स्थानीय तह का चुनाव हुआ तो मधेश में मधेशी मधेशविहीन बन जायेगा : कैलाश महतो

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कैलाश महतो, परासी, २५ मार्च | Election से Selection बाले प्रक्रिया को ही देवनागरी में चुनाव कहते हैं । चुनाव में मतदाता अपने मतों के द्वारा एक शख्स को चयन करता है जो सबसे ज्यादा भरोसेमन्द और लोकप्रिय होता है । उसी भरोसेमन्द शख्स को सर्वसम्मत नेता भी माना जाता है जो नेतृत्वदायक बनकर किसी संघ संस्था या कार्यालय को अपना नेतृत्व प्रदान करता है ।

चुनाव केवल नेतृत्वों का छनौट ही नहीं, अपितु वह मतदाताओं की अभिलाषा, यूवाओं का भविष्य, समाज की आवश्यकता और राष्ट्र की समृद्धि का संवाहक भी होता है । यह समाज की अवस्था, उम्मिदबारों की जनहैसियत, निर्वाचन आयोग का स्वच्क्षता और राज्य की नियत मापन की तराजु भी है ।

चुनाव एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है । यह लोकतन्त्र का मापक होता है । इसके बिना लोकतन्त्र रङ्गहीन बन जाता है । लेकिन यह भी सत्य है कि लोकतन्त्र का चरित्र कहे जाने बाला चुनावों ने परिवारों को बाँट देता है, समाजों को तोड देता है, मित्रत्व और अपनत्व को छोड देता है तो देशों को भी तोड़ देता है अगर इसका समुचित प्र्रयोग न हों । प्राचीन और मध्ययुगीन काल में कोई चुनावी व्यवस्था नहीं थी जब देशों का निर्माण हुआ करता था । चुनाव बिना ही बडे बडे देशों का निर्माण हुआ । मगर लोकतन्त्र की धरातल निर्माण और चुनावी व्यवस्था के साथ बडे बडे उन देशों से भी अनेक देशों का निर्माण शुरु हुआ जो आज पर्यन्त जारी है ।

जाहेर है कि लोकतन्त्र में ही लोकतान्त्रिक ढंङ्ग से नये राष्ट्रों का निर्माण होेता है । इसिलिए चुनाव लोकतन्त्र का आत्मा होता है तो लोकतन्त्र चुनाव का सुन्दर काया ।

चुनाव के इतिहास को देखें तो १७वीं शदी के तरफ चलना होगा । १७वीं शदी में भले ही एथेन्स के रोम में चुनाव द्वारा धार्मिक सम्राट या शासक छनौट करने की व्यवस्था थी, मगर प्रतिनिधिमूलक सरकार की अवधारणा तत्कालिन यूरोप और उत्तरी अमेरिका में विकास कर रही थी । यूरोप में उस समय जो प्रतिनिधिमूलक राज्य व्यवस्था थी, वह किसी रियासत, भूमि, संस्था या किसी निहित स्वार्थ का प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि वह एक जिन्दा खडे व्यक्ति की तरह थी, जो किसी व्यक्ति या पारिवारिक समूह का प्रतिनिधित्व करता था । उस व्यक्तिगत परिवारिक प्रतिनिधिमूलक संस्था को orm AcReft of 1832 या  के द्वारा Reform Bills (सुधार विधेयक) के नाम पर और ज्यादा शक्तिशाली बनाया गया जिसमें आम लोगों की भागिदारी तथा यूवाओं को मताधिकारों को स्थान नहीं मिला था ।

राजनीतिक चेतना विकास के साथ साथ चुनावों में यूवाओं की मतााधिकार के वकालत ने जोड पकडने के साथ ही सन् १९२० में उनके लिए मताधिकार प्रणाली ने अपना जग धारण किया । महिलाओं को मतदान के अधिकारों से बाहर रखे जाने के बावजुद सन् १९२८ में ब्रिटेन, १९४४ में फ्रांस, १९४९ में बेल्जियम और १९७१ में स्वीट्जरल्याण्ड ने महिलाओं के लिए भी मताधिकार की व्यवस्था की जो आज पर्यन्त कायम है ।

नेपाल सरकार द्वारा घोषित स्थानीय तह का चुनाव क्या लोकतन्त्र का अंङ्ग है ? लोकतन्त्र का सर्वाधिकारी जनता होती है । नेपाली राज्य जिस जनता के नाम पर चुनाव करवाना चाहती है, उस जनता के परिधी में भारत के अंग्रेजी जमाने में भारतीय कहलाने बाले अंग्रेजों के दलाल आजाद भारत के दुश्मन के रुप में चिरपरिचित माधवराज सिंधिया के परिवार बालों जैसे भारतीय पिशाच से कम नहीं दिखने बाले मधेशी दलालों के सिवाय पविर्तनकामी आम मधेशी जनता कहीं पर नजर आती है ?

मधेशी जनता परिवर्तन चाहती है, मधेशी मोर्चा चुनाव चाहता है । मधेशी यूवा स्वतन्त्रता चाहता है, मधेशी नेता स्वतन्त्रता को सिढी बनाकर सत्ता की मंजिल पाना चाहते हैं । मधेश अपना संविधान देखना चाहता है । मधेशी पार्टियाँ नेपाली संविधान में संसोधन चाहती है । उद्देश्य जिसका जो भी हो, मगर इस चुनाव से नेपाली राज्य एक तरफ अपने अस्तित्व को मधेश में और मजबूत बनाना चाहती है, संविधान को मधेश में मधेशियों के मत से मान्य करवाना चाहती है जिससे वह अपने संविधान को राष्ट्रिय और अन्तरर्राष्ट्रिय रुप में कार्यान्वयन करवा सके । मधेशी पार्टियों को मधेश में ही अस्तित्वहीन देखना चाहती है और पैसों के बल पर मधेश का मत खरीदना चाहती है । कुछ खास दलाल कमाउदार मधेशियों के आलावा समान्य मधेशी पैसों से चुनाव जित नहीं सकते ।

इस चुनाव के पिछे कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्य और स्वार्थ है नेपाली राज्य का । प्रथम यह कि मधेशी मोर्चा द्वारा स्वीकृत संविधान को मधेशी जनता द्वारा भी स्वीकृत कराना और इसे कार्यान्वयन कराना । दूसरा, इस चुनाव के जरिए मधेश में अस्थिरता कायम करना और सेना उतार कर संकटकाल घोषणा कर संघीयता को फेल कराना । तीसरा, चुनाव के नाम पर अरबों की कमाई करना जिसमें निर्वाचन आयोग भी सामेल है । इसी योजना अन्तर्गत ७४४ स्थानीय निकाय बनायी गयी हैै जिसमें महागरपालिका, उपमहागरपालिका और नगरपालिकाओं के कार्यकारी प्रमुखों में १% से भी कम मधेशियों का प्रतिनिधित्व है ।
४८१ गाँवपालिकाओं के कार्यकारी अधिकारियों में केवल ४१ मधेशी (८.५२%) है और गैर मधेशियों की प्रतिशत ९१% से भी अधिक है । अगर यह स्थानीय तह का चुनाव सफल हुआ तो मधेश में नेपाली राज्य का अतिक्रमण संवैधानिक रुप से वैधानिक होना निश्चित है । और कुछ ही वर्षों में मधेश में मधेशी मधेशविहीन बन जायेगा । यह लगने लगा है कि यह स्थानीय चुनाव मधेशियों का कहीं स्थान ही न बदल दें ।

जिल्ला विकास समिति के एक राजनीतिक विश्लेषक का विश्लेषण को देखें ः
मधेश में २६५ और पहाड़  और हिमाल में ४७९ स्थानीय निकाय।।।।
९४९५ पहाड़ी जनता के लिए ७७५ जन प्रतिनिधी छनौट होने की व्यवस्था०
।।
नेपाली साम्राज्य के विवादित संविधान को कार्यान्वयन करने हेतु ७४४ नगर एवं गाँव(पालिका बनाया गया है  जिसमें ६,६८३ वार्ड रहने की व्यवस्था की गई है  उसमें कुल ३६,६५४ जनप्रतिनिधियों की छनौट होगी |
नई व्यवस्था अनुसार ४ महानगर में प्रमुख(उपप्रमुख ८, १३ उपमहानगर में प्रमुख(उपप्रमुख २६, २४६ नगर में प्रमुख(उपप्रमुख ४९२ रहने की व्यवस्था है  ४८१ गाउँपालिका में प्रमुख(उपप्रमुख ९६२ रहेगी और ६,६८३ वार्ड में वडा अध्यक्ष ६,६८३ एवं हर वार्ड में ४ सदस्य के दर से कुल २६,७३२ हर वार्ड में १ महिला और अल्पसंख्यक, दलित में से १० जन प्रतिनिधी रहेगी
गाउँसभा में अल्पसंख्यक, दलित में से २ सदस्य के दर से ९६२ तथा महानगर, उपमहानगर और नगर सभा में ३ सदस्य के दरसे कुल ७८९ जन प्रतिनिधियाँ रहेगी
सामान्य विश्लेषण स
मधेशियों को कितना मिलेगा रु
कुल प्रतिनिधी . ३६,६५४ ९१००५०
अब,
१। मधेश में कुल स्थानीय निकाय की संख्या ( २४०ं२५. २६५,
२। मधेश में जम्मा प्रतिनिधी . १३,०५६
३। मधेश में नेपालियों का संख्या . ३५५
४। मधेशियों को मिलेगा ९१००(३५.६५५० अर्थात,
५। स्थानीय निकायों में मधेशियों की प्रतिनिधित्व ९।६५×१३,०५६०. ८,४८०
प्रतिशत में केवल २३।१५, वह भी अलग अलग प्रदेश में ्र
बजेट लूटनेकी व्यवस्था है यह अगर केन्द्रिय सरकार हर स्थानीय निकायको १ अरब अनुदान देने की निर्णय करेगी तो पहाड़ी और नेपाली लोगों के लि ५७२ अरब बजेट जाएगी और मधेशियों के लिए केवल १७२ अरब आएगी  हर सुविधा में यह विभेद संरचनागत एवं संस्थागत ढंग से ही कायम रहेगी  मनोगत, नियति, और व्यवहारिक विभेद तो आज भी जारी है |

यह स्थानीय चुनाव असंवैधानिक और मधेश विरोधी होने का आधार यह भी है कि स्थानीय संरचना का निर्माण करने और उसके चुनाव कराने का अधिकार और जिम्मेबारी भी प्रान्तीय सरकार का होता है । केन्द्र केवल जानकारी रखती है । मगर प्रान्तीय चुनावों से पहले ही स्थानीय चुनाव होना और वह भी केन्द्र द्वारा सम्पन्न कराया जाना गम्भीर सन्देह उत्पन्न करता है ।

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