युदय का रास्ता खुलता है। भूतकाल की गलतियों या असफलताओं पर पश्चात्ताप करें और उन्हें न दोहराने की प्रतिज्ञा करें। जीवन के प्रति नवीन उत्साह रखें। अपनी ऊर्जा को समझें और उसे अच्छे कार्य में व्यय करें। ऐसा करने से जीवन की सोच बदलेगी, दुःख भागेगा और सुख स्वतः ही वरण करने के लिए उपस्थित होगा। सबसे अच्छी बात तो यही होगी कि सुख के मूल भगवान को हमेशा याद रखें।
भोग पर योग का अंकुश लगाना चाहिए।

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