सो रहा मधेश था,

गजेन्द्र सिंह ....
गंगेश कुमार मिश्र
सो रहा मधेश था,
निस्तेज सा,
बीमार था।
रास्ते सब बन्द थे,
निकले किधर ?
किस ओर से।
था दर्द का अहसास,पर;
कहता कोई, कैसे, किसे ?
ऐसे में आया एक दिन,
धरती पे देवदूत बन,
सिंह सा दहाड़ता,
गजेन्द्र सिंह।
गजेन्द्र सिंह ।।
थे भेदते, सीने को जो,
नस्लभेदी बाण से;
डरने लगे,
कहने लगे,
तब,भाई-भाई प्यार से।
कुछ सर्प थे, आस्तीन के;
कुर्सी के थे, जो लालची;
मुँह फेरकर चलते बने,
रथ छोड़ के, ज्यों सारथी।
फ़िर भी दहाड़ता रहा,
गजेन्द्र सिंह।
गजेन्द्र सिंह।।
जबतक रहा,
कहता रहा,
बढ़ते रहो, लड़ते रहो।
हारो न हिम्मत यार तुम,
लड़ते रहो, बढ़ते रहो।
सम्मान से जीने का हक़,
पाकर रहेंगे एक दिन।
है आज बस तेरी कमी;
बंज़र है ये, उर्वर जमीं;
आओ न एक बार तुम,
गजेन्द्र सिंह।
गजेन्द्र सिंह।।
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