सूर साहित्यः एक दृष्टि:
डा. मृदुला शर्मा

शक्ति मार्ग के उषाकाल में अर्थात् एग्यारहवीं खृष्टाब्दी के कुछ कवियों ने उस अनन्त की खोज की जिनके आदर्शों को आजतक नहीं भुलाया जा सका है। कृष्ण भक्ति शाखा के अर्न्तर्गत सूरदास का नाम आज भी अग्रिम पंक्ति में श्रद्धा और भक्ति से लिया जाता है। सूरदास ने श्रृंगार रस के अर्न्तर्गत श्रृंगार के दोनों पक्ष संयोग और वियोग का दिशद चित्रण किया है। एक अंधे कवि के अनुभावों और संचारी भावों का अप्रतिम लालत्य और सतेज चमत्कार पाठक तथा श्रोता को सागर की उत्ताल तरंगों-सा काव्य रस में भिंगो देता है। जैसे-
कर पग गहि आँगुठा झुख मेलत
प्रभु पौढÞे पालने अकेले हरषि हरषि अपने रंग खेलत।
सूरदास के जन्म और जन्मान्ध होने के सम्बन्ध में विद्वानों के बीच पर्याप्त मतभेद है। अपने जन्म के सम्बन्ध में सूरदास ने अपनी सूरसारावली में अपनी अवस्था सडÞसठ वर्षकी स्वीकार की है।
‘गुरु पद परसाद होते यह दर्शन सरसठी बरस प्रवीण’
परन्तु पुष्टिमार्ग के अनुयायियों के बीच यह मत है कि सूरदास बाल्लभाचार्य जी से दस दिन छोटे थे। बल्लभाचार्य जी की जन्म तिथि वैशाख कृष्ण दशमी रविबार सं. १५३५ वि. मानी जाती है। जिसके अनुसार सूरदास का जन्म बैशाख शुल्क पंचमी मंगलबार सं १५३५ सिद्ध होता है। इस दृष्टि से भी ‘सूरसारावली’ और साहित्य लहरी को एक साथ रचित मानने की अपेक्षा दोनों में कुछ अन्तर मानना समीचीन होगा। सूरदास के जन्मांध होने के सम्बन्ध में भी इसी तरह मतभेद है। कोई उन्हें जन्मान्ध मनता है तो कोई कहता है कि कृष्ण दर्शन के पश्चात उन्होंने स्वयं को अंधा बनाया था। पर, सूरदास के आत्माल्लेखो से यह सिद्ध होता है कि वे जमान्ध थे। उन्होंने स्वयं लिखा है- ‘रहयोग जात एक पतित जनम कौ आँधरौं ‘सूर’ को।’ कुछेक विद्वानों ने तो सूरदास की जन्मांधता को अज्ञानता का सूचक भी माना है।
सूरदास की प्रमाणिक रचनाएँ तीन मानी गई हैं-
क) सूरसारावलीः- यह सूरदास की स्वतंत्र रचना है। इस में ११०६ छंद हैं। श्री प्रभुदयाल मीतल के अनुसार सम्पर्ूण्ा रचना में एक ही छंद का प्रयोग हुआ है। इसीलिए महत्वपर्ूण्ा रचना होने के बावजूद भी यह सूर सागर-सा रोचक न बन पाया।
ख) साहित्य लहरीः- यह सूरदास की छोटी-सी रचना है। इस में केवल ११८ पदों को समेटा गया है। इसके अन्तिम पद में सूरदास के वंशवृक्ष का उल्लेख है। जिसके अनुसार सूरदास चन्दवरदायी के वंशज सिद्ध होते हैं। रस की दृष्टि से यह ग्रंथ विशुद्ध श्रृंगार की कोटि में आता है। यह अलंकार तथा नायिका प्रधान ग्रंथ है। इसमें मधुर रस भरा हुआ है। जो भक्तों को उपासना प्रणाली का एक अंग है।
ग) सूर सागरः- यह सूरदास का सबसे महत्वपर्ूण्ा ग्रंथ है। इसका प्राचीनतम प्रतिलिपि नाथ द्वारा मेवाडÞ के ‘सरस्वती भंडार’ में सुरक्षित है। सूर सागर की उपलब्ध प्रतिलिपियों को रचना क्रम की दृष्टि से दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। -क) जिन में लीलाओं का संग्रह स्वतंत्र रुप से किया गया है। -ख) जिन में भागवत के द्वादश स्कन्धों की चर्चा हर्ुइ है। ‘सूर सागर’ में एक लाख पद होने की अनुश्रुति प्रचलित है। परन्तु वर्तमान संस्करणों में लगभग पाँच हजार पद ही पढने को मिलते हैं। ‘सूर-सागर’ को कुछ लोग भागवत का अनुवाद भी कहते हैं, जो उचित नहीं। जिस प्रकार राम कथाओं का मूलाधार वाल्मीकीय रामायण है ठीक उसी प्रकार ‘सूर-सागर’ का मूलाधार भागवत पुराण है।
सूर काव्य का कला पक्ष और भाव पक्ष दोनों ही अत्यन्त प्रौढÞ हैं। सूरदास ने अपने काव्य में जिन पक्षों का चित्रण किया है, वो सभी अत्यन्त प्रौढÞ, सहज और स्वाभाविक हैं। वात्सल्य रस का सम्यक विकास यदि बाल लीला में है तो राधा कृष्ण तथा गोपियों के प्रेम सौन्दर्याकर्षा से उत्पन्न प्रेमाकर्षा को उद्घाटित करता है। वियोग और दर्ीघप्रतीक्षा की घडिÞयाँ हृदय वेदना को अभिव्यक्त करता है। उद्धव द्वारा दिए गए ब्रह्म ज्ञान का शुष्क प्रतिपादन पर गोपियाँ अपनी अर्समर्थता को इस प्रकार व्यक्त करती हैं-
‘आखियाँ हरिदरशन की भूखी
अब कैसे हरति श्याम रंग रातीए बतियाँ सुनी रुखी।’
अलंकार के अर्न्तर्गत सूरदास ने स्वाभाविकता लाने के उद्देश्य से सहज भाषा की दृष्टि से सूरदास ने लोक प्रचलित ब्रजभाषा को अपनाया है। संस्कृत के तत्सम और तदभव शब्दों के प्रयोग ने उनके काव्य रचना को साहित्य का स्थान दिलाया है। भाषा में स्वाभाविकता लाने के उद्देश्य से यत्र-तत्र अरवी-फारसी शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। उस में है- सुर काव्य गीति काव्य है क्योंकि गीत शैली की पाँचों विशेषताएँ उस में है। अर्थात भावात्मकता, वैयक्तिकता, संगीतात्मकता संक्षिप्तता तथा कोमलता है। सूर काव्य में जितना आनन्द छिपा है, उतना ही गृहत्यागी संन्यासियों के वैचारिक मतवाद का खण्डन और प्रतिपादन भी हुआ है। इसीलिए तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा- ‘हिन्दी साहित्य में श्रृंगार रस का राजत्व यदि किसी ने पर्ूण्ा किया है तो सूर ने।’ प्रकृति परक विभिन्न कलात्मक रुपों को जिस प्रकार सूर ने विभिन्न प्रतीक, विम्ब तथा उपमा द्वारा उभारा है, वह उन्हें महागीतकार और महाकवि के रुप में प्रतिष्ठित करता है।
समग्र रुप में सूरकाव्य विश्व मंगल, श्रवण मंगलम् के साथ-साथ आनन्द लहरी की वह मधुर संगीत और साहित्य है, जो समस्त पाठक और श्रोता को सूर काव्य सागर में बार बार डबुकी लगाने पर मजबूर कर देता है।       िि
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