सृष्टि आपकी, दृष्टि हमारी

हिन्दी और टैगोर:शान्ति निकेतन हिन्दी प्रचार सभा द्वारा प्रकाशित “हिन्दी एवं टैगोर” पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ । इसके लेखक भारत सरकार के सीनियर फैलो और शांतिनिकेतन से आबद्ध डॉ रामचन्द्र राय हैं । गुरुदेव का मानना था कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा में ही होनी चाहिए क्योंकि इससे एक स्वाभाविक जुड़ाव होता है जिससे भाव का सम्प्रेषण सहज हो जाता है । उक्त पुस्रुतक मेरुं गुरुदेरुव सेरु जुडतक में गुरुदेव से जुड़े तेरह आलेख हैं । हर आलेख टैगोर की प्रतिभा और व्यक्तित्व को दर्शाता है । लेखक ने कोशिश की है कि बंगला साहित्य के साथ साथ टैगोर की विशेषता से भी पाठकों को परिचित कराया जाय । पुस्तक का पहला लेख ‘बँगला लोक–नाट्य’ है । लोक कला, लोक गीत, लोक नाट्य किसी भी समाज और संस्कृति का परिचायक होती है । इसमें समाज बसता है और अपनी पहचान सदियों तक बरकरार रखता है । साहित्य की लोकधाराओं के उपादानों में लोक नाट्य एक प्रमुख एवं लोकप्रिय उपादान है । यह वह कला होती है जिसमें ग्रामीण कलाकारों द्वारा समाज के विभिन्न पहलूओं को अभिनीत कर ग्रामीण जनगण के सामने प्रस्तुत किया जाता है । इस हेतु संगीत और नृत्य इसके आंगिक रस होते हैं । लेखक ने अपने इस आलेख के माध्यम से जीवन और समाज में लोकनाट्य की महत्ता का प्रतिपादन किया है । पुस्रुतक केरु दूसररुेरु आलेरुख मेरुं बँगला नाट्य साहित्य का संक्षिप्त परिरुचय भी लेरुखक नेरु प्रस्रुरुतुत किया हैरु जोरु कम मेरुं बहुत अधिक जानकाररुी कोरु अपनेरु मेरुं समेरुटेरु हुए हैरुरु। यूँ तोरु बँगला साहित्य की विभिन्न विधाओरुं मेरुं बँगला नाट्य साहित्य का आररुम्भ बँगला नाट्यशाला बँगाली थियटररु सेरु हुआ हैरुरु। इसकेरु बाद नाट्योरुं केरु अनुवाद की लम्बी पररुम्पररुा दिखती हैरुरु। बँगला मेरुं सर्वप्रथम शेरुक्सपीयररु केरु मचेर्रुन्ट आफ वेरुनिस का बँगानुवाद हररुचन्द्र घोरुष नेरु १८५२ ई. मेरुं किया थारु। वहीं बँगला मेरुं मौरुलिक नाट्य ररुचना की सूचना कीर्तिविलास(१८५२) एवं भद्रार्जुन(१८५२) सेरु हुई हैरुरु। ऐरुसी ही महत्वपूर्ण जानकाररुी बँगला नाट्य साहित्य केरु अध्याय मेरुं हमेरुं प्राप्त होरुती हैरुरु।
तक के दूसरे आलेख में बँगला नाट्य साहित्य का संक्षिप्त परिचय भी लेखक ने प्रस्तुत किया है जो कम में बहुत अधिक जानकारी को अपने में समेटे हुए है । यूँ तो बँगला साहित्य की विभिन्न विधाओं में बँगला नाट्य साहित्य का आरम्भ बँगला नाट्यशाला बँगाली थियटर से हुआ है । इसके बाद नाट्यों के अनुवाद की लम्बी परम्परा दिखती है । बँगला में सर्वप्रथम शेक्सपीयर के मर्चेन्ट आफ वेनिस का बँगानुवाद हरचन्द्र घोष ने १८५२ ई. में किया था । वहीं बँगला में मौलिक नाट्य रचना की सूचना कीर्तिविलास(१८५२) एवं भद्रार्जुन(१८५२) से हुई है । ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारी बँगला नाट्य साहित्य के अध्याय में हमें प्राप्त होती है ।
इसी तरह लेखक ने बँगला कहानियों पर भी अपनी लेखनी चलाई है ‘बँगला कहानी’ शीर्षक आलेख में । हिन्दी की सरस्वती पत्रिका की भाँति बँगला की बँगदर्शन पत्रिका को भी बँगला कहानी का उद्गम स्रोत माना जाता है । बँगला की प्रथम कहानी मधुमती मानी जाती है जो सन् १८७४ ई. में बंगदर्शन पत्रिका में ही प्रकाशित हुई थी और इसके लेखक श्री बंकिम चटर्जी के भाई श्री पूर्णचन्द्र चटर्जी थे ।
लेखक टैगोर और विद्यापति को एक साथ अपने आलेख ‘विद्यापति और रविन्द्रनाथ टैगोर’ में लेकर आते हैं । रचनाकार युगस्रष्टा होता है । वह हर वस्तु को अपने नजरिए से देखता है जो सामान्य नजरों को दिखाई नहीं देती । स्रष्टा की यह पहचान विश्वकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर की भानुसिंह ठाकुरेर पदावली में मिलती है जिस तरह विद्यापति अपने पदावलियों में अपनी पहचान छोड़ जाते हैं । रवीन्द्रनाथ विद्यापति से अत्यधिक प्रभावित थे और उनके पदों को बार बार उद्धृत करते थे । विद्यापति का यह पद—
सखि हे हमर दुखक नहि ओर
ई भर बादर, माह बादर, सुन मन्दिर मोर….रवीन्द्र नाथ जी को विशेष प्रिय था । विद्यापति के पदावली के प्रत्येक पद की रचनात्मकता और लयात्मकता का अनुसरण रवीन्द्र नाथ जी ने किया है । लेखक रवीन्द्रनाथ की प्रसिद्ध रचना गीतांजलि को भी अपनी पुस्तक में समाहित करने से नहीं चूके हैं । सच तो यह है कि ‘गीतांजलि’ की चर्चा के बगैर रवीन्द्र नाथ ठाकुर की चर्चा ही अधूरी होती । कवीन्द्र की विश्वव्यापी ख्याति उनकी गीतांजलि के नोबल पुरुस्कार मिलने पर ही हुई । इस काव्यग्रंथ की विशेषता यह है कि इसकी सभी कविताएँ गेयात्मक हैं । इसकी रचना कवि ने मुक्तक छन्द में की है और इसमें १५७ पद हैं । कवीन्द्र रवीन्द्र को जिस काव्य गंथ के लिए नोबल पुरस्कार मिला, वह बँगला गीताजंलि, नैवेद्य और खेष काव्य ग्रंथों से संकलित एक सौ तीन कविताओं का अँग्रेजी गद्यानुवाद है । ऐसी ही जानकारियों से परिपूर्ण है ‘विविध रूपों में गीतांजलि’ । लेखक ने हिन्दी के ‘आधुनिक कवि और रविन्द्रनाथ टैगोर’ शीर्षक आलेख में हिन्दी के आधुनिक कवियों पर रवीन्द्रनाथ के साहित्य के प्रभाव को वर्णित किया है । सूर और टैगोर को भी अपने आलेख ‘सूरदास और रवीन्द्रनाथ टैगोर’ में विषयवस्तु बनाया है वहीं हिन्दी के मध्यकालीन कवि को भी समेटने की कोशिश की गई है ।
हिन्दी एवं टैगोर पुस्तक में लेखक ने गागर में सागर समेटने का प्रयास किया है । लेखक का यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय और उपयोगी है । उक्त पुस्रुतक केरु प्रत्येरुक आलेरुख मेरुं कम मेरुं अधिक जानकाररुी देरुनेरु का प्रयास किया गया हैरु जोरु निःसन्देरुह उपयोरुगी हैरुरु। विस्रुरुताररु नहीं हैरु किन्तु संक्षिप्तता मेरुं ही बहुत कुछ समाहित होरुता चला गया हैरुरु। एक संग्रहनीय पुस्रुरुतक हैरु हिन्दी एवं टैरुगोरुररुरु।
तक के प्रत्येक आलेख में कम में अधिक जानकारी देने का प्रयास किया गया है जो निःसन्देह उपयोगी है । विस्रुताररु नहीं हैरु किन्तु संक्षिप्तता मेरुं ही बहुत कुछ समाहित होरुता चला गया हैरुरु। एक संग्रहनीय पुस्रुरुतक हैरु हिन्दी एवं टैरुगोरुररुरु।
तार नहीं है किन्तु संक्षिप्तता में ही बहुत कुछ समाहित होता चला गया है । एक संग्रहनीय पुस्रुतक हैरु हिन्दी एवं टैरुगोरुररुरु।
तक है हिन्दी एवं टैगोर ।
प्रस्तुतिः स्वेता दीप्ति

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