सोमवती अमावस्या 2017 :- व्रत प्रभाव से आर्थिक तंगी से मिलेगा छुटकारा

 

  1. आचार्य राधाकान्त शास्त्री , यानी 21 अगस्त को सोमवती अमावस्या है। इस बार एक ही दिन सोमवती अमावस्या और सूर्य ग्रहण होने का दुर्लभ महायोग बन रहा है। वैसे तो यह सूर्य ग्रहण भारत मे दृश्य नही होगा जिससे ग्रहण दोष या बचाव नही होगा । साल में हर महीने अमावस्या आती है लेकिन सोमवती अमावस्या का विशेष महत्व है।
    मान्यता है कि अमावस्या सोमवार को हो और उस दिन का किया गया पाप या पुण्य अक्षय हो जाता है , इस दिन सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के एक ही सीध में हों तो बहुत ही शुभ योग होता है। कहा जाता है कि पांडव पूरे जीवन में सोमवती अमावस्या के लिए तरसते रहे लेकिन कभी उनके जीवन में सोमवती अमावस्या नहीं आई। इस दिन नदियों, तालाबों, तीर्थों में स्नान और दान आदि का विशेष महत्व होता है।

गरीबी दून करने का उपाय :- मान्यता है कि सोमवती अमावस्या को यदि स्नान और पूजा के बाद पीपल वृक्ष या तुलसी की पूजन एवं 108 बार पिरक्रमा की जाए तो दिरद्रता दूर होती है। इसके साथ सूर्य भगवान को अर्घ्य देना और ओंकार नाम का जप , गायत्री या विशिष्ट सिद्ध मंत्र का जप करना भी बहुत ही शुभ एवं फलदाई माना गया है।

सोमवती अमावस्या से जुड़ी कथा :-
एक ब्राह्मण का भरा पूरा परिवार था, उसकी बेटी थी, जिसकी शादी को लेकर वो बहुत चिंतित रहता था. लड़की बहुत सुंदर, सुशील, कामकाज में अव्वल थी, लेकिन फिर भी उसकी शादी का योग नहीं बन रहा था. एक बार उस ब्राह्मण के घर एक साधू महाराज आये, वे उस लड़की की सेवा से प्रसन्न हुए, और उसे दीर्घायु का आशीर्वाद दिया. फिर उसके पिता ने उन्हें बताया कि इसकी शादी नहीं हो रही है, साधू ने लड़की का हाथ देखकर कहा कि इसकी कुंडली में शादी का योग ही नहीं है. ब्राह्मण घबरा कर उपाय पूछने लगा. तब साधू ने सोच-विचार कर के उसे बोला कि दूर गाँव में एक सोना नाम की औरत है, वह धोबिन है, और सच्ची पतिव्रता पत्नी है. अपनी बेटी को उसकी सेवा के लिए उसके पास भेजो, जब वो औरत अपनी मांग का सिंदूर इस पर लगाएगी, तो तुम्हारी बेटी का जीवन भी सवर जायेगा । ब्राह्मण ने अगली ही सुबह उसे सोना धोबिन के यहाँ भेज दिया. धोबिन अपने बेटा बहु के साथ रहती थी. ब्राह्मण की बेटी सुबह जल्दी जाकर घर के सारे काम कर आती थी. 2-3 दिन ऐसा चलता रहा. धोबिन को लगा कि उसकी बहु इतनी जल्दी काम कर के फिर सो जाती है, उसने उससे पुछा. तब बहु ने कहा कि मुझे लगा आप ये काम करते हो. धोबिन ने अगली सुबह उठकर छिपकर देखा कि ये कौन करता है. तब वहां ब्राह्मण की बेटी आई और फिर उसे धोबिन ने पकड़ लिया. धोबिन के पूछने पर उसने अपनी सारी व्यथा सुना दी. धोबिन भी खुश हो गई और उसे अपनी मांग का सिंदूर लगा दिया. ऐसा करते ही धोबिन के पति ने प्राण त्याग दिए. ये सोमवती अमावस्या का दिन था. धोबिन तुरंत दौड़ते-दौड़ते पीपल के पेड़ के पास गई. परिक्रमा करने के लिए उसके कोई समान नहीं था तो उसने ईंट के टुकड़ों से पीपल की 108 बार परिक्रमा की. ऐसा करते ही धोबिन के पति में जान आ गई. इसके बाद से इस दिन का हर विवाहिता के जीवन में विशेष महत्व है, वे अपने पति की लम्बी आयु के लिए प्राथना करती है.

सोमवती अमावस्या का महत्व :-

पीपल के पेड़ की परिक्रमा करने से जीवन में सुख व शांति आती है. पति को दीर्घायु प्राप्त होती है. इस दिन सुबह से ही मौन रहा जाता है, व दान का विशेष महत्व है. इस दिन पूजा करने से पितृ दोष दूर होता है, पूर्वजो को मोक्ष की प्राप्ति होती है. जीवन में आने वाली कठनाईयां दूर हो जाती है.

सोमवती अमावस्या पूजा विधि-विधान :-

सुबह मौन रहकर किसी भी पवित्र नदी में स्नान करें. इससे पितरों को भी शांति मिलती है.
सूर्य पीपल व तुलसी को जल अर्पण करके, गायत्री मन्त्र का उच्चारण करें.पीपल व तुलसी की 108 बार परिक्रमा करें. शिव की प्रतिमा पर जल चढ़ाएं.
गाय को दही, चावल खिलाएं.
हो सके तो पूरा दिन मौन व्रत धारण रखें.
पीपल के पेड़ के पास जाएँ, वहां पास में ही तुलसी भी रखें. उस पर दूध, दही, रोली, चन्दन, अक्षत, फूल, माला, हल्दी, काला तिल चढ़ाएं.
पान, हल्दी की गांठ व धान को पान पर रखकर पीपल व तुलसी को चढ़ाएं.
पीपल के पेड़ के चारों ओर 108 बार धागा लपेटते हुए, परिक्रमा करें. इस दिन कुछ समान के साथ भी परिक्रमा की जाती है, जैसे बादाम, किसमिस, अक्षत, रुपया, फल ,बिंदी, टॉफी, चूड़ी, मेहँदी, बिस्किट आदि. आप कुछ भी समान 108 लेकर, 108 बार पीपल की परिक्रमा करें, फिर उस समान को विवाहिता, ब्राह्मण या कन्याओं को बाँट दें.
घर में रुद्राभिषेक करवाएं.
पूरी, खीर, आलू की सब्जी बनाकर, पहले पितरों को अर्पण करें, फिर खुद ग्रहण करें.
कपड़े, अन्न, मिठाई का दान करें.
सोमवती अमावस्या के दिन जितना हो सके परमात्मा को धन्यवाद दें एवं उनकी प्रसन्नता के लिए सत्य, अहिंसा, का व्रताचरण करें,
सोमवती अमावश्या आप सपरिवार की सम्पूर्ण कुशलता बनाये रखें,

आचार्य राधाकान्त शास्त्री

आचार्य राधाकान्त शास्त्री ,

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