स्थायित्व के लिए आवश्यक है नया राजनीतिक समीकरण : कुमार सच्चिदानन्द

कुमार सच्चिदानन्द, काठमांडू,२२ अक्टूबर |
बसंत में कोयल कूकती है और वर्षा में मेढक टरटराते हैं । दोनों का अपना सौन्दर्य है । लेकिन नेपाल की राजनीति में यह समझना मुश्किल है कि यहाँ बसंत है या वर्षा । कारण साफ है कि दोहरे मानदण्डों पर इस देश की राजनीति चलती है । यहाँ राजनीति में सत्ता और अवसर प्राप्त कर लेने वाले लोग अपने लिए तो मधुमास का एहसास कर रहे हैं । इसलिए सत्ता के गलियारे से उन्हें कोयल की कूक सुनाई देती है लेकिन आम लोगों के लिए तो यह सघन और दुःखदायी बरसात है जहाँ मेढकों के टर्र–टर्र के अलावा और कुछ नहीं सुनाई देता । हाँ, आमलोगों में कुछ ऐसे गुमराह लोग भी हैं जो बरसात को ही बहार समझ बैठे हैं । लेकिन जो अनिश्चितता के काले बादल आकाश में मँडरा रहे हैं और वह भी एक दशक की लम्बी यात्रा के बावजूद, तो इसे क्या कहा जाए ? हलाँकि इस अनिश्चितता और अराजकता का दोष किसी एक दल या नेता पर नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि नेपाल की मौजूदा राजनीति तो ऐसी खाई है जिसमें सभी गिरे हैं और सबके पैर कीचड़ से लथपथ हैं । क्योंकि यह हालात पैदा करने के जिम्मेवार सभी हैं । सत्ताधारी भी और विपक्ष भी । क्योंकि स्वच्छ और न्यायसंगत दृष्टिकोण का सर्वथा इनमें अभाव रहा है । इनके राजनैतिक चिन्तन में न तो रचनात्मकता आ पायी और न ही समय सान्दर्भिकता ही । इसलिए एक प्रश्नचिह्न सबके सामने खड़ा है और यही नेपाल की राजनीति की सबसे बड़ी उलझन है जो देश के भविष्य की बेहतर दिशा का संकेत नहीं करती ।
नेपाल एक अल्पविकास की गति का देश है । वर्तमान समय में उसे आगे बढने के लिए तीव्र विकास की आवश्यकता है । राजनैतिक स्थिरता के बिना यह संभव नहीं । लेकिन देश की जो राजनैतिक संरचना है उसमें स्थिरता का संकेत दूर–दूर तक नहीं देखा जा रहा । कारण साफ है कि न तो कोई दल जनता की कसौटी पर खरा उतरा है और न ही कोई नेता है, जो लोकप्रियता के मानदण्डों को छूता हुआ अपने बूते अपने दल को बहुमत के जादुई आँकड़े तक ले जाए । कारण साफ है कि लोकतंत्र तो नेपाल में आया लेकिन लोकतांत्रिक सोच नहीं आ पायी, नेता तो हैं लेकिन जन–नेता का यहाँ सर्वथा अभाव है । चाहे कोई भी दल ही क्यों न हो उसमें नेता तो एक नहीं अनेक हैं । यहाँ अनेक कहने का तात्पर्य है कि पार्टी के आन्तरिक लोकतंत्र के नाम पर हर दल में अनेक नेता ऐसे हैं जो पार्टी का नेतृत्व के साथ–साथ देश का नेतृत्व सँभालने और केकडेÞ की तरह आगे बढ़े हुए पैर को खींचने के लिए प्रयासरत रहते हैं । लेकिन जननेता से इस देश की धरती शून्य है । इसका कारण है कि वे परम्परागत शासन के ढाँचे में लोकतंत्र को ढाल कर चलना चाहते हैं । इसी का परिणाम है कि आधी से अधिक जनसंख्या लोकतंत्र के उस स्वरूप को जो नवसंविधान के माध्यम से सामने आया है उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और संविधान के कार्यान्वयन सम्बन्धी एक

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अनिश्चितता की स्थिति अभी भी बरकरार है ।
आज अवस्था यह है कि कुछ अतिवादी सोच और चिन्तन के कारण पिछली नेकपा एमाले के नेतृत्व की सरकार गिर चुकी है । एक तरह से इन्हें घोर परम्परावादी माना जा सकता है क्योंकि व्यापक आन्दोलन और हिंसा के बावजूद इन्होंने न केवल जनसंवेदना का मखौल उड़ाया बल्कि किसी भी तरह के परिवर्तन को स्वीकार न करने की जिद ठान ली जिसके कारण राष्ट्रीय स्तर पर भी अराजकता का एक दौर आया और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस सरकार की काफी किरकिरी हुई । अन्ततः नौ महीने की अवधि में ही इन्हें सत्ता के गलियारे से निकलना पड़ा । लेकिन माना जा सकता है कि किसी न किसी रूप में उस सरकार के गर्भ में ही प्रचण्ड के नेतृत्व की सरकार के बीज अंकुरित हो रहे थे । आज जो सरकार है उसके साथ भी अवस्था बहुत कुछ ऐसी ही है क्योंकि नौ महीने तक सरकार का नेतृत्व करने और उसके बाद सत्ता का हस्तान्तरण नेपाली काँग्रेस के नेतृत्व में करने की तथाकथित भद्र सहमति की बात सुनी जा रही है । सवाल है अगर नौ–नौ महीने पर सरकारें बदलती रहीं तो ऐसी प्रवृत्ति राजनैतिक अस्थिरता की सृजना तो करती ही है साथ ही पदलोलुपता, अवसरवादिता और भ्रष्टाचार को भी प्रोत्साहित करती है । इसे किसी भी रूप में राष्ट्रीय हितों का विधायी तत्व नहीं माना जा सकता ।
आज नेकपा एमाले और सरकार में उसके नेतृत्व को अंगीकार की हुई पार्टियाँ सत्ता के बाहर हैं । चूँकि बहुमतीय समीकरण के आधार पर वे सत्ता से निकाले गए हैं इसलिए इस सरकार के प्रति उनकी सोच तल्ख है । निश्चित ही यह सरकार कुछ परिवर्तनों का संदेश लेकर सत्ता में काबिज हुई है । इसलिए नेकपा एमाले एक तरह से किसी भी तरह का परिवर्तन न होने देने के लिए प्रतिबद्ध दिखलाई दे रही है । ऐसे में वर्तमान सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है संविधान संशोधन के लिए अपेक्षित दो तिहाई बहुमत का जादुई आँकड़ा प्राप्त करना । यह तब तक संभव नहीं जब तक कि विपक्षी गठबंधन के कुछ अवसरवादी नेताओं को अवसर देकर सत्ता के गठबंधन में शामिल कर नहीं लिया जाता । अगर यह मान लिया जाए कि किसी तरह संशोधन प्रस्ताव संविधानसभा में पारित करने में मौजूदा सरकार सफल भी हो जाती है तो इसका श्रेय लेने वाले सत्ताधारी गठबंधन की अन्य पार्टियों के साथ साथ वर्तमान सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे दल भी लेंगे । सबका मुद्दा यह होगा कि ‘हमने किया या हमने कराया ।’ आगामी चुनावों में यह परिवर्तन सबके मत संग्रह का आधार बन सकता है । स्वाभाविक है कि मत विभाजित होंगे और समीकरण किसी खास दल के पक्ष में होने की संभावना नहीं होगी ।
एक तरह से देखा जाए तो अभी जो देश की राजनैतिक अवस्था है उसे एक शून्य की अवस्था मानी जा सकती है । शून्य इसलिए कि वर्तमान सरकार का नेतृत्व करने वाले दल जानते हैं कि उनका कार्यकाल कितना दिन है और सत्ता में सहभागी दूसरे प्रमुख दल भी यह जानते हैं कि समय आने पर सत्ता का भद्र हस्तान्तरण सहज ही हो जाएगा । इसलिए दोनों एक दूसरे के पूरक के रूप में काम कर रहे हैं और उनके पास दूसरा विकल्प भी नहीं है । सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले जो मधेशमार्गी दल हैं उनकी हालत तो गर्म दूध से मुँह जलायी गई बिल्ली की तरह पिछली सरकार ने कर दी थी । लेकिन इस सरकार में उनकी स्थिति दूध देखकर भागने की नहीं । थोड़ी ठण्डक का एहसास तो उन्हें हो ही रहा है । यह सच है कि नेपाल की राजनीति में भविष्यवाणी करना सबसे बड़ी मूर्खता है क्योंकि यहाँ कौन सा दल कब और किस करवट लेगा, कहना मुश्किल है । लेकिन सामान्य रूप में कहा जा सकता है कि जब तक नेकपा एमाले विभाजित नहीं होती तब तक संविधान का संशोधन प्रस्ताव पारित होना असंभव है । राजनैतिक घटनाओं से जो संकेत मिल रहे हैं उसे देखते हुए तो यह भी कहा जा सकता है कि यह विभाजन असंभव भी नहीं और ऐसा भी संभव है कि अगली सरकार के गर्भ में इस संभावना का बीज अंकुरित होगा । इसलिए संविधान संशोधन को असंभव भी नहीं माना जा सकता । लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं क्योंकि बिना संशोधन मधेशी दल और जनता आगामी किसी भी चुनाव का विरोध करेंगे और अगर चुनाव नहीं हुआ तो इस संविधान का कार्यान्वयन भी संभव नहीं । इससे देश का राजनैतिक संक्रमणकाल और अधिक लम्बा होने की संभावना है ।
इन सारी चीजों के साथ एक चीज और महत्वपूर्ण है राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने वाले दल चाहे जो भी हों, मधेश के मुद्दों के प्रति वे ईमानदार नहीं हैं । अगर उनमें इतनी ईमानदारी होती तो मामला यूँ नहीं उलझता । यह सच है कि हर दल में कुछ उदारवादी लोग हैं और यह भी सच है कि हर दल में कुछ अतिवादी लोग भी हैं । समर्थन और विरोध का समानान्तर वातावरण साथ–साथ चल रहा है । इसलिए आज अतिवादी और उदारवादी चिंतन के बीच हमारी राजनीति को जगह बनानी होगी । इसके बाद ही देश की समस्याओं का सकारात्मक समाधान संभव है और इसके लिए पूरी राजनैतिक संरचना में आमूल और अप्रत्याशित परिवर्तन की आवश्यकता है ।
एक तथ्य यह भी है कि बार–बार यहाँ के राजनैतिक वृत्त में इस बात की चर्चा होती है कि पड़ोसी देश भारत ने न तो इस संविधान का स्वागत किया और न ही समर्थन किया । वह हर बार सबको समेटने की नसीहत देता है । इस पर राजनीति करनेवालों का एक पक्ष यह कहता है आखिर नेपाल संप्रभुतासम्पन्न राष्ट्र है, इसलिए उसे निर्देशित करने का अधिकार किसी अन्य राष्ट्र को नहीं । इसके साथ ही दूसरा सवाल यह उठता है कि जब नेपाल संप्रभुता समपन्न राष्ट्र है तो उसे इस बात से क्या मतलब कि किसने इसका समर्थन किया और किसने विरोध ? बात साफ है कि आखिर आप स्वागत या समर्थन की बात करते क्यों हैं, और अगर करते हैं तो उसकी बातों का सम्मान करना भी आपका कत्र्तव्य बन जाता है । इसलिए भी इस संविधान का संशोधन आवश्यक है क्योंकि इसके व्यापक विरोध की जमीन यहाँ तैयार है । सरकार जानती है कि सख्ती से किसी भी प्रकार का चुनाव करवा कर जनता को इसे स्वीकार करने के लिए वह विवश नहीं कर सकती । इसलिए सरकार संशोधन प्रस्ताव तो लाएगी, यह बात निश्चित है मगर इस तीर के द्वारा वह दो निशाना साधेगी कि या तो विपक्षी इसका समर्थन कर राष्ट्र को अग्रगामी दिशा दे या इसकी असफलता की पूरी जिम्मेवारी अपने माथे पर ले ।
इन्हीं अनिश्चितताओं के बीच नेपाल की राजनीति चल रही है और इसे इसे अँधकार से निकालने के लिए आवश्यक है कि राजनैतिक दलों को अपनी रणनीति में परिवर्तन करना चाहिए । अगर पारम्परिक राजनैतिक सोच के तहत चला जाता है या आगामी चुनाव ही लड़ा जाता है तो निश्चित है कि आगे भी संसद में किसी भी पार्टी को बहुमत मिलने की संभावना नहीं है क्योंकि नेपाल की राजनैतिक पार्टियाँ संगठन के तौर पर मजबूत है और कहें तो यह भी कहा जा सकता है कि कार्यकर्ता आधारित हैं । कार्यकर्ताओं के चुनावी मनोविज्ञान की यह विशेषता होती है कि वे दल को तब तक नहीं छोड़ते जब तक उनके निजी स्वार्थ के अनुकूल कोई पार्टी दिखती है । वास्तव में परिवर्तन का वाहक तो आम जनता होती है लेकिन आम जनता को व्यापक तौर पर किसी दल के प्रति आकर्षित करने की ताकत न तो किसी पाटी में है और न ही किसी नेता में । नेपाल में आम लोगों का जो सामाजिक–राजनीतिक मनोविज्ञान है उसमें मसीहा वही बन सकता है जो जमीनी यथार्थ को समझते हुए कठोर और दूरदर्शी निर्णय कर सके । लेकिन इस क्षमता से शून्य हमारी वर्तमान राजनीति दिखलाई दे रही है ।
इसलिए अगर यह कहा जाए कि समस्त पार्टियों की उदारवादी विचारधारा एक जगह केन्द्रित होकर चुनावी मैदान में उतरे तो यह असंभव दिखलाई दे रहा है । लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि आज उदारवादी चिन्तन की पृष्ठभूमि में जो दल मिलकर सरकार चला रहे हैं वो अपना आपसी तालमेल भी बढ़ाएँ और न केवल सरकार बल्कि चुनाव भी मिलकर लड़ें । इसके लिए आवश्यक है कि नेकपा माओवादी केन्द्र और नेपाली काँग्रेस जैसी पार्टियों में चुनावी तालमेल भी हो और संभव हो तो अनेक क्षेत्रीय दल जो आज परिवर्तन की आवाज बुलंद कर रहे हैं वे भी कम से कम एक बार के लिए इस महागठबंधन में शामिल हो । आज जो लड़ाई सड़क से लेकर बयानों तक चल रही है उसे मस्तिष्क से लेकर संसद तक पहुँचाया जाना चाहिए । यह सच है कि सुनने में ये बातें हास्यास्पद लग सकती है लेकिन यह कटु सत्य है कि इसके बिना न तो नेपाल में स्थिर सरकार बन सकती है और न ही देश की राजनीति को स्थायित्व मिल सकता है ।
वास्तव में अगर हम देश में स्थिरता और विकास चाहते हैं, सामाजिक न्याय पर आधारित समाज चाहते हैं तो हमें आन्तरिक और अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों में आमूल परिवर्तन करने होंगे, कठोर निर्णय लेना होगा । यह तब तक संभव नहीं है जब तक एक मजबूत सरकार केन्द्र में स्थापित नहीं हो और उसे सांसदों का व्यापक समर्थन हासिल न हो । रही बात लोगों के सोचने की तो ये बातें इसलिए अस्वाभाविक लग सकती है क्योंकि इसका अभ्यास अभी तक नहीं हुआ है । सवाल है कि जब हम सत्ता के गणित में साथ हो सकते हैं तो चुनाव के मैदान में साथ होकर क्यों नहीं उतर सकते हैं ? जिसके साथ सत्ता का आनंद ले रहे हैं उसे अपना कहने में क्या आपत्ति है ? एक बात यह भी है कि अगर इस तरह का अभ्यास नहीं होता तो नेपाल में जिस तरह अतिवादी विचारधारा धीरे–धीरे हावी हो रही है उससे न तो देश का कल्याण और न जनता का ही कल्याण है । हमारे देश के जिम्मेवार राजनैतिक पक्ष को इतना तो समझना ही चाहिए ओैर सावधान भी रहना चाहिए कि कहीं राजनैतिक अतिवाद का भूत इस देश की आन्तरिक शक्तिको खोखला न कर दे । समय और परिस्थितियाँ दिनानुदिन जटिल होती जा रही हैं और अगर समय के साथ हम स्वयं को नहीं बदलते तो इसका खामियाजा हमें भुगतना ही होगा ।

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