सृष्टि आपकी, दृष्टि हमारी

दो चार बार कवि उदयचन्द दासजी ने मिलना हुआ था। हंसमुख दासजी के अन्दर विरहाग्नि जल रही है, मुझे पता न था। ‘बहुभाषिक कवि’ कह कर उन्होंने मुझे सम्बोधन किया है। यह उनकी महानता है। खैर, उनकी पुस्तक प्राप्त हर्ुइ। एक ही बैठक में बहुत कुछ पढÞ गया। पढÞते समय बार-बार मुझे हिन्दी के स्वनामधन्य कवि स्व. डा. हरिवंश राय बच्चन की रचनाएं याद आती रहीं। Kal-Dansh
उसी तरह नेपाली भाषा सहित्य के राष्ट्रकवि माधवप्रसाद घिमिरे जी की भी याद आई। अपनी पहली धर्मपत्नी गौरी की याद में उनके द्वारा रचित ‘गौरी’ शोक काव्य का नेपाली साहित्य में जो अद्वितीय स्थान है, उसे कौन भुला सकता है। डा. हरिवंश राय बच्चन ने भी अपनी प्रथम पत्नी की याद में बहुत कुछ रचा, जिससे हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि हर्ुइ। एक मुद्दत के बाद एक ढंग की किताब ‘काल दंश’ हाथ लगी, जिसे मैंने दिल से लगा लिया। पुस्तक की शुद्धता प्रशंनीय है। मुद्रा-राक्षस को इस में खेलवाडÞ करने कोई मौका नहीं मिला है। पचहत्तर कविताओं का यह संग्रह सिर्फपठनीय ही नहीं, मननीय और संग्रहणीय भी है। पुस्तक के प्राथमिक पृष्ठों में तीन विद्वानों ने अपनी पुस्तक सम्बन्धी राय -प्रतिक्रिया) अथवा अनुशंसा ही कह लीजिए प्रकट की है। किताब की आत्मा को अनुशंसाओं ने बखूबी उतारा है।
रचनाकार श्री उदयचन्द्र दास अपनी धर्मपत्नी शान्ति दास के असामयिक अवसान पर दुःखी हैं। यह विल्कुल स्वाभाविक है। अग्नि के फेरे लेते समय सात जन्मों तक का साथ निभाने का वचन दिया-लिया गया था। वह साथी बीच में ही साथ छोडÞ कर चल दे तो विछडÞा हुआ एक साथी जरूर अपने को अकेला दुःखी असहाय महसूस करेगा।
लेकिन यह तो विधि का विधान है। प्रशंसनीय बात तो यह है कि उदयचन्द्र दास जी ने शोक को शक्ति में बदल दिया। विरहाग्नि में तप कर ‘काल दंश’ नामक खरा सोना साहित्य को मिला। मैं तो कहूंगा, नेपाल में रचित हिन्दी साहित्य के इतिहास में यह काव्य कालजयी कृति कहलाएगी।
सुन्दर सुललित संस्कृत के शब्दों द्वारा गुंफित एवं विरहाग्नि से तपे-तपाये धागे में उने गए पचहत्तर हीरे-मोती की चमक हर सहृदयी-सरस कवि हृदयों में बनी रहेगी।
हालांकि जीवन सुख-दुख मिल कर ही बनता है। आप दुख को कैसे लेते है, इसी बात पे आपकी परख होगी। जेल के सीखचों में बन्द होने पर वीपी कोईराला ने अनेक ग्रन्थ रचे। भारत के प्रथम जननिर्वाचित प्रधानमन्त्री जवहारलाल नेहरु ने भी जेल में ग्रन्थ रचे थे। ऐसे उदाहरण अनेक भरे पडÞे हैं। उसी कडÞी में मै इस ‘काल दंश’ को भी एक अच्छा उदाहरणीय मणि मानता हूँ।
संग्रहीत सभी कविताओं में गेयता, लालित्य, मधुरता, लयात्मकता उपलब्ध है। आदि जगद्गुरु शंकाराचार्य ने ‘कालोजगद्भक्षकः’ कहा है। अर्थात् काल इस जगत का भक्षण करता है। जीवन-जगत की नश्वरता पर बहुत कुछ शास्त्रों में कहा गया है। लेकिन मानव को तो हर दुःख सह कर जीना ही पडÞता है। यह उसकी नियति है। इसका कोई विकल्प नहीं। कवि उदयचन्द्र दास जी ने अपने भावों कोर् इमानदारी के साथ व्यक्त किया है। पाठक इसे पढÞ कर अभिभूत हो उठता है। कवि और काव्य की यही महती सफलता है।
अपने दुःख को आधार बना कर यदि कोई कुशल कलाकार कुछ अच्छा रच लेता है तो वह महान रचनाकार है। यह मेरी शुद्ध व्यक्तिगत धारणा है। ऐसे ही रचनाकार रचना में अपनी जान डाल देते हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने किसी कविता में लिखा है- ‘बिना आघात के वीणा नहीं बजती।’ खैर, कवि दास साधुवाद के पात्र हैं। मुझे उम्मीद है, यह किताब नेपाल के हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर साबित होगी। िि

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