स्वर्ग में तो नेकपा एमाले और उसके नए मेयर का ही बोलबाला है : बिम्मी शर्मा

बिम्मी शर्मा, बीरगंज (व्यग्ँय.) हिंदी में एक कहावत है “गावँ बसा नहीं कि मागने वाले आ गए ।” ठीक उसी तरह का हाल है नेपाल में नए, नवेले नगर, उपमहानगर और महानगर बने गावँ, कस्बा और शहरों का । सरकार ने गावँ को नगर, नगर को उपमहानगर और उपमहानगर को महानगर बनाने की घोषणा जैसे ही की यहां के निवासी दिन, दहाडे ही सपना देखने लगे स्वर्गवासी होने का । देश की राजधानी काठमाडूं के नवनिर्वाचित मेयर ने महानगर को स्वर्ग बनानेकी घोषणा कर दी । अब जिदों को ही मार कर महानगर को स्वर्ग बना रहे हैं या मुर्दो की आवादी बढाई जाएगी ? यह तो बाद में पता चलेगा ।
राजधानी के नएं नवेले मेयर ने १०१ दिन में १०१ सुधार और विकास का काम कर के यहां कें नागरिकों को स्वर्ग में रहने की अनुभूति कराने की बात कही है । लगता नएं मेयर स्वर्ग सिधार कर आ चूके हैं और वहां का अनुभव ले चूके है ईसी लिएअपने मतदाताओं को सधन्यवाद करते हुए उन्होने स्वर्गबासी बनाने की बात की जब जिंदे लोगों को ही स्वर्गवासी बना रहे है तो मरे हुएलोगों का क्या करेगें ? शायद मरे हुए लोगों का अब नरक में ही जगह है । स्वर्ग में तो नेकपा एमाले और उसके नए मेयर का आरक्षण और बोलबाला है । उन मरे हुए अच्छे लोगों की आत्मा कितना कलपेगी जब जिंदा लोगों के द्धारा मरे हुओं का रहने की जगह स्वर्ग को हडप लिया जाएगा ?
ईस देश में नरक कहां नहीं है ? जहां जहां गलत होता हैं, गंदगी होती है, प्रदुषण होता है, लोग लडाई, झगडे करते हैं वह सब जगह नरक है । जिताजागता नरक अगर देखना है तो किसी सरकार अस्पताल चले जाइए वहां की अव्यवस्था, गंदगी, मरिजों की चिल्लाहट सब नरक से बढ कर है । उस पर ज्यादति यह कि यहां डाक्टर भी यमराज का और कंपोडंर चित्रगुप्त जैसे दिखते और व्यवहार करते है । ईन सरकारी अस्पतालों में आ कर गरीब मरिज मरने से पहले ही खुदको स्वर्गवासी मान लेता है । नीजि अस्पतालों में जो कुछ सालों बाद स्वर्गवासी होते हैं सरकारी अस्पतालों मे पहले ही हो जाते हैं । जब पद संभालते ही नए मेयर नागरिकों को स्वर्गवासी बनाना चाहते हैं वह बाद में पता नहीं क्या करेगें ? लगता है उनके पास कोई जादू की छडी है जिसे घूमा कर वह नरक को स्वर्ग बना देगें ।
भाषण करने में राशन नहीं लगता ईसी लिए अपने मतदाताओं को लुटने के लिए नेता और उम्मेदवार से आसमान से तारे तोड कर लाने कि बात करते हैं । जितना एक प्रेमी अपनी प्रेमिका का मान, मनौव्वलनहीं करता उस से ज्यादा निर्वाचन के समय में उम्मेदवार अपने मतदाताओं का करते हैं । और जितने के बाद हवाई किले बना कर अपना वास्तविक परिचय देते हैं कि उनकि सोच और योजना  कितने गहरे पानी में है । अब यहां के जैसे मूर्ख और बेवकुफ मतदाताओं को काटें में आटे की लोई डाल कर मछली की तरह अपने जाल मे बखुबी फंसा लेते हैं । और शराब, शबाबऔर कबाब में बिकने वाले मतदाताओं के लिए तो यह देश या महानगर तो पहले से ही स्वर्ग है । बाद में यह महानगर स्वर्ग बने नरक उन्हे क्या फर्क पडता है ? उन्होनें तो नोट के बदले वोट दे कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी । अब आगे कि महानगर जाने या उसका नगर पिता यानीकि मेयर जाने ।
जिस राजधानी शहर के सडक किसी व्यक्ति की गाल की तरह पिचके हुए हैं । पेड, पौधे वृद्ध के दांत की तरह झड गए हैं । जहां के सडक में धूल पत्ते से ज्यादा उडता है, धूएं को आक्सिजन की तरह नाक से सूंघने के लिए नागरिक विवश हैं । जहां गलत जगह से सडक पार करने पर २ सौ रुपएं का जुर्माना लिया जाता हैं । जहां की सडक पेटी में ईसान नहीं चलते बल्कि चलता, फिरता दूकान आपका स्वागत करता हो । जहां जेब्राक्रसिगँ डायनासोर की तरह लोप होता जा रहा हो । जहां समस्याएं धरहरा की तरह लंबी और बढती जा रही हो वहां उस महानगर में नए मेयर का यह कहना की मैं ईस शहर को स्वर्ग जैसा बनाउँगा । स्वर्ग की चाबी ईन्द्र देव ने उन्हे ही सौंप दी हो जैसे ।
शहर ईतना गंदा है कि कटे हुए भैंस का पैर अगंद के पैर की तरह सडक या चौराहे पर मिल जाती है । और कभी कभी तो कान और सिगं भी मिल जाते हैं म्यूजियम मे रखने जैसा । जिस शहर में दवा की दूकान से ज्यादा दारु की दूकान मौजुद है । सिटामोल से ज्यादा चाउचाउ और पानी से ज्यादा जहां पर वियर मिलता हो । जहां मरिजों के लिए स्लाइनपानी भले ही न मिले पर कोकाकोला और फैंटा जरुर मिल जाता है । जहां महल्ले में औरतों कि संख्या से ज्यादा ब्यूटी पार्लर है । बच्चो और विद्यार्थी यों से ज्यादा स्कूलऔर कलेज हैं । बिमार से ज्यादा अस्पताल और डाक्टर है। लोन लेने वालों से ज्यादा बैंक है । जहां और समय पानी की किल्लत भले ही हो पर बरसात में सडक और घर दोनो पानी से भर जाते हैं । जहां की सरकार यह सब नजारा देखने के बाद भी शर्म से पानी, पानी नहीं होती । शर्म को भी शर्म लगे ऐसी हालत है शहर कि पर सपना दिखाया जा रहा है स्वर्ग का ।
सपना जरुर देखो, सपना देखने में कोई टैक्स नहीं लगता । सभी के पास दो आंख है सभी सपना देखने के लिए स्वतंत्र है । पर आंख की पुतलियों को फैला कर बडा सपना नहीं देखा जा सकता । अपनी चादर जितनी लंबी है पैर भी उतने ही पसारने चाहिए । पर यहां रहते तो गंदे तालाब में है मेढक कि तरह पर सपना दिखाया जा रहा नदी और समुद्र का । भले ही किसी को तैरना नहीं आए । यह स्वर्ग का सपना भी कुछ ऐसा ही है । जो है उस में सुधार करिए । सिगांपूर और स्विटजरलैंड का सपना मत दिखाइए । ईन्हे ललितपूर और भक्तपूर ही रहने दिजिए । हम स्वर्गवासी नहीं एक अच्छे नागरिक सभ्यतावाले नगर और शहर के नागरिक बन कर रहना चाहते हैं । हम अभी जिदां हैं और हमें अभी से स्वर्ग भेजने का योजना मत बनाइए । नहीं तो जो मरने के बाद पहले से ही स्वर्ग में जा कर बैंठ गए हैं उन मुर्दो की जान कहीं खतरे मे न पड जाए । अगर स्वर्ग में यह मुर्दे हडताल और आंदोलन करने पर आमादा हो गए तो नएं नवेले नागरिकों के नगर पिता मेयर को लेने के देने पड जाएगें ।

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