सुलगते सवाल मधेश के, देश हमारा है, राज्य नहीं : उपेन्द्र यादव

डा. श्वेता दीप्ति : युद्ध ने कभी किसी का भला नहीं किया है, यह जग जाहिर है । देश अब तक द्वन्ध की पीडा से उबर नहीं पाया है । आज तक कई नम आँखें हैं जो अपनों को swetadiptiतलाश रही हैं । कभी जनयुद्ध के नाम पर कभी राष्ट्रहित के नाम पर जो गुम हो गए वो नहीं आएँगे पर उनकी शहादत का हम क्या सिला दे रहे हैं – क्या र्फक पडÞता है कि फिर किसी माँ की कोख उजडÞ जाए, किसी की माँग का सिन्दूर मिट जाए या किसी अबोध के माथे से उसके पालनकर्त्तर्ााा हाथ हट जाए – क्यों र्फक पडÞेगा देश के ठेकेदारों को – उन्हें तो देश की बागडोर हमने ही सौंपी है, तो हमारे भाग्यविधाता तो वही हुए । जनता मरे या जिए इनसे उन्हें मतलब नहीं और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि सडÞक पर उनके बच्चे नहीं उतरते, वो तो कहीं विदेश अपने भविष्य को सुधार रहे होंगे । मरती तो हर हाल में देश की गरीब जनता है । वर्षों से दमित मधेश की उम्मीद भरी आँखें देश के कर्ण्र्ाारों पर टिकी हर्ुइ थीं । किन्तु संसद भवन में जो माघ आठ को हुआ और जो माघ ग्यारह को हुआ उसने तो मधेश की जनता को ही नहीं, हर नेपाली जनता के विश्वास पर कुठाराघात किया है । विपक्षी दल के द्वारा जो हुआ निःसन्देह वह मर्यादा विपरीत था और उनके हताश मन का परिचायक भी किन्तु, सम्मानीय सभाध्यक्ष महोदय ने जो किया, उसे किस श्रेणी में रखा जाय –  सुरक्षा बलों के बीच बैठकर उन्होंने जो प्रक्रिया का प्रस्ताव पढÞा और उसे पारित कराया इसमें उनके मन की हताशा या दुखी भावना को हम नहीं देख सकते, इसे सिर्फऔर सिर्फएक कठपुतली के रूप में ही लिया जा सकता है, जिसकी डोर इसबार कहीं और नहीं बल्कि सत्ता के मद में चूर हाथों में थी । देश अगर एक शरीर है तो उसका हर अंग चाहे वह छोटा हो या बडÞा मायने रखता है, अगर एक अंग भी कटता या टूटता है तो, वह अपाहिज ही कहलाता है । इतनी छोटी सी बात क्या हमारे भाग्यविधाताओं को समझ में नहीं आ रही – अपने ही देश को अपाहिज बनाने पर ये क्यों तुले हुए हैं – क्या मधेश की मिट्टी और वहाँ के खून से इनका कोई वास्ता नहीं – सत्तापक्ष का एक भी ऐसा प्रयास सामने नहीं आ रहा जिससे कि ये लगे कि मधेश के दर्द पर दवा लगाने का काम कर रहे हैं । बल्कि यहाँ तो जख्म को नासूर बनाने की पूरी तैयारी नजर आ रही है ।

upendra yadav

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मधेश की जनता के मन में कई प्रश्न कौंध रहे हंै – आखिर सत्ता पक्ष की इस हठी सोच के पीछे कौन सी शक्ति काम कर रही है – कौन सा ऐसा दवाब या स्वार्थ है कि उस जनता की भावना का कोई अर्थ नहीं रह गया है, जिसकी शहादत की वजह से ये सत्ता भोगी सत्ता का आनन्द ले रहे हैं – सामने जो अंतर्रर्ाा्रीय सोच दिख रही है वह यही है कि सहमति के आधार पर संविधान बने किन्तु, कुछ तो ऐसा है जो सत्तापक्ष को संदेह के घेरे में ला रहा है । इन्हें आखिर ऐसा कौन सा पाठ पढÞाया गया है, लालच दिया गया है कि ये देश को द्वन्ध की राह पर ले जाने को तैयार हैं – पहाडÞ और तर्राई द्वन्ध के उस मुहान पर है जहाँ बस एक चट्टान है, जिसने उसे रोका हुआ है, किन्तु अगर यह हटा तो सबको पता है कि उस वेग के दवाब को झेलना मुश्किल हो जाएगा और फिर वह वेग अपने साथ क्या-क्या बहा ले जाएगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है ।
ऐसे ही सवालों के साथ मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय उपेन्द्र यादव जी से देश की वर्तमान अवस्था के सर्ंदर्भ में हर्ुइ बातचीत का संपादित अंशः
० संविधान निर्माण प्रक्रिया में शुरु हुए गतिरोध के बारे में आप की क्या धारणा है  –
– पहली बात तो मैं यह बताना चाहूँगा कि संविधान सभा से संविधान निर्माण की प्रक्रिया कैसे शुरु हर्ुइ । सभी जानते हैं कि जो सशस्त्र संर्घष्ा हुआ, मधेश आन्दोलन हुआ और उसके बाद आजतक हम जहाँ पहुँचे हैं उसके क्या उतार-चढÞाव रहे हैं । हमें जो मिला इन आन्दोलनों से, हमारी जो उपलब्धि रही उसे संवैधानिक रूप में व्यवस्थित करने के लिए ही संविधान निर्माण की आवश्यकता है और उसी प्रक्रिया में हम लगे हुए हैं ।  अंतरिम संविधान में जो निश्चय हुआ कि कैसा संविधान बनेगा उसे ही नजरअंदाज किया गया ।  अभी तक कई सवालों पर हम अटके हुए हैं या यूँ कहिए कि उन्हें जान बूझकर अनदेखा किया जा रहा है । पिछले संविधान सभा में संविधान निर्माण नहीं हो पाया । क्योंकि कई परिवर्तित जो मसले थे समावेशीकरण, संघीयता, विभेद का अंत, पहचान, लैंगिक असमानता ये ऐसे सवाल थे जिसे काँग्रेस और कम्यूनिस्ट ने सम्बोधन नहीं किया । इन मुद्दों को संविधान में शामिल करने से इनकार कर दिया गया । जिसकी वजह से संविधान निर्माण नहीं हुआ और संविधान सभा विघटित हो गई । अगर आधार तय हो गया होता कि कैसा संविधान चाहिए तो यह काम आसान हो गया होता । किन्तु ऐसा नहीं हो पाया ।  फिर जब दूसरे संविधान सभा का चुनाव हुआ तो उन्हीं मुद्दों को सम्बोधन करना था । साथ ही पिछले संविधान में जो समझौते हुए थे उन्हें उसी प्रकार शामिल किया जाना था, पर यह नहीं हो पाया क्योंकि इस चुनाव के बाद काँग्रेस और एमाले बहुमत में हैं और इसी मद में वो पहले हुए सभी समझौतों को उलटने की कोशिश कर रहे हैं । हमारे पास बहुमत नहीं है तो उन्हें लग रहा है कि वो कुछ भी कर सकते हैं । यही जिद और अंतरिम संविधान में शामिल बातों को मानने से इनकार करना ये सारी वजहें थीं कि संविधान निर्माण नहीं हो पाया । संविधान नहीं बनने का मूल कारण है संघीयता और समावेशीकरण । संघीयता अर्थात पहचान की संघीयता जहाँ पहचान को सम्बोधन करे, समावेशी जहाँ वर्षों से जो नीति निर्माण और शासन आदि अधिकार से हम वंचित हैं उसे दें । ये दो ऐसी वजहें हैं जिन्हें ये नकार रहे हैं और अगर ऐसा होता रहा तो अवरोध जारी रहेगा । एक वर्ग विशेष जो आज तक विभेद सहता आया है उसे आज भी अधिकारों से वंचित रखने की साजिश की जा रही है । मधेश आन्दोलन के बाद राज्य ने यह माना था कि स्वायत्त मधेश मिलेगा, मधेशियों को समान अधिकार प्राप्त होगा, लैंगिक विभेद खत्म होंगे, राज्य के सभी निकायों में उसकी भागीदारी होगी पर आज इसका उल्टा हो रहा है । तो कारण स्पष्ट है कि जबतक इन मुद्दों पर गम्भीरता से बात नहींं होगी, अंतरिम संविधान में जो अधिकार प्राप्त थे उसे नहीं माना जाएगा, तब तक संविधान निर्माण की प्रक्रिया में गतिरोध उत्पन्न होता रहेगा ।
० संविधान सभा में सभामुख ने जो कदम उठाए क्या वह विधि सम्मत था –
– निःसन्देह नहीं । सभामुख ने मर्यादा विपरीत काम किया । बहुमत सरकार को राज्य चलाने का अधिकार देती है ना कि बहुमत के अधिकार पर संविधान निर्माण का । संविधान निर्माण, बहस और विचार का विषय होता है, किन्तु  इन्होंनेे बहुमत को ही इसका आधार मान लिया है । आजतक किसी भी देश में ऐसा नहीं हुआ जो सभामुख ने किया है । विचारों को दबाने के लिए सभाभवन को सैेनिक बेरेक में तब्दील कर के प्रस्ताव पढÞा गया और उसी माहौल में पारित किया गया । संविधान बनाना कोई परीक्षा नहीं है, जहाँ प्रश्नावली तैयार किया जाय और और उसे चिहृनित कर परीक्षा पास कर ली जाय ।  संविधान निर्माण में उससे सम्बन्धित विषयों पर चर्चा की जाती है । प्रश्न बनाकर आज तक कहीं संविधान बना है । हमने इस पर एतराज जताया, हम बात करने को तैयार थे, हमने कहा कि अभी दो दिन बाकी है पर, उन्होंने कहा कि हम विपक्षियों से बात नहीं करेंगे । हमने कहा कि हम संविधान सभा में विपक्षी नहीं हैं,  हम ससंद में विपक्षी हैं । हम मिलकर इसका समाधान खोज सकते हैं किन्तु, ऐसा नहीं हुआ और संविधानसभा को सैनिक छावनी में परिणत कर प्रस्ताव पारित कर दिया गया । इस बात को कोई सही नहीं कह सकता क्योंकि यह सही है ही नहीं । सभामुख का पद एक निष्पक्ष पद होता है । वह किसी के दवाब में नहीं आता है । अब, जब हर ओर आलोचना हो रही है, तो कह रहे हैं कि बात कीजिए । किन्तु अब तो, जो निर्ण्र्ााउनके द्वारा हुआ है, उसे जब तक गलत नहीं कहा जाय, उसे उल्टाया नहीं जाय तो, बात चीत का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है ।
० आज मधेशी जनता एक और सवाल से जूझ रही है, जो नेतागण कल तक र्समर्थन और सहमति की बातें कर रहे थे आज उनके सुर कैसे बदल गए हैं – कल तक भारत के गुण गाने वाले ओली आज इतने उग्र कैसे हो गए हैं कि बात करने की तमीज तक भूल गए हैं – आखिर इसके पीछे कौन सी शक्ति है, क्योंकि यहाँ जो भी होता है उसका सीधा आरोप भारत पर लगता है, पर अभी यह सब किसके द्वारा संचालित हो रहा है –
– विशुद्ध रूप से वर्गीय और जातीय स्वार्थ है, जो मधेशियों के ऊपर और जनजातियों के ऊपर लादना चाहते हैं । जहाँ तक भारत का सवाल है तो भारत ने स्पष्ट तौर से कह दिया है कि संविधान निर्माण सहमति से बने और सबको साथ लेकर बने । भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने तो ट्रमा सेन्टर के उद्घाटन में स्पष्ट रूप से कह दिया था कि सहमति से संविधान बनाइए ।  भारत ही नहीं, संयुक्त राष्ट्रसंघ और यहाँ जितने भी अन्तर्रर्ाा्रीय कूटनीतिज्ञ हैं, इन सबने यहाँ तक कि चाइना ने भी कहा कि मधेशियों को साथ लेकर चलो पर, अभी ये बहुमत के नशे में हैं, इनकी एक ही मानसिकता है कि मधेशियों और जनजातियों को दबा कर और अधिकार से वंचित रखा जाय । राजकीय स्वार्थ है और कुछ नहीं । आज ये कह रहे हैं कि मधेश ढूँढना है तो यू.पी. बिहार में ढूढो  तो क्या मधेश वहाँ मिलेगा – तो फिर नेपाल में क्या है – ऐसे गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य से स्थिति और भी बिगडÞती चली गई ।
० मधेशियों के सेना में प्रवेश सम्बन्धी मांग की स्थिति क्या है – क्या संविधान में इससे सम्बन्धित प्रावधान शामिल किए जा रहे हैं –
– नेपाली सेना से सिर्फशाही शब्द हटा दिए गए हैं, किन्तु इसका चरित्र शाही सेना का ही है । यह सेना विशुद्ध रूप पहाडिÞयों की सेना है । इस सेना का लोकतांत्रिकरण, समावेशीकरण, आधुनिकीकरण करना है । सेना में भी आरक्षण की व्यवस्था है, कानून है, पर व्यवहार में नहीं है । काँग्रेस और एमाले यह नहीं चाहते हैं कि सेना में मधेशियों की पहुँच हो ।  मैं एक बात बताऊँ कि जब मैं विदेश मंत्रालय में गया तो वहाँ मैंने देखा कि पूरे मंत्रालय में सिर्फएक मधेशी था, वह भी जनकपुर के धनन्जय झा । रक्षामंत्रालय में कोई नहीं और गृहमंत्रालय में छोटे-छोटे पदों पर हैं, पर कोई बडÞा अफसर नहीं है । जिस देश में गृह, रक्षा और अर्थ में मधेशियों की सहभागिता ना हो वह तो अस्तित्व विहीन है । यह देश मधेशियों का है पर राज्य उनका नहीं है । उसमें जीने की जो विवशता हमारी है वह लडर्Þाई तो चल ही रही है और यही हमारी मांग है कि हमारा राज्य हो जहाँ की शक्ति, आमदनी और शासन में हम हों ।
० आपने कहा देश हमारा है राज्य नहीं । ऐसी ही एक मांग मधेश से उठ रही है स्वतंत्रता और स्वराज्य की, और इससे जुडÞा नाम उभर रहा है सी.के. राउत का । पहले भी सशस्त्र आन्दोलन करने वालों से सरकार ने बात चीत की है तो आज इससे क्यों कतरा रही है – इस सर्ंदर्भ में आपका क्या कहना है –
– देखिए जो हो रहा है वह सुनियोजित है । अगर अलग देश की मांग उठती है तो प्रदेश का सवाल कहीं पीछे छूट जाएगा । सी.के.राउत को सरकार ही हीरो बना रही है । वह चाहती है कि एक गलत संदेश प्रसारित हो मधेश इसमें उलझ जाय और उनकी अधिकार की मांग वहीं खत्म हो जाय । इसलिए उसे जानबूझ कर पकडÞा जा रहा है और छोडÞा जा रहा है । मधेशियों को उलझाकर एक तीर से दो शिकार कर रहे हैं । जो मीडिया मधेश का म नहीं सुनना चाहते थे वो सी.के.राउत पर गाथा लिख रहे हैं । यह सभी सोची समझी साजिश है । हम देश नहीं तोडÞना चाहते प्रदेश चाहते हैं । अलग देश तो सम्भव ही नहीं है । सत्ता मधेश को उलझाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रही है । सरकार को सबसे ज्यादा फायदा हो रहा है । सरकार मधेश में अलग देश का सवाल फैलाकर -माध्यम राउत जैसे लोग बन रहे हैं) मधेशी और पहाडÞी समुदाय में मतभेद उत्पन्न करा रही है और यह एक विस्फोटन की स्थिति पैदा कर सकता है । पर ऐसा नहीं होगा क्योंकि मधेशी जनता कभी ऐसी बातों का र्समर्थन नहीं करेगी ।
० आपने हमेशा एक मधेश और एक प्रदेश की मांग की है क्या यह सम्भव है –
– मधेश ने जो बलिदान दिया है, राज्य ने जो समझौता किया है कि अंतरिम संविधान में यह उल्लेख है कि स्वायत्त मधेश प्रदेश बनेगा और बाकी को भी मिलेगा । इस पर पिछले संविधान सभा ने जो समझौते किए हैं और उसे र्सवसम्मत ढंग से अन्तरिम संविधान में शामिल किया गया । लेकिन बाद में क्या हुआ कि मधेश में इन लोगों ने फूट डाल थी । थारु, मुस्लिम आदि जातियों को भडÞकाया जाने लगा लेकिन जो समझौते एक मधेश एक प्रदेश के हुए हैं हम तो उसी पर टिके हैं । लेकिन अगर सहमति की बात होती है और यह कहते हैं कि पश्चिम में भी पश्चिम के मधेशियों  का राज्य हो तो हम मान भी सकते हैं लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है । बल्कि उसके आडÞ में क्या हो रहा है कि मधेश को तोडÞ कर पहाडÞ से जोडÞने की साजिश की जा रही है । मधेश को पाँच टुकडÞों में बाँट कर पहाडÞ को तीन टुकडÞे देने की साजिश हो रही है और अगर ऐसा हुआ तो फिर ना जाने कई पीढियों तक मधेश गुलाम बन जाएगा और एक बार फिर खस शासक का ही शासन कई पीढिÞयों तक चलता रहेगा । हम यह नहीं होने देंगे । मधेशियों का बलिदान बर्बाद नहीं होने देंगे । अगर जवरदस्ती ऐसा किया गया तो फिर आन्दोलन होगा यह तय है । फिर संर्घष्ा होगा, फिर  ।
० क्या आपको लगता है कि एकबार फिर मधेश आपके आहृवान पर आगे आएगा और आपका साथ देगा –
– मधेश लडÞेगा और जीतेगा भी । उसे उसका अलग राज्य मिलकर रहेगा । गुलामी को अब सहने की स्थिति नहीं है । जहाँ विभेद है वहाँ व्रि्रोह है । आज ना हो कल हो पर व्रि्रोह तय है और व्रि्रोही हमेशा जीतता भी है इसका गवाह विश्व इतिहास है । अत्याचारी भले ही कुछ दिनों तक जीत जाय पर यह अवधि अधिक दिनों की नहीं होती है । वह हारता है और उसका नाश होता है । जो अन्याय के खिलाफ लडÞता है वह जीतता है । भले ही शुरु में उसकी लडर्Þाई कमजोर हो पर बाद में जीत उसी की होती है क्योंकि उसकी लडर्Þाई अत्याचार के खिलाफ होती है ।
० नागरिकता के सवाल पर आपकी नीति क्या है –
– शुरु से ही नागरिकता को राज्य में मधेशियों के विरुद्ध अशस्त्र के रूप में प्रयोग किया गया है । उन्हें अधिकार से वंचित रखने के लिए इसका उपयोग किया जाता रहा है । वहाँ हदबन्दी लागु किया गया कहा गया कि जिसके पास नागरिकता है जमीन उसी की होगी । अब जिनके पास नागरिकता नहीं है तो जमीन तो उसके हाथ से चली गई । रोजी रोटी सब से वंचित करने के लिए भी नागरिकता का प्रयोग किया जाता रहा है । यहाँ तक कि मधेशियों को गैरनागरिक के तौर पर रखने के लिए भी नागरिकता का प्रयोग किया गया है । अब युग बदला है । जो यहाँ पैदा हुआ उसे नागरिकता मिलनी चाहिए । इसमें कोई लैंगिक असमानता नहीं होनी चाहिए । मान लीजिए कोई बच्चा छोटा है और उसके पिता का निधन हो जाय तो क्या उसे नागरिकता नहीं मिलेगी – यह तो अन्याय हुआ । इसलिए माँ के नाम पर भी नागरिकता मिलनी चाहिए । नागरिकता नहीं मिली तो क्या वो नागरिक नहीं है । जिस दिन धरती पर जन्म होता है, वो उसी दिन उस धरती का हो जाता है ।  हमने कहा कि नागरिकता में लैंगिक असमानता नहीं होनी चाहिए । माँ और पिता दोनों मंे से किसी के नाम से भी नागरिकता मिलनी चाहिए पर सत्तापक्ष ने कहा कि नहीं माँ और पिता दोनों को यहाँ का नागरिक होना पडÞा तभी नागरिकता मिलेगी हमारा यहीं मतभेद है । दूसरी बात वैवाहिक सम्बन्धों में क्या होता है कि अगर पुरुष किसी अन्य देश की लडÞकी से विवाह करता है तो उसे तुरन्त नागरिकता मिल जाती है और यही अगर स्त्री करती है तो उसे १५ वर्षों तक इंतजार करना पडÞता है तो यह तो बिल्कुल सही नहीं है । १५ वर्षों में तो कई बच्चे हो जाएँगे तो वो तो सफर करेंगे । लोकतंत्र में लैंगिक असमानता नहीं होनी चाहिए । राज्य वैमनस्यता के पक्ष में है । विभेद अगर है तो लोकतंत्र कमजोर होगा और इसे अगर मजबूत करना है तो इस लैंगिक असमानता को खत्म करना होगा । विभेद और लोकतंत्र दोनों एक साथ चल ही नहीं सकते हैं ।
० आन्तरिक औपनिवेश क्या है –
– औपनिवेश का अर्थ होता है एक समुदाय के उपर दूसरे समुदाय का शासन । मधेश कालान्तर में नेपाल का हिस्सा नहीं था । उसे जबरन हथियाया गया । इसके बाद उसपर गोर्खा राजाओं ने अपना विस्तार किया, अत्याचार का शासन किया और धीरे-धीरे वहाँ की सारी शक्तियों को अपने हाथों में ले लिया । और आज तक किसी न किसी रूप में मधेश शोषित हो ही रहा है । एक ही देश के थे किन्तु उनका चरित्र शोषक का था । मधेश को अत्याचार और शासन की जगह बनाई गई । इसी को आन्तरिक औपनिवेश कहा गया, क्योंकि अत्याचार करने वाले अपने ही देश के थे, बाहर के नहीं थे । जब तक इनके इस शोषक  चरित्र से मधेश को मुक्त नहीं कराया जाएगा, तब तक यह लडर्Þाई चलती रहेगी । जनजातियों के साथ भी वही हुआ है । इसे खत्म करके स्वशासन की व्यवस्था करनी होगी, आत्मअधिकार का निर्ण्र्ाादेना होगा । मधेश को उसके जल, जमीन सब पर उसका अधिकार चाहिए,  और यह राज्य को देना होगा । जब तक यह नहीं मिलेगा तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे । यह लडर्Þाई बहुत लम्बी चलेगी क्योंकि, इतनी आसानी से ये देने वाले नहीं हैं ।
० मोर्चा में विघटन के संकेत आ रहे हैं, मोर्चा को विजय गच्छेदार जैसे नेता छोडÞने का मन बना चुके हैं । इस सर्ंदर्भ में आपका क्या कहना है –
– देखिए, कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि हम सब आखिर सैकडÞों साल से गुलामी की जिंदगी कैसे जी रहे हैं – और इसके मूल में यही समझ में आता है कि हमारे भीतर ही कमी-कमजोरियाँ हैं । आज भी अवसरवादियों की कमी नहीं है । बगीचा छीना जा रहा है और एक आम खाने को मिल जाता है तो उसे ही कुछ लोग उपलब्धि मान लेते हैं, और यही वजह है कि हमारी यह स्थिति है । राजनीतिक विचारधारा की कमी है । दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं है । छोटे-छोटे पदों का लोभ दिया जाता हैं और ये उसके पीछे चल देते हैं । बडÞे पद मिल जाएँ तो ये अन्धे ही हो जाते हैं । यह मानसिकता आज तक बनी हर्ुइ है । विगत से कुछ सीख आज तक नहीं ले रहे हैं । विगत की गलती की वजह से आज जहाँ हम पहुँचे हैं, उससे इन अवसरवादियों को सीख लेनी चाहिए जो ये नहीं कर रहे हैं ।
०आपने कहा विगत में हर्ुइ गलतियाँ, तो क्या आपको लगता है कि मधेश की जनता फिर आप पर विश्वास कर पाएगी –
– जनता भावुक होती है । गलतियों की सजा वो दे चुकी है । किन्तु वो यह भी देख रही है कि जिसे उसने चुना वो इनका कितना साथ दे रहे हैं । आज वही उन्हें तोडÞने की कोशिश कर रहे हैं । उन्हें उनके अधिकार से वंचित करने की पूरी कोशिश में लगे हुए हैं, ऐसे में फिर उनकी सोच तो बदलेगी । क्योंकि हम उसी मिट्टी के हैं और उनके ही हैं । गलती हर्ुइ, किन्तु इसे सुधारने का अवसर भी उन्हें ही देना होगा । जब हम उनके लिए लडÞेगें तो, उन्हें विश्वास करना होगा । परिवर्त्तन सृष्टि का नियम है और इसी के तहत सब होता है । हम अपनी धरती पर और दमन होते नहीं देख सकते । मधेश और मधेश की जनता जग चुकी है । अब वो और गुलामी नहीं सह सकते ये तो आप मान कर चलिए । इसलिए परिवर्त्तन अवश्यम्भावी है ।
० आन्दोलन हुआ तो क्या आपकी कोई नई मांग होगी –
– नहीं हमारी कोई नई मांग नहीं है । हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट है । हमें स्वायत्त प्रदेश चाहिए । आत्मनिर्ण्र्ााका अधिकार चाहिए । मधेश राज्य की मांग हमारी प्रमुखता है और केन्द्र में हमारी भागीदारी होनी चाहिए । और हम यह विश्वास दिलाना चाहेंगे कि अलग प्रदेश होने के बाद भी वहाँ जो गैर मधेशी हैं उन्हें हम विभेद की पीडÞा नहीं देंगे, उन्हें हम पूरा सम्मान देंगे ।  क्योंकि हमने स्वयं ये झेला है । हम इस तकलीफ से गुजर चुके हैं । उन्होंने जो किया हमारे साथ, वो हम उनके साथ कभी नहीं करेंगे ये यकीन मैं दिलाना चाहता हूँ ।
० आज देश जिस दौर से गुजर रहा है उसमें पडÞोसी राष्ट्रों की क्या भूमिका होनी चाहिए – होनी भी चाहिए या नहीं –
– उनका जिज्ञासु होना स्वाभाविक है, लेकिन यह पर्ूण्ातः हमारे देश का आन्तरिक मामला है । इसे आन्तरिक रूप में ही सुलझाना होगा । लेकिन इससे अगर मानवअधिकार का हनन होता है, किसी अन्तर्रर्ाा्रीय कानून का उल्लघंन होता है और अगर दूसरे राष्ट्रों के आन्तरिक व्यवस्था पर असर होता है तो उनका ध्यान  जाना आवश्यक हो जाता है । किन्तु यह पूरी तरह देश का आन्तरिक मामला है और इसे हमें ही सुलझाना है ।
ये थे वो चंद सवाल जो हमारे जेहन को हमेशा झकझोरते हैं । एक विचारधारा जो माननीय उपेन्द्र महोदय जी के द्वारा सामने आई कि मधेश अब चुप नहीं रहेगा । उसे उसका अधिकार राज्य को देना ही होगा, चाहे वह सहमति के आधार पर दे या एक बार फिर मधेश को आन्दोलन की राह चुननी पडÞे । इस आधार पर क्या हमें राज्य से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह मधेश की भावना को समझे और पर्ूव में जो समझौते हुए हैं उन्हें संविधान में शामिल करे और सम्बोधित करे । जो उग्र रूप सत्ता अपना रही है उसे छोडÞना ही देश हित में है । क्योंकि अगर मधेश नेपाल का ही हिस्सा है तो उसे अशांत कर के पूरा देश कभी शांत नहीं रह पाएगा । देश द्वन्ध की राह पर अग्रसर ना हो इसकी जिम्मेदारी सत्तापक्ष की है । दमन की नीति व्रि्रोह को जन्म देती है और व्रि्रोह की आग में कोई एक पक्ष ही नहीं जलता है इसकी लपटें सबको प्रभावित करती है क्योंकि आग यह नहीं देखती कि कौन उसका अपना है और कौन पराया ।

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