सृष्टि आपकी, दृष्टि हमारी

यज्ञप्रसाद आचार्य नेपाली साहित्य में कोई नयाँ नाम नहीं है। आज की नई पीढ के लिए उनका नाम भले ही कुछ नया-सा लगता हो। ऐसा इसलिए हुआ कि देश की राजनीति में आचार्य जी वर्षों खो से गए थे। परिणामस्वरूप लेखनीको एक लम्बा-सा विश्राम मिला।
विधागत रूप से लेखक महोदय कथाकार हैं। बहुत पहले इनकी कहानियों की किताब ‘मुक्तात्मा’ मैंने पढÞी थी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इन्होंने एम.ए., एल.एलबी. किया है। लम्बे अन्तराल के बाद उनकी उपर्युक्त पुस्तक ‘फ्युजनको जगमा शिलान्यास’ नेपाली साहित्य की एक उल्लेखनीय कृति के रूप में आई है। इनकी पहली कृति ‘मुक्तात्मा’ का दूसरा संस्करण भी बाजार में आ चुका है।
प्रस्तुत कहानी संग्रह में चौदह कहानियाँ संग्रहृत हैं। प्रायः सभी कहानियां यथार्थपरक घटनाओं में आधारित हैं। इस में समसामयिक राजनीति की झलक भी कही मिलेगी तो वर्गीय चरित्र और मनोवैज्ञानिक उद्वेग भी परिलक्षित होंगे। हालांकि कहानियों का लक्ष्य तो समाजसुधार ही लगता है, फिर भी कथाकार ने बडÞी खूबी से अपने को उपदेशक बनाने से बचा लिया है। किसी भी लेखक की यह बडÞी खासियत मानी जाती है।
इनकी कहानियों में प्रयोगशीलता और विविधता मिलेगी। समाज के साधारण पात्रों को इन्होंने शब्दों में कुशलतापर्ूवक उकेरा है। पीडित, शोषित, दुःखी पात्रों की चिन्ता और सम्वेदना को कथाकार ने मर्ूत रूप दिया है। विविध मनोवैज्ञानिक सर्न्दर्भ भी यहाँ मिलेंगे।
यज्ञप्रसाद आचार्य ने अपनी एक कहानी द्वारा वर्तमान नेपाल में विगत कुछ वर्षों से जो विखंडनवादी प्रवृत्ति दिख रही है, उसके विरुद्ध राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की भावना को मजबूती प्रदान करने की कोशिश की है। खैर, दशकों बाद ही सही, देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर कहा जा सकता है कि आचार्य जी का साहित्यिक पुनरागमन नेपाली साहित्य के लिए एक खुशी की बात है। साथ ही एक बुजर्ुग साहित्यकार की कलम से भविष्य में और भी ज्यादा उपयोगी आशर्ीवाद -साहित्यिक रचना) की अपेक्षा की जा सकती है।Simawari-Simapariसमग्र नेपाली साहित्य के मद्देनजर महिला साहित्यकारों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम ही पाई जाती है। ऐसे में कोई नारी स्वयं संर्घष्ामय जीवन व्यतीत कर साहित्य-सिर्जना करती हैं, तो यह स्वयं में एक प्रशंसनीय बात तो है ही। अपनी नवीनतम कृति ‘सीमापारि सीमावारि’ -सीमा के आर-पार) के साथ उपन्यासकार कविता पौडेल समाज की एक ज्वलन्त समस्या को मूल विषयवस्तु बनाते हुए प्रस्तुत हर्ुइ हैं।
नेपाली समाज और राष्ट्र की एक बहुत ही पुरानी और दर्दनाक बीमारी ‘देह व्यापार’ के बारे में सभी जानते हैं। हजारों लडÞकियां, औरतें दलाल के हाथों मित्र राष्ट्र भारत के विभिन्न शहरों में बिकती आ रही हैं। वषोर्ं से यह क्रम चलते आ रहा है। इसे रोकने के लिए सरकारी और गैरसरकारी स्तरों पर बहुत कुछ काम किया गया है। फिर भी समस्या ज्यों की त्यों बनी हर्ुइ है। इसे रोकने के लिए कारगर उपाय अभी तक नजर नहीं आ रहा।
इसी समस्या का पर्ूण्ा विवेचन और सम्भावित समाधान के साथ उपन्यासकार कविता पौडेल अपने उपन्यास ‘सीमावारि सीमापारि’ में प्रस्तुत हर्ुइ हैं। इनकी सधी हर्ुइ लेखनी से पहले भी रोचक उपन्यास और कहानी का स्वाद पाठक चटखारे मार कर ले चुके हैं। इनका नाम विशेष पहचान का मोहताज नहीं है।
उपन्यासकार ने बहुत ही रोचक शैली में एक महत्त्वपर्ूण्ा मुद्दे को उठाया है। प्रस्तुत कृति में देहव्यापार से सम्बन्धित सभी पक्षों का चित्ताकर्ष वर्ण्र्ााउपलब्ध है। अपने कहलानेवालों के हाथों भोलीभाली युवतियाँ, किशोरी विदेश में प्रति वर्षबेची जा रही हैं। वेश्यालयों में उन्हें नारकीय जीवन जीना पडÞता है। वे घर की न घाट की हो जाती हैं। असाध्य रोगों से पीडित होने पर उन्हें वेश्यालयों से भी वेरहमी से निकाल दिया जाता है। सडÞकों पर भीख मांगते हुए कुत्ते की मौत मरने को वे मजबूर होती हैं। एक सम्मानित जीवन जीने की वे तो सपने में भी कल्पना नहीं कर सकती। कैसा दर्ुभाग्य है !
स्वयं भी एक मानवअधिकार कर्मी होने के नाते उपन्यासकार ने नजदीक से इन समस्याओं को देखा है। इस समस्या से प्रभावित लोगों को जाना और पहचाना है। अपनी लेखकीय प्रगतिशीलता को कायम रखते हुए उपन्यासकार ने जिस इमान्दारी से समस्या को उजागर किया है, वह प्रशंसनीय पक्ष है। उसी तरह समस्या समाधान के उपाय भी उपन्यास में दिए गए हैं। कुछ नारी पात्र साहस के साथ समस्या समाधान हेतु आगे आती हैं। परिणाम भी सकारात्मक दिखाई देता है। लेकिन लेखिका ने समस्या का हल ढूंढÞते वक्त यथार्थ से ज्यादा महत्त्व आदर्श को दिया है, पाठकको ऐसा लग सकता है। वाक्य संरचनाओं में कुछ त्रूटि नजर आती है। इतनी अच्छी कृति को कुछ अशुद्धियों ने लंगडी मारी है। फिर भी पाठक को पढÞने के लिए बाध्य कर देने की क्षमता काबीलेतारीफ है। लेखिका की इस खूबी को तो मानना ही पडेÞगा। एक और गौरतलब बात – समस्या का समाधान जो उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है, उसे सरकारी और गैरसरकारी स्तरों पर आजमाने में कोई हर्ज नहीं। विकट समस्या को रोचक ढंग से उठाकर उसका समाधान भी प्रस्तुत करना वास्तव में प्रशंसनीय बात है। और एक मजे की बात पुरुष वेश्यालय का वर्ण्र्ााभी इस में मिलेगा। पुस्तक पठनीय और मननीय है।Ramilananiनेपाली साहित्य के एक सिद्धहस्त लेखक भुवनहरि सिग्देल की अनेक कृतियाँ पढÞी और सराही गई हैं। अपनी कविताओं में छन्दों की मधुरिमा के लिए सुप्रसिद्ध कवि सिग्देल गद्य-विधा में भी अपनी एक हस्ती रखते हैं।
एक कहावत प्रचलित है- इतिहास मे सिर्फनाम और मिति सत्य होते हैं, लेकिन ऐतिहासिक उपन्यास में -रचनाओं में) नाम और मिति कल्पित होते हैं, बाँकी सब कुछ सच होता है। इस कथन की साथर्कता प्रस्तुत उपन्यास में मिल सकती है। उपन्यास की रोचकता पाठक को बांधे रखती है।
नेपाल में १०४ वर्षों तक राणाओं ने राज किया। उनका घरेलू जीवन कैसा था, उनके शौख कैसे थे, ऐयाशी का आलम कैसा था- इसकी पर्ूण्ा झलक उपन्यास में पाठक को मिल सकती है।
दरबार में खुद की अपनी एक खास भाषा होती है। रीतिरिवाज भी अलग होते हैं। बाहर की दुनियाँ से दरबार की दुनियाँ बहुत मायने में फरक होती है। ऐयाशी के लिए भी दरबार प्रख्यात/कुख्यात होते थे। लखनउ के नबाबों से राणाओं ने ऐयाशी सीखी थी। हर काम के लिए अलग-अलग नौकर चाकर रखे जाते थे। गरीब घरों की लडÞकियां, बेसहारा युवतियां, और मर्द सब दास -दासी के रूप में दरबार की सेवा में अपना पूरा जीवन न्यौछावर कर देते थे। वे बंधुवा मजदूर की तरह होते थे। उनका अपना अलग अस्तित्व समाप्त हो जाता था। ‘रमिला नानी’ एक ऐसी ही पात्र है, इस उपन्यास में। दरबार में किशोरावस्था में प्रवेश करनेवाली रमिला नानी के सारे अरमान, सपने पानी के बुलबुले की तरह चकनाचूर हो जाते हैं।
स्मरणीय है, दरबार सिर्फराणाओं के नहीं होते थे। शाह वंशीय राजाओं की भी लम्बी परम्परा यहाँ रही है और उनके भी दरबार काफी रहस्यमय, ऐर्श्वर्ययुक्त और सुविधा सम्पन्न होते थे।

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