सैंकड़ौ आहुति के बाद भी मधेशीयों का अधिकार क्यों नहीं सुनिश्चित हुआ : ई.रामेश्वर प्रसाद

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ई. रामेश्वर प्रसाद सिंह(रमेश), दुर्गापुर-3, सिरहा(मधेश) | मधेश के राजनीतिक ठेकेदारों हमेशा यह कहते हैं कि शासक वर्ग संविधान संसोधन नहीं चाहते हैं। फिर कोई शिर्षक नहीं मिले तो कहते हैं कि शासक वर्ग मधेशीयों को अधिकार देना नहीं चाहते हैं। वे लोग यहाँ विभेद करदिए, समानुपातिक समावेशी नहीं कराया तो कभी कहते हैं कि सम्मानीय अदालत की अवहेलना किया। कभी कवार तो यह कहने में भी नहीं चुकते हैं कि संविधान का मजाक उड़ा रहे हैं।
                    मधेश के राजनीतिक ठेकेदारों का यह मानना हैं कि वे मधेश की मसिहा हैं। गौर करने की बात यह हैं कि जव वे लोग भी अपने आपको शासित और शोसित वर्ग मानते हैं तो वह अपने आपको मधेश की नेता कैसे बोल सकते हैं ? गौर करने की बात यह भी हैं कि मधेश को मुक्त कराने हेतु संकल्प और सोच से मुक्त होनी चाहिए या फिर उन्हें भी शासक बनने की हैसियत होना चाहिए। जब हमेशा दुसरो के सामने ऐसे रोते और गिड़गिड़ाते ही रहेंगे तो मधेश और मधेशीयों की समस्या को वे कैसे सुलझाएगें ?
                      इन सभी बात से तो यही स्पष्ट होता हैं कि मधेश पूर्ण रुपसे बाह्य उपनीवेश हैं क्योंकि अगर राजनीतिक ठेकेदारों की माने तो यह आन्तरिक उपनीवेश हो ही नहीं सक्ता चुकि यह लोग जब संसद में हैं तो आन्तरिक उपनीवेश की मामला तो आसान रास्ते से सुल्झा सकते थें।
                      आन्त्रिक उपनीवेश जहाँ भी हो उसे कुछ ही संघर्ष से उन्मूलन किया जा सकता हैं। जैसे की राणाओं की आन्त्रिक उपनीवेश से नेपालीयों ने मुक्ति पाया, निरंकुश राजतंत्र को जड़ से उखाड़ फेंका। परंतु पैंसठ-सत्तर साल से संघर्षरत मधेशीयों की समस्या नेपाली साम्राज्य में कैसे नहीं सुलझा ? निरंकुश राजतंत्र की राजा ज्ञानेन्द्र से मुक्ति और संसद की पुन:स्थापना हेतु जब सिर्फ उन्नतिश प्राण भारी पड़ गया तो सैंकड़ौ प्राण की आहुति के बाद भी नेपाली साम्राज्य में मधेशीयों का अधिकार क्यों नहीं सुनिश्चित हुआ ? क्या यह बात सावित नहीं करता की मधेश में बाह्य उपनीवेश हैं?
                     यह तो सर्वविदित ही हैं की मधेश एक राष्ट्र हैं और जब पुरा एक राष्ट्रीयता की बलात्कार हो तो भी इसे आन्त्रिक उपनीवेश माना जाएगा ? बिलकुल हि नहीं। वैसे भी मधेश तो सन् 1816 और 1860 की इष्ट इण्डिया कम्पनी और नेपाल बिच हुआ संधि के तहद नेपाली साम्राज्य में आया हैं और मधेशीयों को सन् 1958 तक भी नेपाल में प्रवेश हेतु भिसा की जरुरत पड़ती थी।
                    जब यह बात सभी ठेकेदारों में ज्ञात हैं तो भी यह लोग कुछ पल भर के लोभ और त्रिष्ना से मुक्त नहीं हो पाते हैं पर आशा रखता हुँ की बहुत जल्द मधेशी योद्धा इस भ्रम को चिड़ते हुए नेपाली उपनीवेश से मुक्ति के लिए जन सैलाब लाएगा, वैसे ही जन सैलाब जो की प्रथम, द्वितीय और त्रितिय महान मधेश आन्दोलन में देखा गया था। और यही एक विकल्प भी हैं क्योंकि जब भी कोई भूमि उपनीवेश हो तो समाधान केवल स्वतंत्रता ही हो सकता हैं।
उथिष्ठ मधेश, उत्कृष्ट मधेश, जय मधेश।
जब भी कोई भूमि उपनीवेश हो तो समाधान केवल स्वतंत्रता ही है : ई. रामेश्वर प्रसाद सिंह(रमेश)
 

 

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