सुधार की प्रक्रिया में बैंकिग क्षेत्र:
अजय श्रेष्ठ

देश के हिसाब से देखा जाए तो बैंको की आवश्यकता कम हर्ुइ है ऐसा नहीं है। लेकिन जिस कार्यक्षेत्र में बैंक अपना काम कर रही है उसमें विविधता लाना जरूरी है। बैंको की संख्या कुछ अधिक होने से भी थोडी मुश्किलें आई है। बैंक और वित्तीय संस्थाओं की संख्या जितनी भी अधिक बढी हो लेकिन सच्चाई यह भी है कि कई ऐसे क्षेत्र हैं दर्ुगम क्षेत्र जहां इन सुविधाओं से लोग आज भी वंचित हैं। ऐसे क्षेत्रों में बैंकिग सेवा शुरू की जाए तो बैंकिग क्षेत्र के माध्यम से देश के अर्थतंत्र की काया पलट सकती है। वैसे तो व्यावसायिक संस्थाओं की संभावना जहां होती है वहां अधिक लोगों का एकत्रित होना स्वाभाविक है। अब इसका परिणाम कहें या दुष्परिणाम विगत के कुछ वर्षें में अनुत्पादक क्षेत्र में निवेश बढना ही वर्तमान समस्या का कारण है। यह आरोप भी बैंकिंग क्षेत्र पर लगाया जाता है। होने के लिए तो नियंत्रण की विधि बहुत पहले ही अवलम्बन किया जाना चाहिए। अभी भी यह क्षेत्र सुधार के रस्ते पर जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है।
किसी भी नीति के प्रति प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है। यह कोई जरूरी नहीं है कि किसी भी नीति को शत प्रतिशत लोगों का र्समर्थन मिलेगा ही। एक ही धार में बह रही नदी को विपरित धार में मोडने से रेसिस्टेन्स आना भी स्वाभाविक ही है। लेकिन केन्द्रीय बैंक द्वारा इधर कुछ वर्षें से उठाए गए कदम को गलत भी नहीं कहा जा सकता है। पुराने हो चुके रोग को ठीक करना बहुत ही कठिन है। इसलिए तत्काल असर पड सकने वाले क्षेत्रों से इसकी त्वरित प्रतिक्रिया आई।
बैंक द्वारा खुद से ही सुशासन के साथ आगे बढना सबसे अच्छी बात होती है। अब यदि सुशासन ही नहीं होगा तो केन्द्रीय बैंक को तो नियंत्रण के उपाय करने ही होंगे। और इससे किसी को भी अन्यथा नहीं लेना चाहिए। समग्र बैंकिंग क्षेत्र में देखा जाए तो निक्षेप की वृद्धिदर विगत चार पांच वर्षें से कम देखा गया। चैत्र के बाद इसमें कुछ सुधार देखने को मिला है। एक तो र्सव साधार लोगों का बैंको पर से विश्वास उठने लगा है। इसके पीछे राजनीतिक अस्थिरता प्रमुख कारक हैं। पैसा जमा करने पर श्रोत बताने के नियम के कारण भी पैसा नहीं आ पाया है। बैंकिग क्षेत्र इस समय करेक्सन की फेज में है।र्
अर्थशास्त्र के सिद्धांत में भी तो अस्वाभाविक नाफा है तो फिर किसी ना किसी समय स्वाभाविक विन्दु में आएगा ही। पहले बैंकिंग क्षेत्र में कम संख्या होने की वजह से नाफा जल्दी होता था लेकिन आज कल कम्पीटीशन बहुत है। शत प्रतिशत लाभ की संभावना नहीं होती है। विगत दो तीन वर्षें से हम मास बैंकिंग के तरफ लगे हैं। उसी आधार में शाखा विस्तार करने और सेवा संचालन करने का हमारा प्रयास है।
१६ वषर्ाें के संचालन में आए १ लाख ३० हजार खाता ही है। गत वर्षहम ३८ हजार नए खाता का संचालन लाने में हम सफल हुए। जनमानस में बचत करने की आदत डालने के लिए भविष्य के लिए बचत नारा सहित चेतनामूलक कार्यक्रमों को कर रहे हैं। इसमें हमारा व्यावसायिक स्वार्थ नहीं है। जहां से भी बचत करनी चाहिए इस उद्देश्य के साथ चेतनामूलक कार्यक्रम कर रहे हैं। बाजार बिस्तार किया जाने की रणनीति पर हम चल रहे हैं। सरल बैंकिग करते हुए अधिक से अधिक जनमानस में जाना ही हमारा उद्देश्य है।
-लेखक बैंक आँफ काठमाण्डू के र्सर्ीइओ है)
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