स्वाध्याय से महिला विकास संभव

-वि.सं. २००२ माघ ६ गते फिदिम अर्घर्ााँची में जन्म लेनेवाली कवयित्री कविता पौडेल की प्रकाशित कृतियों में तीज का गीतहरु -२०५७), गीति क्यासेट-आँगनैमा -२०५९), काँडाघारीको यात्रा -आत्मकथा) -२०५९), योगासन र ध्यान -२०५९), बालचीत्कार -बालउपन्यास) २०६२), हीरा -उपन्यास) २०६३, आमाहरु -उपन्यास) २०६७, उल्लेखनीय हैं। कुछ प्रकाशोन्मुख कृति- सीमापारी सीमा वारी -उपन्यास), छोरीको चिठ्ठी -उपन्यास), कथासंग्रह, मनकली -उपन्यास), छाउपडी को व्यथा, ओखलढंुगा को यात्रा संस्मरण और श्रव्य दृश्य कैसेट्स बादल पारी माइत देश, माइतीको माया इत्यादि हैं।

कविता पौडेल, साहित्यकार

कविता पौडेल, साहित्यकार::स्वाध्याय से महिला विकास संभव

हिमालिनी ः- आपको साहित्य लेखन की प्रेरणा किससे मिली – आप के श्रीमान् प्रसिद्ध प्रगतिशील साहित्यकार हैं। उनकी संगति का असर तो नहीं है, आपकी साहित्य साधना –
कविता ः- जी नहीं ! वैसे बहुतों ने मेरे लेखन को मोदनाथ प्रश्रति की ही रचना कहकर अनर्गल प्रचार भी किया था। मगर बात ऐसी नहीं है। प्रश्रति चौदह वर्षो तक भूमिगत रहे और दश वर्षकराबास में। मेरा जीवन बहुत ही संर्घष्ामय रहा। जिसे आपने ‘काँडेघारीका यात्रा’ नामक मेरी जीवनी में पढÞा है। समय बिताने के लिए ओर कुछ सीखने के उद्देश्य से मैं हिन्दी उपन्यास पढÞती थी, खासकर गुलशन नन्दा और रानू के उपन्यास। उसी सर्न्दर्भ में मुझे भी कुछ लिखना चाहिए, ऐसी भावना आई और मैं लिखने लगी। वैसे मेरी स्कूली शिक्षा बहुत कम है, मैं एसएलसी पास भी नहीं हूँ। पढÞने का सुयोग नहीं मिल सका।
हिमालिनी ः- आपकी रचनाओं में प्रगतिशीलता, कही जानेवाली राजनैतिक भाषा और विचार आक्रमक रुप में रहते हैं, ऐसा पाठकों का कहना है। इस सर्न्दर्भ में आपके विचार –
कविताः- कुछ हद तक यह बात सही भी है। विशेष रुप में ‘आमाहरु’ उपन्यास कुछ ऐसा ही हुआ। ‘हीरा’ उपन्यास में भी प्रगतिशीलता नजर आएगी। मगर मेरे विचार में ‘प्रगतिशीलता’ स्वयं में राजनीति न होकर एक जीवन पद्धति हैं। यह नजरिया तो सभी में होना चाहिए। आगे बढÞने का नाम ही तो प्रगतिशीलता है। संभवतः ‘चरैवेति’ इसीको कहते हैं।
हिमालिनीः- साहित्यिक विधाओं में आपने आख्यान को ही क्यों चुना –
कविताः- मेरा स्वयंका जीवन अत्यन्त संर्घष्ामय रहा। फुरसत में भी आख्यान -उपन्यास) पढÞना और अपनी कथा-व्यथा को लिपिवद्ध करने में कविता से ज्यादा सुविधाजनक मुझे उपन्यास ही लगा, अर्थात् आख्यान विधा। वैसे कविता और गीत मैं लिखती और गाती भी हूँ।
हिमालिनी ः- साहित्य साधना में आप निरन्तर लगी हर्ुइ है। आगे आप क्या-क्या लिखने जा रही हैं –
कविता ः- एक कहानी संग्रह, एक यात्रा-संस्मरण, दो उपन्यास और कुछ गीति कैंसेट्स निकट भविष्य में आ रहे हैं।
हिमालिनी ः- अभी तक के लेखन से कभी कुछ निराशा भी हर्ुइ –
कविता ः- ऐसी तो कोई बात नहीं। जब तक शरीर साथ देगा, मैं साहित्य-साधना में खुद को समर्पित रखूंगी। अभी मुझे बहुत कुछ लिखना है। देखें क्या-क्या होता है।
हिमालिनी ः- आपकी पुस्तकों से पता चलता है कि आपने अपनी घर गृहस्थी में बहुतों प्रकार से यातना सही हैं, भोगी हैं – क्या आज की बहुएं वैसी यातना पाती है –
कविता ः- अब तो बहुत कुछ बदल गया है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने भी परिवर्तन किया है। आज के दिन में वैसी स्थिति भी नहीं रही। मेरे व्यक्तिगत जीवन में मैं कह सकती हूँ, मैने अपने समय में जो तकलीफें पाई, उनसे मेरी बहू का कभी सामना न हो। बच्चे हमेशा खुश रहें।
हिमालिनी ः- नेपाली साहित्य में महिला साहित्यकार तुलनात्मक रुप से देखने पर कम ही नजर आती हैं, ऐसा क्यों है – आप आगामी महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनके लिए आप कुछ संदेश देना चाहेंगी –
कविता ः- सामाज के प्रत्येक क्षेत्र में पग-पग में पुरुष वर्ग का वर्चस्व सदियों से कामय रहा। समाज में जब से सामन्ती परम्परा चल पडÞी, उसी समय से नारी समाज में दलित के रुप में जीने के लिए बाध्य हर्ुइ। राज्य, कानून, धन, धर्म, संस्कृति, भाषा, घर, नाते-रिश्ते सभी ने इसी रवैये को सहयोग दिया। इसके लिए महिलाओं का शिक्षित औ   र सचेत होना जरुरी है।
महिला यदि अपनी गृहस्थी व्यस्तता को दिखाकर आगे बढने के लिए कुछ भी नहीं करती तो यह उनकी वेवकूफी और आलस्य का परिणाम है। दिन में चौवीसों घंटे हम घरेलू काम में व्यस्त नहीं रहते। यदि प्रति दिन हम किसी पुस्तक के दो-चार पृष्ठ ही पढÞें तो हर महीने एक नई किताब हम पढÞ सकते हैं। स्वाध्याय से मनोरंजन तो होगा ही, साथ में हमें ज्ञान भी प्राप्त होगा। इस तरह महिला का भी व्यक्तित्व विकास हो सकता है। जहाँ चाह, वहाँ राह। इच्छा हो तो स्थिति में सुधार हो सकता है।
इस सर्न्दर्भ में हमारी सरकार कुछ भी नहीं करती। सरकार से कुछ अपेक्षा करना मर्ूखता मात्र है। विगत बहुत वर्षों से लगता है, देश में कोई सरकार ही नहीं है। नारी को खुद आगे बढÞना होगा। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है। लेकिन ऐसा कहनेवाले लोग ऐसा नहीं मानते हैं। महिलाओं को बस मेरा एक ही सुझाव है- खूब स्वाध्याय करें, खूब परिश्रम करें और अपना कर्तव्य पूरा करें। जरुर उन्नति होगी।
-हिमालिनी के अतिथि सम्पादक मुकुन्द आचार्य द्वारा ली गई अन्तर्रवाता के आधार पर)

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