स्वातन्त्र संग्राम और हिन्दी उपन्यास : विनोद कुमार विश्वकर्मा ‘विमल’

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 विनोद कुमार विश्वकर्मा ‘विमल’, १५ अगस्त, काठमांडू ।
भारतीय राजनीतिक जीवन में बीसवीं शती का पाँचवां दशक स्वतन्त्रता संग्राम का अन्तिम प्रयास था । इस काल में अहिंसापूर्वक सत्याग्रह और सहयोग में आस्था रखनेवाले शान्तिप्रिय कांग्रेस दल ने भी एक नई करवट ली और ‘करो या मरो’ की ओर मुड्ने लगा । सन् १९४२ का ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन इसी नीति का फल है । इस युग के उपन्यासकार भी कांग्रेस की तात्कालीक नीति से प्रभावित हुए बिना न रह सके । रघुवीरशरण मित्र, रामेश्वर शुकल ‘अंचल’ अनूपलाल मण्डल, कृष्ण दास फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ प्रताप नारायण श्रीवास्तव आदि प्रमुख उपन्यासकार हैं, जिन पर कांग्रेस के तत्कालीन आन्दोलन का प्रभाव पड़ा तथा उनकी कृतियों में इनका चित्रण हुआ ।
रघुवीरशरण मित्र के ‘बलिदान’ उपन्यास का तो ताना–बाना ही देश में चल रहे क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रभावस्वरुप बुना गया है । ऐसा लगता है कि उपन्यास में चित्रित क्रान्तिकारी पात्रों में से लेखक स्वयं एक है । स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्रान्ति की तैयारी ही ही ‘बलिदान’ के कथानक का आधार है । इनके पात्र सन् १९४२ की अगस्त क्रान्ति में अनेक यातनाओं को सहते हुए अपना जीवन मातृभूमि की बलिबेदी पर अर्पण कर देते हैं ।
रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ रचित ‘चढ़ती धूप’ उपन्यास की पृष्ठभूमि पूर्णरुपेण राजनीतिक है । इस रचना का उद्देश्य मुख्य रुप से शोषण चाहे वह जमींदारों का किसानों के प्रति, चाहे मील मालिकों का मजदूरों के प्रति और चाहे अंग्रेज शासकों का भारतीय जनता के प्रति हो, का चित्रण करना हो । यह शोषण ही ‘चढ़ती धूप’ के कथानक का आधार है । ‘चढ़ती धूप’ में हड़ताल के समय मिल के मजदूरों की ‘अहिंसा ही तलवार है वे यहाँ मारने नहीं मरने आए हैं ।’ उनके विचार में ‘गुलाम देश में हिंसा करना दमन और सरकारी अत्याचार को निमन्त्रण देना है ।’
सन् १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन से हिन्दी के कुछद्ध उपन्यासकार इतने प्रभावित थे कि उनकी इस आन्दोलन से प्रभावित कृतियों में नामों को छोड़कर शेष सब घटनाएं वास्तविक ही दिखाई पड़ती है । अनुप लाल मण्डल की ‘बुझने न पाए’ उपन्यास का उत्तराद्र्ध भाग तो पूर्णरुपेण ‘भारत छोड़ो’ आन्द ोलन की घटनाओं से ही सम्बन्धित है ।
कृष्णदास रचित ‘क्रान्ति दूत’ उपन्यास के कथानक का आधार भी सन् १९४२ की अगस्त क्रान्ति ही है । कथानक को बढ़ावा देनेवाले पात्र तीन अलग–अलग विचारधाराऔं से संबंधित हैं । उनमें सुभाष औरु कप्तान क्रान्तिकारी दल के सदस्य हैं । विनय गांधीवादी विचारधारा का अनुयायी है । नसीभ तथा नूरजहाँ के चरित्र हिन्दू–मुस्लिम वैमनस्य को दूर करने के आन्दोलन को गति देनेवाले दल से सम्बन्धित हैं । ये तीनों अलग–अलग विचारधाराऔं से सम्बन्धित पात्र देशसेवा में तत्पर हैं, परन्तु एक–दूसरे को देशद्रोही समझते हैं । उपन्यास का उद्देश्य अगस्त बयालीस और उसके बाद के काल में विद्यमान आपसी द्वन्द्व, ईष्र्या औैर स्वार्यान्धता का दिग्दर्शन कराना है ।
रेणु के ‘मैंला आंचल’ उपन्यास में भी सन् १९४२ की अगस्त क्रान्ति से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक के राजनीतिक जीवन का चित्र अंकित है । पूर्ण कृति में कांग्रेस, सोशलिस्ट और कम्युनिष्ट आन्दोलनों की गूंज है । इसके पात्र बावनदास का चरित्र गांधीवादी विचारधारा, कालीचरण का समाजवादी तथटा डॉ. प्रशान्त कुमार और सैनिकजी की साम्यवादी विचारधारा का प्रतीक है ।
प्रतापनारयाण् श्रीवास्तव रचित ‘विसर्जन’ उपन्यास में गांधीवादी विचारधारा के सत्य, अहिंसा और त्याग के आदर्शो का प्रभाव प्रत्यक्ष दिखाई देता है । वामनदास की लड़की कनक के चरित्र का सृजन गांधीवादी त्याग और तपस्या की नीति के फलस्वरुप हुआ है । एक वैभवशाली और सम्पन्न परिवार में उत्पन्न वह अपने सुखमय जीवन को छोड़ त्याग और तपस्या का जीवन यापन करती है, गली–गली की भिखारिन बनाना स्वीकार करती है, जेल जाना पसन्द करती है, मिट्टी मिली रोटी खाती है, अपना सारा जीवन देशसेवा और देश–संगठन में लगा देती हे, धन–दौलत, मोह–ममता कोई भी उसे अपने कर्तव्य मार्ग से बिचलित नहीं कर सकता । मिलों में चल रही हड़ताल के समय कनक मजदूरों को कहती है कि वे क्रोध या आवेश में न आकार शान्ति से अपने आग्रह पर डटछे रहें । मालिक चाहे कितनी ही ज्यादती करें, परन्तु वे अहिंसा का पालन करते हुए उनके सामने हाथ न उठाएं । ऐसा ही चित्रण ग्रामीण जीवन में भी हुआ है ।
इन उपन्यासकारों की कृतियों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि गांधीवादी विचारधारा ने इनकी रचनाओं को किस रुप में तथा किस सीमा तक प्रभाविक किया । भले ही इन कृतियों मे. कला पक्ष के प्रति उदासीनता एवं अपेक्षा के भाव लक्षित हो, मले ही सिद्धान्त प्रतिपादन के लोभवश घटनाओं के स्वभाविक संयोजन और चरित्रों के विकास में व्याघात पड़ा हो तथा साम्प्रदायिकता के कारण भले ही इनमें मानव का यांत्रिक रुप ही अंकित हो पाया हो तथापि इनकी हिन्दी साहित्य को बड़ी भारी देन है, जिसके लिए हिन्दी जगत इन उपन्यासकारों का सदा ऋणी रहेगा ।
(लेखक त्रिभुवन विश्वविद्यालय काठमांडू से विद्यावारिधि कर रहे हैं ।)
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