सृष्टि आपकी, दृष्टि हमारी

प्रस्तुति  श्वेता दीप्ति:गीत, गजल, कविता, मुक्तक ये सभी ऐसी विधाएँ हैं जो बहुत ही कम समय में आपको छूती हैं, किन्तु अपनी मौजूदगी का अहसास लम्बे समय तक कराती है । ये क्षमता जिस भी रचना या रचनाकार में है उसकी लेखनी सफल हो जाती है । रचनाकार जो सम्प्रेषित करना चाहता है अगर वह सम्प्रेषण में सफल हो गया तो रचना सफल हो गई ।
गजलकार गोपाल अश्क अपनी नई गजल संग्रह ‘अपनी भूलों के साथ अब रहने दो’ लेकर हमारे सामने आए हैं । इसके प्रकाशन पर आपको हार्दिक बधाई और शुभकामना । साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में आप पारंगत हैं इसमें कोई शक नहीं है । किन्तु व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि गीत और गजल की दुनिया इनकी अपनी दुनिया है जहाँ आप पूरी सम्पर्ूण्ाता और मुखरता के साथ उभर कर आते हैं । शास्त्रीयता का आपको ज्ञान है और गजल की सीमाओं की हद को भी आप जानते हैं । इन सभी औपचारिकताओं का निर्वाह अपनी भूलों …में भी नजर आता है । bok
किसी भी रचना का शर्ीष्ाक और आवरण उसकी सफलता की पहली सीढÞी होती है । ये वो चीजें हैं, जो पाठक को रचना और रचनाकार के मनःस्थिति से जोडÞती है । इनका आकर्ष और अर्थपर्ूण्ा होना आवश्यक हो जाता है । अश्क की इस नवीन गजल संग्रह का आवरण और शर्ीष्ाक ही कुछ इतना गजलनुमा है कि यह बरवश ही अपनी ओर खींचता है और हम इसके पन्नों के साथ जुडÞना चाहते हैं ।
‘अपनी भूलों के साथ अब रहने दो’ यह गुजारिश है गजलकार की । ख्वाहिशों की लम्बी फेहरिश्त होती है हमारे पास । कुछ पूरी होती है तो कुछ अधूरी रह जाती है । कही अनकही कई बातें, कई चाहत हमारे अन्दर होती है । कुछ कह जाते है. और कुछ अनकहा रह जाता है । इसी अनकहे को जब लेखनी व्यक्त करती है तो कागज के खामोश पन्ने वाचाल हो उठते हैं । उक्त गजल संग्रह में गजलकार अपनी इन्हीं ख्वाहिशों के साथ पूरी शिद्दत के साथ आए हैं –
मुझको अपनी भूलों के साथ अब रहने दो
कहती है दुनिया मुझे जो कुछ भी कहने दो ।
मुझको नहीं है चाहत, खुदा की जन्नत की
ऐ मेरी मुहब्बत तुम अपने चरणों में रहने दो ।
उक्त संग्रह की ये पंक्तियाँ गौरतलब हैं-
अश्कों की दुनिया में खुशियाँ नहीं समाती
अगर हो सके तो खुशियों में तुम समाना ।
जीना अगर है हँसकर, छोटी सी दुनिया में
उसने कहा हो कुछ भी न दिल से तुम लगाना ।
किन्तु ऐसा होता नहीं है । इंसान अपने-अपने अहं और वहम में जीता चला जाता है तभी अश्क कहते हैं कि-
टूटे हुए दिलों को हम कहाँ जोडÞते हैं
पत्थरों के वास्ते हम फूलों को तोडÞते हैं ।
किन्तु अश्क यहाँ भी यह कहने से नहीं चूकते-
हम क्या जाने नफरतों के चढÞते उतरते भाव
हम तो प्रेमी हैं मुहब्बत की जमीं को कोडÞते हैं ।
इस संग्रह में हर भाव है । प्यार का भाव तो हर जगह है, साथ ही देश से जुडÞने का भाव, गाँव छूटने का मलाल और शहर का मतलबपरस्त कोलाहल सभी उभर कर सामने आया है । जीवन का हर रंग इसमें है । वफा है, इश्क है, बेवफाई है, हद से गुजर जाने की तमन्ना है तो चाहत में जानबूझ कर लुट जाने की ख्वाहिश भी है । जमाने से शिकवा है, यार से शिकायत भी । परवानों की तडÞप है तो शमा की तरह जल जाने की चाहत भी । अक्सर इश्क करने वालों के हिस्से में जुदाई ही आती है, इसलिए शायद अश्क कहते हैं कि-
खुदा करे उनको दिन बिताना आ जाये
मेरे बगैर जहाँ में मुस्कुराना आ जाये ।
और फिर
आखिरी है मेरी तुमसे ख्वाहिश ऐ खुदा
रोज मेरी तरह उनको भी आना आ जाये ।
इश्क वो जुनुं है कि सर चढÞकर बोलता है और ऐसे में इश्क करने वालों के अंदाजे बयां कुछ ऐसे होते हैं-
हम भी हैं इश्कबाज अश्क इश्क का इजहार करेंगे
देखेंगे हम भी कब तक हमारी जान लेंगे लोग ।
और अंत में गजल की दुनिया का सच कुछ इस तरह बयाँ होता है-
गजल नहीं शब्दों का खेल यह आँसुओं की बरसात है
चित्कार है टूटे दिल का और दिल लगी की बात है ।
‘अपनी भूलों..’ के हर शेर में दर्द, प्यार, वफा, तडÞप और चाहत का मंजर देखने को मिलता है । इसे पढÞना निश्चय ही सहृदयी को एक सुकून देगा । अश्क के शब्दों में अश्क की पहचान के साथ –
मुझको भी लगने लगा है कि इन दिनों मैं जिन्दा हूँ
खुले आकाश में उडÞने वाला एक आजाद परिन्दा हूँ ।
हूँ मैं अपने भगवान की एक खूबसूरत सी रचना
अपने शायर की शायरी का एक अशयार चुनिन्दा हूँ र्।र्
इश्वर आप पर मेहर करे आपकी लेखनी यूँ ही अबाध और अनवरत चलती रहे और हमें अभिभूत करती रहे । पुनः बधाई और-
काश हम भी इस फलों की तरह हो पाते
मुस्कुराते सहकर दर्द और कहीं सो जाते
देते सुगन्ध फैला अपनी हम फजाओं में
लेकर सुगन्ध फजाओं से जीवन हम महकाते ।

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