स्वाधीनता संग्राम के लिए विवश मत करो !

गोपाल ठाकुर:खस–गोर्खाली साम्राज्यवादियों के खिलाफ जारी तीसरा मधेश आंदोलन अब तीसरे महीने भी पूरा करने को है । अनिश्चितकालीन मधेश बंद, आम हड़ताल और नेपाल–भारत सीमा नाकाबंदी जैसे कार्यक्रम इस आंदोलन की खासियत रही है । अभी अनिश्चितकालीन मधेश बंद और आम हड़ताल तो तीन महीने पूरे करेंगे ही, नेपाल–भारत सीमा नाकाबंदी भी अब दूसरे महीने में चल रही है । दूसरी ओर सरकार और मधेशवादी नेतृत्व के बीच वार्ता का भी प्रयास जारी है । किंतु अब तक कोई निकाश नहीं । सरकार सीमांकन के लिए तैयार नहीं है तो मधेशवादी नेतृत्व सरकार की हर आलटाल को मानने और आंदोलन भी जारी रखने के दोहरे चरित्र अपनाता स्पष्ट रूप से

चीन से भी मालसामान लाने के सम्झौते हुए हैं । किंतु यह नेपाल के लिए दीर्घकालीन समाधान का रास्ता नहीं है । हाँ, इनकी ये सभी हरकतें मधेश को और सख्ती बरतने पर मजबूर जरूर करेंगी । शांतिपूर्ण आंदोलन का अंतिम अस्त्र है नाकाबंदी और राजमार्ग अवरोध । अब मधेशी जनता नाकाबंदी के साथ पूर्व–पश्चिम राजमार्ग अवरोध की ओर भी बढ़ेगी । अगर इस पर भी ये खस–गोर्खाली साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी अगर नहीं माने तो इनका यह हठ मधेश को सिर्फ राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का अधिकार सहित समग्र मधेश एक प्रदेश के लिए नहीं, अपितु मधेश अपनी पूरी स्वाधीनता के लिए संग्राम की घोषणा कर सकता है । हमें इसके लिए मजबूर न किया जाय
दिख रहा है । राज्य और आंदोलन के नायकत्व हथियाने की मनसूबा बनाये बैठनेवालों से मधेशी जनता तो बहुत ही अग्र पंक्ति पर दिखती है । किंतु राज्य और मधेशवादी नेतृत्व अपने व्यवहार से कुछ ऐसा आभास करा रहे हैं कि आंदोलन का शायद परिणाम हो— खोदा पहाड़ और निकली चुहिया । यानी मधेशी जनता फिर से शहीद जन्माती रहे । तो क्या मधेश और मधेशी ऐसी ही पीड़ा के बीच जीते जी मरते रहेंगे ?
द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद किसी भी विपदा को निर्विकल्प नहीं मानता । दुनिया के तानाशाहों ने खुद को निर्विकल्प बताने का ढिंढोरा पीटा, किंतु गर्त में मिल गये । हाँ, समय लगा और कुर्बानियाँ भी संगीन रहीं । शायद मधेश का अगला इतिहास भी कुछ ऐसा ही हो ! किंतु नया इतिहास बनाने के लिए पुराने इतिहास से सीखना भी अत्यावश्यक है । इस ओर अगर हम झाँकते हैं तो हमें नेपाल अब तक सामंतवाद से मुक्त नजर नहीं आता । तो भला मधेश इससे मुक्त कैसे होगा । स्वामिभक्ति की श्वान प्रवृत्ति सामंतवाद का शाश्वत चरित्र होता है । इसके तहत दासनायक कभी कभार विद्रोह की बात तो सोचता है किंतु स्वामी के स्नेहमय आश्वाशन तक पहुँचते पहुँचते उसका विद्रोह और गहरी भक्ति में बदल जाता है । फिर भी उसका विद्रोह का स्वर जब उठ जाता है तो आम दासता के निकलने के अनेक उपाय ढूंढता हुआ नया विद्रोही भी रास्ते में आ जाता है ।bir-1
राणाशाही के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का उद्घोष करनेवाली नेपाली कांग्रेस का नेतृत्व पुनः मोहन शमशेर का रायबहादुर बना । सामंतशाही का समूल नाश करनेवाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव केशरजंग रायमाझी ने भी पूरी पार्टी को दरबार की रखैल बनाने का संगीन अपराध किया । परिणाम में ३० वर्ष तक स्वेच्छाचारी राजशाही ने पंचायत को अपना कवच बनाकर पूरे नेपाल को जेल में बदल दिया था । सन् १९९० में कांग्रेस और कम्युनिस्टों के कुछ घटकों का संयुक्त बाम मोर्चा ने राजशाही को संवैधानिक बनने पर विवश तो किया, किंतु पाँच वर्ष पहुँचते पहुँचते जनवरोधी पंचों को इन्होंने पाप मोचन कर दिया । १९९५ में तत्कालीन मांओवादियों ने हथियार उठाकर जनयुद्ध शुरू किया । वर्गीय और राष्ट्रीय मुक्ति इनके अभीष्ट थीं । किंतु २००७ के अंतरिम संविधान में उन्होंने संघीयता को तिलांजलि दे दी । इसके विरुद्ध तब देश में मधेश आंदोलन का दौर शुरू हुआ । तो क्या इससे पहले मधेश केवल मूक दर्शक ही था ?
जी नहीं । १९५१ में नेपाली कांग्रेस से खुद को उपेक्षित अनुभूत कर भद्रकाली मिश्र सहित के लोगों ने तराई कांग्रेस बनाई । मधेश की भाषा, संस्कृति तथा अर्थ राजनीति को उठाना इस दल का अभीष्ट था । किंतु भद्रकाली मिश्र को बाद में पंचायत को समर्थन करते हुए दरबार पहुँचता देखा गया । रघुनाथ ठाकुर ने स्पष्ट रूप से पहली बार ‘परतंत्र मधेश और उसकी संस्कृति’ कृति के प्रकाशन के साथ मधेश को एक राष्ट्र प्रमाणित किया और मधेश को पूर्ण रूप से स्वायत्त प्रदेश के दर्जा के साथ देश में संघीयता कायम करने पर नेपाल का हिस्सा बनकर रहने में कोई आपत्ति न होने की बात बताई । किंतु इन्हें पंचायती राजशाही ने षड्यंत्रमूलक ढंग से जहर देकर मरवा दिया । १९८९÷९० में गजेंद्र नारायण सिंह ने नेपाल सद्भावना परिषद् बनाई और ९० के राजनीतिक परिवर्तन के बाद इसे नेपाल सद्भावना पार्टी करार दे दिया । इतना ही नहीं, नेपाल का यह पहला राजनीतिक दल है जिसने संसदीय निर्वाचन में नेपाल में संघीयता बहाल करने और मधेश को एक प्रदेश बनाने का एजेंडा अपने घोषणापत्र में लिखा । किंतु संसदीय राजनीति के नाम पर इन्हें भी मंत्री की कुर्सी पर जाने के लिए दउरा–सुरुवाल और कथित नेपाली भाषा के प्रयोग जैसे खस, गोर्खाली उपनिवेशवादी नीति से अछूता नहीं देखा गया । इन कारणों से मधेशी जनता में संघीयता प्रभावकारी नहीं बन सकी थी । वास्तव में मधेशियों को राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संघीयता में जाने का विकल्प जनयुद्ध के दौरान माओवादियों के मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा ने स्थापित किया । इसके तहत कोई १३ सौ मधेशी लोगों के शहादत भी दी थी । इसी कारण नेपाल के अंतरिम संविधान में संघीयता नहीं अँटने की वजह से मधेश मुक्ति के अभीष्ट को मधेशियों ने मधेश आंदोलन के जरिए पूरा करने का संकल्प लिया ।
पहले मधेश आंदोलन से संघीयता और दूसरे मधेश आंदोलन से स्वायत्त मधेश प्रदेश बनाये जाने के सम्झौते हुए और उसे अन्तरिम संविधान का अंग भी बनाया गया । आंदोलन समग्र मधेश एक प्रदेश के लिए हुए थे । किंतु संविधान में स्वायत्त मधेश लिखा गया । जब संविधान सभा का गठन हुआ तो दो वर्ष की वजाय चार वर्ष में भी समग्र मधेश एक प्रदेश तो दूर, दो या उससे अधिक प्रदेश भी कांग्रेस(एमाले को मान्य नहीं हुआ तो सबसे बड़े दल के रूप में उभरी एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) भी वादे पर कायम नहीं रही । किंतु मधेशवादी के नाम से उभरे दलों को भी संघर्ष की वजाय सरकार में भागीदारी के लिए लालायित देखा गया । इसके कारण इनको बड़ी आसानी से बिखरते भी देखा गया । इसी बिखराव को देखते हुए संविधान सभा को विघटित कर दूसरी संविधान सभा के निर्वाचन का दौर शुरू हुआ । यह मधेश के लिए संगीन प्रतिगमन का संकेत था ।
किंतु इस दौर में मधेशवादियों को अगले निर्वाचन के लिए बिल्कुल उतारू देखा गया था । यह इसलिए था कि मधेशवादी पार्टियों के गठबंधन के भी नेता वही एमाओवादी सरदार प्रचंड ही थे जिनके उपाध्यक्ष डॉ. भट्टराई की सरकार ने संविधान सभा का विघटन किया था । सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष राजेंद्र महतो को तो संविधान सभा के दूसरे निर्वाचन के लिए आमरण अनशन पर भी देखा गया था । परिणाम में घोर मधेश विरोधियों को खस, गोर्खाली साम्राज्य का औजार बनाया गया । मंत्रीपरिषद के अध्यक्ष, अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग के प्रमुख आयुक्त, निर्वाचन आयोग के प्रमुख आयुक्त में एक से एक मधेश विरोधियों को लाया गया जब कि इन सभी अपराध में मधेशवादी भी शामिल थे ।
दूसरी संविधान सभा बनी, परंतु मधेश विरोधी कांग्रेस और एमाले की अपार बढ़त के साथ । आकार संकुचन में पड़े एमाओवादी भी क्रमशः उन्हीं के साथ हो लिए और मधेशवादी भी इतने कमजोर रहे जो संख्यात्मक रूप में तृण भी नहीं हिला सकते थे । अंतिम दौर में तो इनके भी नेता कहे जानेवाले फोरम लोकतांत्रिक के अध्यक्ष विजय गच्छदार भी मधेश विरोधी गोर्खाली साम्राज्यवादियों के औजार बन गये । फलतः मधेश विरोधी संविधान का मस्यौदा आना तय हुआ । किंतु इसी के साथ मधेशियों ने आग उगलना भी शुरू कर दिया । संविधान का मसौदा तो केवल मधेश ही नहीं पूरे देश में जलाया गया । फिर भी इन प्रतिगामियों ने संविधान निर्माण प्रक्रिया को संकुचित करते हुए वायुवेग से गतिशील बना दिया । फलतः मधेश आंदोलन का उठना स्वाभाविक था और उठा भी । किंतु उपनिवेशकों ने पिछले सितंबर २० को मधेश विरोधी प्रतिगामी संविधान की औपचारिक घोषणा कर दी जिसे पूरे मधेश में जलाया गया । इस हद तक आंदोलन के पहुँचते पहुँचते तीन दर्जन लोगों को शहादत देनी पड़ी । आम मधेशी जनता पूरे उत्साह के साथ मधेश की सड़कों पर थी । किंतु कुछ मधेशवादी नेता–कार्यकर्ताओं को दिन में आंदोलनकारी और रात को रंगदारी टैक्स तहसीलदार के रूप में भी देखा गया । इसके बावजूद मधेश आंदोलन धीमा पड़ने का नाम नहीं ले रहा ।
निश्चित रूप से शासकों ने बहुत ही शातिर दिमाग से खेती, किसानी के समय वर्षा ऋतु में संविधान निर्माण कर जारी किया था ताकि मधेशी जनता खेत में रहे और इनका संविधान चुपचाप सर्वस्वीकार्य हो जाए । किंतु ऐसा हुआ नहीं । मधेशी जनता ने तो इसे ठुकराया ही, हमारा निकटतम पड़ोसी भारत सहित हमारे कुछ मित्र राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से भी इसे समर्थन नहीं मिला । आंदोलन २४ सितंबर से नेपाल–भारत सीमा नाकाबंदी पर केंद्रित है । किंतु इसी बीच इन मधेशवादी नेताओं ने एक अक्षम्य अपराध में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी । जिस संविधान को इन्होंने जलाया और जलवाया, उसी संविधान के उच्चतम कार्यान्वयन में इनकी हिस्सेदारी भी देखी गई । ये सभी प्रधानमंत्री निर्वाचन में हिस्सा लिये । आलोचकों के जवाब में ये कहने लगे कि शासकों में फूट डालने गये थे । किंतु ये वहीं शासकगण हैं जिनके एकीकृत कमांड में हमारे तीन दर्जन सगे–सबंधियों ने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया है । यह कुकर्म अक्षम्य है और इससे आंदोलन करने का इनका नैतिक धरातल खिसक चुका है । फिर भी जनता के उत्साह के सामने ये नतमस्तक हैं और आंदोलन अब तक जारी है । हाँ, साम्राज्यवादी शासक मौसम परिवर्तन का फायदा उठाने की मनसा प्रदर्शित करने लगे हैं ताकि रात को नाकाबंदी पर आंदोलनकारियों की उपस्थिति धीमी पड़ जाये और ये उन्हें अपनी सेना और पुलिस लगाकर खदेड़वा सके । क्योंकि ऐसा करते ही रास्ता साफ हो जाएगा और भारत से सभी मालवाहक गाडि़याँ स्कॉर्टिङ के बल पर इनके यहाँ पहुँचने लगेंगी । अभी भी जहाँ आंदोलनकारी धीमा है वहाँ तो मालसामान भारत से आ ही रहा है । रक्सौल से मालवाहक गाडि़यों को रि–रूटिङ कर बेलहिया के रास्ते नेपाल पहुँचाया जा रहा है । फिर भी निर्लज्जता के साथ ये मधेशी भूभाग की इस असहज परिस्थिति को भारत की ओर से अघोषित नाकाबंदी बताकर नेपाल में भारत विरोधी माहौल बना रहे हैं । चीन से भी मालसामान लाने के सम्झौते हुए हैं । किंतु यह नेपाल के लिए दीर्घकालीन समाधान का रास्ता नहीं है ।
हाँ, इनकी ये सभी हरकतें मधेश को और सख्ती बरतने पर मजबूर जरूर करेंगी । शांतिपूर्ण आंदोलन का अंतिम अस्त्र है नाकाबंदी और राजमार्ग अवरोध । अब मधेशी जनता नाकाबंदी के साथ पूर्व–पश्चिम राजमार्ग अवरोध की ओर भी बढ़ेगी । अगर इस पर भी ये खस–गोर्खाली साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी अगर नहीं माने तो इनका यह हठ मधेश को सिर्फ राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का अधिकार सहित समग्र मधेश एक प्रदेश के लिए नहीं, अपितु मधेश अपनी पूरी स्वाधीनता के लिए संग्राम की घोषणा कर सकता है । हमें इसके लिए मजबूर न किया जाय ।

loading...