स्वच्छता : प्रगति का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार

Bindeshwar pathak 1

पद्मभूषण डा. विन्देश्वर पाठक

पद्मभूषण डा. विन्देश्वर पाठक, पी.एच्डी, डी.लिट् सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार आन्दोलन के संस्थापक से हिमालिनी को एक मुलाकात का सुअवसर प्राप्त हुआ । डा. पाठक किसी परिचय का मुहताज नहीं हैं । स्वयं में एक समर्थ और सक्षम व्यक्तित्व जिनका आलोक भारत में ही नहीं विश्व भर में दीप्त हो रहा है । एक ऐसी हस्ती महात्मा गाँधी के अधूरे स्वप्न को पूरा करने वाले सामाजिक सांस्कृतिक क्रांतिकारी बने । गाँधी की ही तरह आपने भी विभेद, तनाव तथा संघर्षों से भरे दौर में जीने को बाध्य हुए । उन्हें सामाजिक तिरस्कार और अपमान के घूँट पीने पड़े और वर्चस्वों द्वारा बिछाई गई दुरभिसंधियों का मुकाबला करना पड़ा । फिर भी आपने हार नहीं मानी और पीड़ित उत्पीड़ित अस्पृश्य मैला ढोने वालों के संग रहकर उनकी मुक्तिगाथा का इतिहास रचा । पद्मभूषण डा.विन्देश्वर पाठक द्वारा स्थापित इन्टरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर एक ख्यातिप्राप्त संस्था है, जो स्वच्छता, स्वास्थ्य और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में कार्य कर रही है । पिछले साढ़े चार दशकों में इस क्षेत्र में इसका योगदान न केवल अग्रणी और क्रांतिकारी रहा है, बल्कि गहरा प्रभाव रखने वाला एवं चिरस्थायी है । इसकी पारदर्शी उपस्थिति और विशाल मानव संशाधन इसका मुख्य आधार है, जिसमें ५०,००० से अधिक स्वयंसेवी सामाजिक कार्यकर्ता, इंजीनियर, वैज्ञानिक और विविध विषयों के विशेषज्ञ कार्यरत हैं । यह परियोजना और कार्यक्रम को पूरी निष्ठा और जवाबदेही से पूरा करती है । स्वच्छता विकास एवं स्कैवेजिंग की समाप्ति की दिशा में इसके हस्तक्षेप से लाखों लोगों के जीवन और आर्थिक स्थिति में स्पष्ट परिवर्तन हुए हैं । इस कार्य और अभियान के लिए इसे अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं । हिमालिनी संपादक श्वेता दीप्ति की उनसे हुई बातचीत का अंश—
डा. साहब आप स्वयं एक परिचय हैं फिर भी हिमालिनी के पाठकों के लिए अपने विषय में कुछ बताएँ ।
मैं बिहार से हूँ । वैशाली के एक गाँव रामपुर बघेल में मेरा जन्म हुआ । मेरी शिक्षा पटना से हुई । पिछले ४८ वर्षों से सुलभ स्वच्छता के अभियान में लगा हुआ हूँ ।
आप एक ब्राह्मण परिवार से हैं और ऐसे में आपने जिस क्रांतिकारी कदम को उठाया निःसन्देह यह आसान नहीं रहा होगा । आपके दिल में स्वच्छता अभियान का यह ख्याल कैसे आया ?
स्वच्छता, प्रगति का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार है जो किसी भी राष्ट्र के लिए विकास की राह बनाता है । आपको मैं एक बचपन की घटना बताऊँ, मैं बहुत छोटा था और उस समय एक अछूत को मैंने छू दिया और जिसकी सजा मुझे यह मिली कि मेरी दादी ने मुझे गोमुत्र और गोबर खिलाया ताकि मैं शुद्ध हो जाऊँ । इस घटना ने मुझे झकझोरा । मैं समझ नहीं पाया कि हम सभी इंसान हैं ऐसे में एक इंसान इतना बुरा कैसे हो गया कि उसे छूने पर मैं सजा का हकदार हो गया ? ये वो वक्त था जब मैला सर पर ढोने की प्रथा थी । जिसका गाँधी जी ने विरोध किया और मैं गाँधी जी से प्रभावित था और तभी मुझे लगा कि इस प्रथा को खतम करने के लिए एक तकनीक की आवश्यकता है अगर वह हो जाय तो यह प्रथा खुद ब खुद समाप्त हो जाएगी और ये अछूत कहलाने वाले इंसान भी इज्जत से जी पाएँगे । इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए मैंने नारी गुण अपनाया यानि अपने अन्दर धैर्य और सहनशीलता को स्थान दिया क्योंकि आक्रोश और अधैर्यता से यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता था । बस ऐसे ही इस महत् कार्य की शुरुआत हुई ।
क्या आपके परिवार ने आपका साथ दिया ?
कहते हैं कि ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’ पर सच पूछिए तो इसे मुहावरे को मैंने गलत साबित किया । मैं अकेला निकला था इस सफर पर, हर कदम आलोचनाओं का शिकार हुआ, पर मेरी भी जिद थी और इस जिद के आगे सारी कठिनाइयाँ दूर होती चली गई । आपको मैं एक और बात बताऊँ कि मैं शायद एक ऐसा दामाद हूँ, जिसे मेरे ससुराल में कहा गया कि मैं अपना चेहरा ना दिखाऊँ । आप समझ सकती हैं कि उन्हें कितनी नाराजगी थी मेरे इस कार्य से । पर वक्त के साथ सब बदला और आज ५० हजार से ज्यादा व्यक्ति मेरे इस अभियान से जुड़े हुए हैं । एक कदम मैंने बढाया और आज कई कदम मेरे साथ हैं और आज यह स्थिति है कि न्यूयार्क में १४ अप्रील २०१६ से १४ अप्रील को डा. विन्देश्वर पाठक दिन मनाने की घोषणा की गई है । यह एक बड़ी उपलब्धि है सुलभ के लिए ।
अस्पृश्य महिलाओं की स्थिति के सम्बन्द्ध में कुछ जानकारी दें ।
कल तक जो महिलाएँ मैला सर पर ढोया करती थी आज समाज के साथ कदम मिलाकर चल रही हैं । कल तक उन्हें छूना पाप माना जाता था, आज उनके ब्यूटी पार्लर में सभी समुदाय की महिलाएँ जाती हैं और उनकी सेवा लेती हैं । आज उन्हें कई लघु उद्योगों की ट्रेनिंग दी जा रही है । वो सक्षम बन रही हैं, शिक्षित बन रही हैं और समाज के साथ जीना सीख रही हैं । मैं यह दावा नहीं करता कि समाज बिल्कुल बदल गया है, परन्तु परिवर्तन तो हुआ है और आगे भी होगा । समाज अवश्य बदलेगा क्योंकि हम कहते हैं बाधा तोड़ें और नए प्रतिमान रचें ।
सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन ने कई अभियान शुरु किए हैं इसके विषय में कुछ बताएँ ।
सुलभ की यात्रा ६८ से निरंतर जारी है । कई तकनीक हमने निर्माण किए जो स्वच्छता के अभियान में हमारे सहायक हैं । स्वच्छता से सम्बद्ध कई अभियान हमने शुरु किए हुए हैं, अभी हमने स्वच्छ शरीर अभियान का शुभारम्भ किया है, जिसमें स्वास्थ्य की देखभाल और सम्पूर्ण शरीर की सफाई की हिमायत, सस्ते और स्थानीय स्तर पर स्त्री स्वच्छता सामग्री की सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था करना, योग का प्रशिक्षण और रोजमर्रा की बीमारियों के इलाज के लिए देशी दवाओं का इस्तेमाल आदि शामिल हैं ।
सुलभ पब्लिक स्कूल के विषय में कुछ बताएँ ।
सुलभ पब्लिक स्कूल की स्थापना १९९२ में की गई । इस विद्यालय में ६०प्रतिशत छात्र वाल्मीकि समुदाय से हैं और ४० प्रतिशत छात्र उच्च या मध्यवर्ग से हैं । यहाँ बाल्मीकि समुदाय के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा और स्कूल युनीफार्म, किताबें आदि उपलब्ध करायी जाती हैं । वर्षों से हमारा सुलभ पब्लिक स्कूल यह स्थापित करता रहा है कि कोई भी स्कूल समुदाय, समाज और राष्ट्र की जड़ता अथवा गति का महज आईना नहीं होता, अपितु अगर वह समग्र दृष्टि, कुशल योजना और सुचिंतित कार्यक्रमों से प्रबंधित और उत्प्रेरित हो तो वह समुदाय तथा शासन प्रशासन की संस्थाओं के लिए मार्गदर्शक भी बन सकता है, ताकि शैक्षिक जगत की विसंगतियाँ दूर हो सकें और हम सुखद तथा जाग्रत भविष्य के निर्माण की ओर बढ़ सकें । आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सुलभ पब्लिक स्कूल में शिक्षक और विद्यार्थी स्वयं शौचालय साफ करते हैं । सुलभ पब्लिक स्कूल एक ऐसी संस्था है जो ज्ञान, उत्कृष्ट शिक्षा के लक्ष्यों एवं इसके मानक सिद्धान्तों, सामाजिक समन्वय तथा राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए प्रतिबद्ध है ।
नेपाल के सन्दर्भ में आप सुलभ अभियान को कैसे देखते हैं ?
भारत और नेपाल कई मायनों में एक से हैं । हमारे समाज की अवधारणा, संस्कृति, परम्परा सभी मिलती जुलती हैं । ऐसे में हमारी समस्याएँ भी एक सी हैं । मै पहले भी यहाँ आ चुका हूँ और पशुपति परिसर में सुलभ अभियान शुरुआत की बात भी आगे बढ चुकी है । मैं यहाँ भी भारत की ही तरह काम करना चाहता हूँ और इसके लिए प्रयासरत भी हूँ । एक स्वच्छ और सुन्दर राष्ट्र की कल्पना मैं करता हूँ । कई संस्थाएँ काम करने को इच्छुक हैं और उनसे बातें भी हो रही हैं । उम्मीद है इस दिशा में सकारात्मक पहल होगी और हम सुलभ अभियान यहाँ भी शुरु कर पाएँगे ।
आपके व्यक्तित्व का एक और पहलु, आप रचनाकार, गीतकार, संगीतकार और गायक भी हैं । एक व्यक्ति और इतनी सारी खूबियाँ ।
जी हाँ । मुझे संगीत से प्यार है या यूँ कहें कि संगीत मुझे उर्जा प्रदान करती है । मैं अभियान से जुड़े गीतों को स्वयं लिखता हूँ, संगीत देता हूँ और स्वयं गाता भी हूँ । कई कैसेट भी आ चुके हैं । अभी भारत के प्रभानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत का नारा दिया है । गाँधी के सपनों को साकार कर रहें हैं । उनको समर्पित भी मेरे कई गीत हैं ।
हिमालिनी के पाठकों के लिए कुछ संदेश ।
आप एक महत कार्य कर रहे हैं । मुझे खुशी है कि हिमालिनी के माध्यम से भारत और नेपाल को जोड़ने का कार्य हो रहा हैं । इतना ही नहीं हिन्दी जो एक बहुत ही सुन्दर और प्रवाहमयी भाषा है उसकी सेवा कर रहे हैं और इस भाषा के माध्यम से दो देशों में सेतु का काम कर रहे हैं । नेपाल की परिस्थितियों की जानकारी भारत में इस पत्रिका के माध्यम से होती है । हिमालिनी परिवार को मेरी अशेष शुभकामना है यह दिनानुदिन प्रगति की राह तय करे ।
अंत में, आपका बहुत बहुत शुक्रिया, आपका कीमती वक्त हिमालिनी को मिला । हिमालिनी आपकी कृतज्ञ है ।
धन्यवाद और आभार आपका भी । आपकी पत्रिका के माध्यम से मैं हिमालिनी के पाठकों से जुड़ पाया और उम्मीद करता हूँ कि मेरे स्वच्छता के अभियान में नेपाल में आपका साथ हमें मिलेगा ।

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