सृष्टि आपकी, दृष्टि हमारी

कृति :किराँती चेली
रचनाकार :कमल दीक्षित
विधा :संस्मरण संग्रह
प्रकाशक: जगदम्बा प्रकाशन, ललितपुर
पृष्ठ :६६±८

प्रस्तुतकर्ता : मुकुन्द आचार्य:मैं दो दीक्षितों को थोडÞा बहुत जानता हूँ। दोनों मेरे लिए श्रद्धेय और प्रणम्य हैं। एक मदनमणि दीक्षित और दूसरे कमलमणि दीक्षित। समीक्षा साप्ताहिक में लगभग पाँच छ वर्षों तक मैंने ‘मुसुक्क’ शर्ीष्ाक के अर्न्तर्गत व्यंग्य लेखन किया था। उस जमाने में मदनमणि दीक्षित जी का आशर्ीवाद प्राप्त था। कमलमणि दीक्षित-रचित अनेक पुस् तकों का अध्ययन छात्र जीवन से ही कर ने का सौभाग्य मिला। इस तरह भावनात्मक रूप से मैं उनसे जुडÞता चला आया। आज भी उनके दर्शन तो मुझे कम ही मिलते हैं। खैर …. स्वनामधन्य साहित्यकार कमल दीक्षित नेपाली वाङ्मय के अथक साधक हैं।

वे मदन पुरस्कार गुठी के संचालक तो हैं ही। इसके अलवा वे नेपाली भाषा सहित्य के अन्वेषक भी हैं। नेपाली इतिहास और साहित्यिक इतिहास के लिए उनके संरक्षण में अशेष भंडार सुरक्षित है, अनेकों किताब और पत्रपत्रिकाओं का बखूबी संपादन, नेपाली निबंधों का निरंतर लेखन आदि विशेषताओं को अपने व्यक्तित्व में संजोने वाले कमलमणि जी के बारे में कुछ कहना तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है। हाल ही में उनकी एक कृति ‘ किराँती चेली’ पढÞने का सौभाग्य मिला। इस किताब में उन्नीस लेखकों से सम्बन्धित अनुभवों को उकेरने का सफल प्रयास किया गया है।

इस किताब को क्या नाम दूँ- लघुलेख, रेखाचित्र या संस्मरण – मेरे लिए यह उलझन मामूली नहीं है। बहुत दिनों से इसकी गिरफ्त में हूँ लेकिन समाधान नहीं सूझ रहा है। या इसे रि पोर्ताज के तहत रखा जाय – खैर …. इस कृति में चर्चित साहित्यकारों में श्यामप्रसाद शर्मा, दीपक सोती, प्रेमविनोद नन्दन, धर्मराज थापा आदि से तो मुझे रू- ब-रू होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। तकर ीबन पैंतीस बरसों के बाद दीपक सोती के बारे में हृदय को छू लेने वाली घटनाओं के साथ उनकी कुछ खैर-खबर तो मिली, इस किताब के जरिए। भूले बिसरे साहित्यिक दोस् तों की याद फिर से ताजा हो गई। वैसे भी आज की मतलबी दुनिया में पैसे के पीछे पागलों की तरह बेतहाशा भागती दुनियाँ को कलम घसीटने वालों से क्या मतलब है। शायद इसी दर्द को महसूस कर इस किताब के ‘मन्तव्य’ के तहत सुप्रसिद्ध गजलकार और प्राज्ञ जनाब बूँद राना फरमाते हैं- ‘ अक्षरों की नींव पर ही सिर्जन की इमारत खडÞी की जा सकती है। अक्षर कभी नहीं मर ते, अक्षर ही ब्रहृम है ‘ वगैरह- वगैरह।

छोटे-छोटे वाक्यों में, सरल-सहज शब्दों की लडÞी को र्सार्थकता प्रदान करने की कला कोई साहित्यकार कमलमणि दीक्षित से सीखे। प्रस्तुत किताब देखने में छोटी है, मगर इसने कुछ नेपाली साहित्यकारों की जिन्दगी के अनछुए पहलुओं को हंसते- खिलते आसानी से पाठकों के सामने पर ोस दिया है। कमल दीक्षित लेखन कला के साथ जीवन कला के भी मर्मज्ञ हैं। वे मानव तइभ्व के सूक्ष्म विश्लेषक और विवेचक हैं। शालीनता, सुरुचि-सम्पन्नता तथा सतत स् वाध्यायशीलता आदि गुण इनके व्यक्तित्व के विशेष प्रेरक तइभ्व हैं। स्मरण- रचना में उन्होंने मधुकर वृत्ति से काम लिया है। संस् मृत व्यक्ति के गुणों पर ही उन्होंने प्रकाश डÞाला है, उसके अवगुणों, दर्ुबलताओं आदि पर दृष्टिपात नहीं किया। ‘किराँती चेली’ किताब में एक शर्ीष्ाक है- ‘किराँती चेली प्रभुदासी का भजनहरु’।

इस शर्ीष्ाक के अर्न्तर्गत सिर्फदो पार ाग्राफ का एक शब्दचित्र है। शिव, महादेव और उमा पार्वती कहलाने वाले देवी-देवता प्राचीन किराँती देवता हिमालय के पारुहाङ और सुम्निमा हैं- कुछ ऐसा संदेश किराँत पुत्री प्रभुदासी ने दिया है। अन्य शर्ीष्ाक भी पठनीय और रोचक हैं। मेरे अन्दर का पाठक तो कहता है- साहित्यकार कमलमणि दीक्षित की एक बहुत बुरी आदत है। वे अपने पाठकों को मीठी स् वादिष्ट चीज परोसते तो हैं। मगर वह स् वादिष्ट वस्तु इतनी कम मात्रा में होती है कि खाने वाला प्रायः भूखा ही रह जाता है। अंगुलियां चाटते रह जाता है। चाटते-चाटते थाली भी साफ कर जाता है। पढÞने वाले को लगता है- मुझे अधूरी ही जानकारी मिली। काश, इस बारे में कुछ और लिखते तो मजा आ जाता। खैर एक बात की तो तसल्ली है। दीक्षित जी सिर्फसाहित्यकार नहीं हैं, बल्कि अनेकों साहित्यकारों को उन्होंने जन्म भी दिया है, पहचान भी दी है। बढÞती हर्ुइ उम्र ने संघ संस्थाओं के साथ उनके लगाव ने भी उनके लिखने के जज्बे को मात नहीं दी है, नेपाली साहित्य के लिए यही क्या कम खुशी की बात है ! ऐसे ही कर्मठों के लिए अकबर इलाहावादी ने क्या खूब कहा है- अगर जिन्दादिली है तो बुढÞापा भी जवानी है।

पुस्तक ः मेरो स्कुल
लेखक ः तेजप्रकाश श्रेष्ठ
विद्या ः बाल उपन्यास
प्रकाशक ः बाल संसार प्रा.लि. काठमांडू
संस्करण ः प्रथम -२०७०)
मूल्य ः रु. ११५
पृष्ठ ः ९२

नेपाली साहित्य के सुविख्यात आख्यानकार तेजप्रकाश श्रेष्ठ
का बाल उपन्यास ‘मेरो हाम्रो स्कुल’, मेरे हाथ में है। इस बाल
उपन्यास की पाण्डुलिपि मुझे पुस्तक प्रकाशित होने से पहले ही
पढÞने का सुअवसर मिला था। कुछ साहित्यकारों की जमघट हर्ुइ
थी। इस में इस बाल उपन्यास के बारे में खुल कर चर्चाएं परि
चर्चाएं हर्ुइ थीं। जिस में मैं भी सहभागी था। उसी पाण्डुलिपि को
मनभावन पुस्तक के रूप में प्रस्तुत देख कर एक साइभ्िवक प्रसन्नता
की अनभूति हर्ुइ। इसके लिए उपन्यासकार मित्र तेजप्रकाश श्रेष्ठ को
मेरी ओर से हार्दिक साधुवाद। प्रसिद्ध आख्यानकार ने इस उपन्यास
को आज के बाल बालिका एवं किशोर वय को समर्पित किया है।
यह स्वाभाविक भी है। सरल भाषा में लिखित इस बाल उपन्यास
ने आज के बच्चों की शैक्षिक समस्या का सफल चित्रण किया है।
कक्षा में छात्र-छात्राओं को सिर्फछडÞी के सहारे नहीं पढÞाया जा
सकता है। पाठशाला के शिक्षक वर्ग, घर में माता-पिता जब तलक
बाल मनोविज्ञान को समझने का प्रयास नहीं करेंगे, तब तलक
बच्चों का मन पढÞने में नहीं लगेगा। और नतीजतन बच्चे खेलने
कूदने के लिए मचलेंगे और स्कूल से भाग खडÞे होंगे। शिक्षकों और
अभिभावकों के लिए बाल मनोविज्ञान की नासमझी भी एक खास
मुद्दा बनी हर्ुइ है।
नेपाल बाल साहित्य समाज के पर्ूव महासचिव रह चुके
तेजप्रकाश श्रेष्ठ की सधी हर्ुइ लेखनी से पहले भी बाल साहित्य
की अनेक किताबें लिखी जा चुकी हैं, जिनमें -घरभित्र क्या मज्जा,
आफ्नै हिंडाइ अफ्नै चाल, आफ्नो घर राम्रो घर, आच्छु आच्छु
जाडो, घुम्न गयो मेरो भाइ, पुतली, मुने पाठो, चार्डपर्वलाई
सलाम -उल्लेखनीय हैं। इनकी चित्रात्मक सरल शैली बच्चों का
मन मोह लेने में सफल है। अंग्रेजी में एक कहावत है- ‘मर्निङ
शोज द डे’।
सचमुच देश के भविष्य आज के बच्चे ही तो हैं। इनको सही

ढंÞग से तालीम मिले तो ये भविष्य में अपना और देशका नाम र
ौशन कर सकते हैं।
उपन्यासकार श्रेष्ठ ने बाल बालिकाओं से सम्बन्धित एक
आम मुद्दे को निहायत ही चतुर्राई से दिलचस्प अंदाज में पेश
किया है। इस खूबी के लिए साहित्यकार मित्र प्रकाश को मैं तहे
दिल से मुबारकवाद देना चाहता हूँ। आनेवाले वक्त में नेपाली
बाल साहित्य को श्रेष्ठ महोदय से और जियादा उम्मीदें लगी हैं।
हमें यकिन है, हमारे दोस्त नेपाली बाल साहत्यि को नाउम्मीद
न करेंगे। रब उनकी कलम की ताकत को बुलन्दी दे ! परिवार
नियोजन के साधनों कार् इजाद होने से पहले जैसे बच्चे हर साल
घरों में पैदा होते रहते थे, उसी तरह साहित्यकार मित्र तेजप्रकश
श्रेष्ठ की कलम को कभी भी नसबन्दी की जरूरत न पडÞे। वे
धडÞल्ले से लिखते रहें और किताबों की तादाद में इजाफा होता र
हे। यह हमारी दिली तमन्ना है। इनकी किताबों को पढÞ कर देश
के बच्चे होनहार और काबिल बन सकें।
और हाँ, किताब की कीमत कुछ कम होती तो सोने में
सोहागा होता।

 

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