सृष्टि आपकी दृष्टि हमारी

सद्वंशोद्भव परम यशस्वी-तेजस्वी एवं मनस्वी प्रशासक पुष्कर ठाकुर के विनीतात्मज विश्व दर्शन जैसे उत्कृष्ट यात्रा वृतान्त के, आरोग्य निकेतन के अनुवाद पर साहित्य आकदमी द्वारा पुरस्कृत, देश-विदेश-विश्रुत अंग्रेजी भाषा के विद्वान प्रोफेसर मुरारि मधुसूदन ठाकुर द्वारा रचित देवव्रतकी आत्मकथा शर्ीष्ाक पुस्तक के प्रकाशन से मैथिली भाषाभाषी पाठक गण बहुत अधिक लाभान्वित हो रहे हैं । मैथिली भाषी के साथ-साथ अन्य भाषाभाषी पाठक गण भी अध्ययन कर लाभान्वित हो रहे हैं कारण ठाकुरजी की मैथिली भाषा इतनी सरल सरस है, जिसे पढÞना और समझना बहुत सुबोध है, वैसे तो मैथिली भाषा की ही विशेषताएं है कि वह र्सवजनसंवेद्य है । ठाकुरजी वर्षों तक त्रिविवि कर्ीर्तिपुर अंगे्रजी विभाग में भी कार्यरत रहे हंै ।
देवव्रत अर्थात् शान्तनु का गंगा से उत्पन्न आठवाँ पुत्र जिसने अपने पिता को प्रसन्न करने के लिए धीवर -मछुवे) के सामने भीषण प्रतिज्ञा की कि मैं आजीवन ब्रहृमचारी रहूँगा और हस्तिनापुर के चक्रवर्ती सम्राट के पद पर नहीं बैठूँगा । ऐसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण महामना भीष्म नाम से सुविख्यात हुए । बाल ब्रहृमचारी होने के कारण पुत्रप्राप्ति की सम्भावना कैसे होती – तथापि वो भीष्मपितामह की संज्ञा से अभिहित हो आज भी इतिहास में प्रसिद्ध हैं ।
देवव्रत की भीषण प्रतिज्ञा करने का प्रतिफल क्या हुआ – एक जन्मान्ध, दूसरे पुत्र के मोह में विवेक दृष्ट्या अन्धा, अपने एक भतीजे को राजगद्दी पर बैठा कर उसकी सुरक्षा कवच बनकर उसी के अन्न खाते रहे । तर्सथ उद्दण्ड दुर्योधन-दुःशासन जैसे पौत्रों के होते हुए अनीति, अन्याय, अत्याचारों को सहते हुए, आँखें मूंद अन्यायपर्ूण्ा कर्मों को बाध्य हो सहते रहे ।
महाभारत के दशवें दिन वीर अर्जुन के विस्मयकारी वाण वषर्ा से क्षत विक्षत हो कुरुक्षेत्र में शरशय्या पर पडÞे-पडÞे र्सर्ूय के उत्तरायण होने पर मृत्यु की प्रतीक्षा, पितामह भीष्म का समय काटते नहीं कट रहा था । भीष्म की यह कथा उस महान राजकुल की कथा है, जो उस महाद्वीप की विचित्र वितृष्णा भरी कुरुवंश की त्रासदीपर्ूण्ा गाथा है ।
प्रस्तुत ग्रन्थ में जिस भीष्म पितामह की आत्मकथा है, वे अनेकों नाम से प्रसिद्ध हैं- देवव्रत, गंगादत्त, गांगेय । नब्बे वर्षउससे भी पर्ूव भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत की जीवन दशा ही बदल गई । वही निर्ण्र्ााउनकी जीवन पथ को निर्दिष्ट कर दिया । आगे हम अपने पुत्र-पौत्रादि द्वारा किए गए रोमाञ्चकारी नाटक प्रस्तुत करने का प्रयास किया, जिसका पटाक्षेप होने वाला है । देवव्रत की इस आत्मकथा में सभी बातें सत्य हैं । यह सत्य क्या है, वह सत्य ऐसा विचित्र सत्य है, जिसके बारे में स्वयं देवव्रत कहते हैं कि मैं क्या कहूँ । इसी सत्य के कहने के कारण मैं विश्व विख्यात हुआ । इस ख्यात्रि्राप्त वीरता के कारण आर्यावर्त के लोग थर-थर काँपते रहे और मुझे इन लोगों ने भीष्म कहकर बदनाम कर दिया । किन्तु कौरवों के बीच मेरी ऐसी स्थिति थी, जहाँ र्सवश्रेष्ठ होते हुए बोलने की स्वतन्त्रता नहीं थी । आज मैं कुरुवंशीय अर्न्तर्द्वन्द्व को झेलते हुए ऋतु परिवर्तन की प्रतीक्षा में विचित्र शरशय्या पर लेटे-लेटे, मेरे हृदय में अचानक आनन्द की हिलोडÞ उठ रही है । ऐसा आनन्द आज तक कभी नहीं हुआ ।
ऐसा प्रायः कौरवजनों की अधीनता से मुक्ति होने के कारण हुआ है । यदि मेरे स्वर्गीय पिता इच्छा मृत्यु का बरदान नहीं दिए रहते तो मैं इस दर्ीघकालीन यज्ञ की पूर्ण्ााहूति अपने प्राण से दे दिया रहता । आज मैं स्वतन्त्र हूँ, जैसे मेरी माँ -गंगा) मुक्तात्मा थीं । अबाध निर्बाध, स्वच्छन्द । भले ही मैं शरशय्या पर पडÞा हूँ, मैं हर्षवभोर हूँ । अस्ताचल पर र्सर्ूय के जाते ही दोनों पक्षों के योद्धा नायक महारथी, सेनाध्यक्ष लोग युद्ध से क्लान्त, मलिन, स्वेद बिन्दु से भीगे, रक्त से लथपथ चारों ओर जमा हो जाते हैं । उस समय कभी मुझे वे लोग नन्हे मुन्ने की तरह लगते हंै । दिन भर खेल कूद करने के बाद घर आए नन्हे मुन्ने । इनके साथ कुछ बातें भी होती हैं तथा इन लोगों को यथाशक्य संशय मुक्त करने का प्रयास भी करता हूँ । मानों मैं इन लोगों की आस्थारुपी धनुष की ऐंठी हर्ुइ डोरी को सीधा कर रहा हूँ ।
फिर भी अरुणोदय काल की प्रतीक्षा रहती है । उषाकाल के निश्चित समय पर हस्तिनापुर से राजसचिव मेरे इन शब्द को लेखनीबद्ध करने के लिए आ जाते हैं । भावी पीढÞी के लिए अद्भुत है यह मेरे लिए हषर्ातिरेक । यदि मेरी यह कथा आप लोग -भावी पीढिÞयों) के हृदय को र्स्पर्श करेगी तो आप लोगों की और आपके पर्ूव पुरुषों की आत्मा अवश्य हर्षसे उल्लसित होगी । यह मुझे विश्वास है । देवव्रत का यह दृढÞ विश्वास ही प्रस्तुत पुस्तक की विशेषता है । इस पुस्तक के पाठकों में यह भावना उजागर होती है कि राजपुरुष एवं मन्त्री लोगों की दृष्टि देशकाल को देखते हुए अत्यन्त क्षणिक एवं भ्रमात्मक होती है… । राजनीति से शाश्वत मूल्यों की अपेक्षा र्व्यर्थ है । जो ऐसी अपेक्षा करते हैं, वो दिग्भ्रमित हो सत्य के दर्शन करने से वञ्चित रह जाते हैं …. । पर्ूण्ा सत्य को कोई अन्वेषण करना चाहता है तो उन्हें राजकाज से अलग रहना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है । यही सन्देश लेखक इस पुस्तक के पाठकों को प्रदान करते हैं । इतना ही नहीं, लेखक देवव्रत के शब्दों में महाभारत जैसे महायुद्ध को जघन्य कहते हुए इसे परित्याग करने को भी कहते हैं । इस चिन्ता से थोडÞी सी मुक्ति अवश्य इनके पाठकों को मिलेगी, ऐसा मुझे विश्वास है ।
लेखक ने इस आत्मकथा को तीन खण्डों में और हरेक खण्ड को १८, १८ भागों में बाँटा है । हरेक खण्ड मंे १८ भागों का प्रारम्भ महाभारत के चुनिन्दा श्लोकों से किया है, जो बहुत ही शिक्षाप्रद और मार्मिक है । प्रत्येक भाग के अन्त में लिखे गए अन्तिम अनुच्छेद को निचोडÞ के रुप में प्रस्तुत किया गया है, जो अग्रिम कथावस्तु की उत्सुकता जागृत करता है । तीसरे खण्ड का अन्तिम श्लोक महाभारत के भीष्म पर्व का है । इस श्लोक को जो मानव अपने जीवन में स्थान देगा, उसका जीवन उम्दा बन सकता है । वह यह है-
अधर्मस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
इति सत्यं महाराज बद्धो˜स्म्यर्थेन कौरवैः।।
महाभारत भीष्म पर्व ४३-४५
प्रस्तुतकर्ताः रमेश झा, त्रिचन्द्र काँलेज

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