सुहानासफर
गनेश कुमार लाल

दिल्लीका नाम दिल्ली किसने रखा, यह तो मालूम नहीं पर इतिहासकार इब्बार रब्बी के अनुसार दिल्ली में तुगलक वंश की स्थापना सुल्तान गाजी तुगलक का नाम सन् १३२५ से उल्लेखित किया

English: India Gate, Delhi

English: India Gate, Delhi (Photo credit: Wikipedia)

पाया गया है।

दिल्ली अभी भारत की राजधानी है। इसे बहुत बार कितने बादशाहांे ने मचला, कुचला और बनाया। पर सभी ने अपने समय सामर्थ्य के अनुसार दिल्ली को बनाया भी, और बाबर से लेकर अंग्रेजों ने भी इस स्थान की खासियत को देखते हुए अपनी पृष्ठभूमि बनायी।
आखिर बिना उपलब्धि के अहसास के कोई शासक खुश रह भी कैसे सकता है – जीवन का रस तो उतार-चÞÞाव में है, पाने और खोने में है। सुख और दुःख में है, यानी कि द्वैत में है। इसलिए तो मैदान में दिल्ली के मेट्रो का मन नहीं रमता। उसे रात के ग्यारह बजे तक यात्रा कराने में मन लगता है। वह निरन्तर अपने कर्तव्यपथ में दौडÞती रहती है।
सुख धन में नहीं, उसे खर्च करने के तरीके में है, उसी तरह आनन्द उस में है, जिसमें हम रम जाते हैं। इस तरह का आनन्द दिलाती है, हमें दिल्ली का मेट्रो रेल यातायात सेवा। आगे का स्टेशन कौन सा है, दरबाजा दायी ओर खुलेगी या वायी ओर, दरबाजे के निकट कितनी दूर पर खडÞा रहना है। यह सब जानकारी यात्री वर्ग मेट्रो रेल के भीतर ही बैठ कर आवाज और डिÞसप्ले दोनों से आसानी से जान पाते हैं।
यदि आप को चाँदनी चौक जाना हो, शास्त्री नगर जाना हो अथवा अक्षरधाम जाना हो, सभी जानकारियाँ मेट्रो रेल सेवा में बैठे हुए सहज रुप से प्राप्त कर सकते है। इस तहर जीवन में विज्ञान के आविष्कारों ने नयाँ अंजाम दिया है। यात्रा करना सहज हो गया है। आर्थिक समृद्धि और आधुनिक विज्ञान मिलकर बहुत सी अनिश्चितताएं कम कर दी गई हैं। जीवन का रस तो शेष रह गए उद्देश्यों में है। इसलिए कोई भी लक्ष्य अन्तिम न बने। जीवन मेट्रो रेल सेवा की तरह लगातार चलते रहना चाहिए। यात्रा के किसी भी साधन का उपयोग कर आप अक्षरधाम असानी से पहुँच सकते हैं। यह अक्षरधाम आधुनिक चित्रकला, मर्ूर्तिकला, प्रायोगिकी, संचार का उत्तम तथा सम्मिश्रति रुप से बनाया गया और सजाया गया मनोरम स्थान है।
भक्तिमार्ग में लगे मानस पुत्र स्वामिनारयण की भक्ति श्री विष्णु की अनुपम कृपा का सुन्दरतम मन्दिर है। इस में अनेक द्वार है। पर भक्तिद्वार सब से अलग पहचान बनाए हुए हैं। परम्परागत भारतीय शैली का यह प्रवेशद्वार आप को ले चलता है, भक्तिभाव के एक अनोखे धाम की ओर। भक्ति, अर्थात् परमात्मा के प्रति विशुद्ध प्रेम सागर में। सनातन धर्म परम्परा में भक्त-भगवान के दिव्य युगल भक्ति के आदर्शाें का शाश्वत बोध देते हैं। भक्ति एवं उपसना के ऐसे २०८ युगल स्वरुप इस भक्ति द्वार में मंडिÞत है।
यहाँ आकर नीलकण्ठ दर्शन करना कभी न भूलें। महाकाव्य सी फिल्म, जो दिल के धडÞकनों को तेज करते हुए गाथा सुनाती है। बालयोगी नीलकण्ठ की, जिन्होंने ७ वर्षतक नंगे पैर १२,००० कि.मि. भारत की पदयात्रा की थी, ८५ह६५ फूट के महाकाव्य चित्रपट पर देखे। १९वी सदी के भारत की एक झलक, १०८ स्थलों पर फिल्मांकन, ४५,००० पात्र और दिल धडÞकाने वाली दृश्यावली आदि से यह फिल्म अभिभूत कर देती है। सत्य घटना पर आधारित इस फिल्म में भारत के तीर्थो, उत्सवों, सांस्कृतिक परम्पराओं और उच्च मूल्यों को प्रस्तुत किया जाता है।
यहाँ आकर यदि चाहते है तो यज्ञपुरुष कुण्डÞ एवं संगीतमय फब्वारे को भी देखना न भूलें। लाल पत्थरों से निर्मित यह कुण्डÞ प्राचीन भारतीय कुण्डÞ, परम्परागत विशालतम कुण्डÞ है। कहा जाता है कि यह कुण्डÞ भारत में सब सबे बडÞा है। कुण्डÞ के मध्य में कमलाकार जलकुण्डÞ में अदभुत संगीतमय फव्वारों द्वारा सृष्टि के र्सजन, संपोषण एवं संहार की प्रक्रिया का दर्शन हृदयस्पर्शी है।  जल, ज्योति और जीवनचक्र का यहाँ अद्भुत संयोजन है। कुण्डÞ के सामने २७ फूट उचे बालयोगी नीलकण्ठ ब्रहृमचारी का मनोहर धातुशिल्प उन्नत प्रेरणा देता है।
आधुनिक विज्ञान ने दूरसंचार और यातायात के साधनों में जो, श्रीवृद्धि की है, इसके द्वारा अवश्य ही आप अपनी यात्रा दिल्ली स्थित स्वामिनारायण अक्षरधाम आसानी से जा सकते हैं। प्रभु की अनुपम कृपा का दर्शन अब आप के लिए बहुत ही आसान हो गया है।ढ

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