स्वाभिमान नेपाल का अस्वभिमानी आरोप : कैलाश महतो

कैलाश महतो,परासी, २४, सेप्टेम्बर |
एक नेपाली कहावत है,“जुन गोरुको सिङ्ग छैन, उसैको नाम तीखे ।” यह कहावत बहुत ठीक बैठता है जब कोई नेपाली अपने को स्वाभिमानी या फिर अपने को स्वाभिमान नेपाल का पहरेदार कहता है ।
सबसे पहले जो खस लोग अपने को नेपाली होने का दावा करते हैं, वास्तव में वे न तो गोर्खाली है न नेपाली । खस लोग बेबिलोनियन, मेसोपोटामियन, कश्यपीयन बन्जारा, घुमक्कड और फिरंङ्गी एक सम्पद्राय रहे हैं । ये लडने भिडने बाले नश्ल के ही नहीं हैं । न तो कभी किसी से ये लड पाये न कहीं किसी को हरा पाये ।
नेपाली इतिहास को ही देखें तो यह स्पष्ट होता है कि न तो गोरखा उनकी थी, न नेपाल । गोरखा मगरों का और नेपाल गोपाल, महिसपाल, लिच्छवी, मल्ल और नेवारों का । और इन दोनों राज्यों को भी किसी खस ने जितकर नहीं, अपितु षड्यन्त्र और चतुराई सें कब्जा की है ।

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राष्ट्रिय मासिक स्वाभिमान नेपाल ने २३ मई २०१६ बाले अपने भ्रमपूर्ण आरोप तराई मा पूर्वी पाकिस्तान को घटना दोहोर्याउने भारतीय ‘गेम प्लान’ -May 23, 2016_ को पूनः अगष्त ३०, २०१६ को प्रकाशित की है । उस स्वाभिमान नेपाल का भारत के प्रति आरोप है कि भारत ने ठीक उसी तरह नेपाल फोडने का गेम प्लान बनाया है जैसे उसने पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से अलग कर बंगलादेश निर्माण किया था । अपने नेपाल फोडुवा अभियान को सफल करने के लिए भारत ने अपने पूर्व रअ एजेण्ट आर.के. यादव को प्रयोग किया है जिनकी गिरफ्तारी ३ मार्च २०१६ को बलूचिस्तान में पाकिस्तान ने की है । स्वाभिमान नेपाल को मानें तो अधिकारी यादव ने अपने बयान में कहा है कि बलूचिस्तान को पाकिस्तान से और मधेश को नेपाल से अलग करने की भारतीय योजना है । अब सवाल यह उठता है कि रअ का एक अधिकारी रहे यादव क्या अपने जिम्ममेबारी पूरे करने के सिलसिले में कहीं पर गिरफ्तार भर हो जाने से अपने देश के आन्तरिक भेदों को खोल सकता है ?
स्वाभिमान नेपाल का अगला आरोप है कि रअ अधिकारी यादव नेपाल अधिनस्थ तराई में स्वतन्त्र मधेश पक्षधरों से कई बार मिल चुके हैं जबकि यह उसकी आरोप बिल्कुल आधारहीन है । स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन के सह–संयोजक रहे पदाधिकारी, मुझको इस बारे में कोई सुराग भी नहीं मिली है । अगर रअ या भारत ही क्यूँ, दुनियाँ की कोई भी ताकत अगर सिके से मिले तो उनके निवास स्थान को चौविसों घण्टा निगरानी में रखने बाला नेपाल सरकार प्रमाण पेश क्यूँ नहीं करता ? सिके के बाँकी कौन से पदाधिकारीयों से वे भारतीय अधिकारी मिले, उसका प्रमाण कब पेश होगा ?
स्वाभिमान नेपाल ने रअ द्वारा सिके राउत को प्रत्यक्ष सहयोग होने का भी दावा की है । रअ के प्रभाव से ही सर्वोच्च अदालत तक ने सिके जैसे देशद्रोही को सफाई देने का संङ्गीन आरोप अदालत पर लगाया है । वो राज्य कैसा है जिसके स्वतन्त्र संवैधानिक निकायों पर स्वाभिमान नेपाल जैसा राष्ट्रभतm संस्थायें उंगलियाँ उठा रही हैं ?
उसने पूर्वप्रधानमन्त्री डा.बाबुराम भट्टराईतक को आरोप लगाया है कि २०७१ भाद्र ५ गते के दिन सिंह दरबार स्थित संवैधानिक निकाय के कार्यालय में डा.राउत को आमन्त्रण कर उनसे संविधान निर्माण में सलाह लेने, उनके गिरफतारी पर ऐतराज करने, पद्मरत्न तुलाधर, खगेन्द्र संग्रौला, दमननाथ ढुँगाना से लेकर तुलानारायण साह, विजयकान्त कर्ण और राजेश अहिराज तक के बुद्धिजिवी एवं मानव अधिकारकर्मीयों द्वारा डा.राउत के गिरफतारी पर विरोध होना स्वाभिमान नेपाल बालों को हजम नहीं । स्वाभिमान नेपाल कहीं यह तो प्रमाणित नहीं करना चाहता कि डा.राउत के असंवैधानिक गिरफतारी के विरोध में आवाज देने बाले सारे मानवाधिकारकर्मी एवं बुद्धिजिवियों से भी ज्यादा बुद्धि बाला राष्ट्रभक्त स्वाभिमान नेपाल ही है ?
नेपाली सेना ने भी डा. राउत तथा स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन को आपत्तिजनक व्यतिmत्व और संगठन कहने तथा गठबन्धन के स्वयं सेवक तालिमों को सैन्य गतिविधी मानने से स्वाभिमान नेपाल पिछे नहीं हटना अपना देशभक्ति समझता है । तो नेपाली सेना ही क्यूँ, नेपाल सरकार ही यह प्रमाणित क्यूँ नहीं कर पाती है कि वास्तव में वह सैनिक तालिम ही है ? अगर मधेश में होने बाले कोई सभा, सम्मेलन या आपत–विपद के समय में सहयोग पाने और करने हेतु स्वयं सेवक तालिम लेना या लेना अपराध है तो स्वामी कमलानयन के संस्था में काम करने बाले स्वयं सेवकों पर भी प्रश्न उठनी चाहिए । बाबा रामदेव द्वारा संचालित शारीरिक व्यायामों तथा योगों पर भी नेपाल में रोक लगनी चाहिए ।
स्वाभिमान नेपाल ने मधेश के बुद्धिजिवियों का हवाला देते हुए मधेश के तुलना में नेपाल के हिमाल, पहाड और कर्णाली भौतिक पूर्वाधार में अत्यन्त पिछे रहने की तर्क पेश की है । स्वाभिमान नेपाल को पता हो ना हो, मगर थोडा बहुत मेरे भी पढे लिखे होने के कारण मेरे अध्ययन अनुसार लेनिन, स्टालिन, गाँधी, मण्डेला और प्रचण्डतक ने औसतन पढेलिखे लोगों को बुद्धिजिवी न मानने की हिम्मत क्यूँ करते ? और हकिकत यही है कि सत्य को अनदेखा करके अपने व्यतिmगत फायदों को गले लगाने बाले अवसरवादी लोग बुद्धिजिवी नहीं, पेटजिवी होते हैं जो अवस्था बदलते ही अपने लम्बे लम्बे सर्टिफिकेटों को उन वेश्याओं की तरह सजा–संवार कर बदले हुए परिस्थितियों से सौदाबाजी करते हैं । उनके साथ आजतक हर परविर्तनकामियों ने भी ऐ्ययासी ही की है और बेचारे परिवर्तन करने बाले, शहादत देने बाले फिर आगे दिखना छुट जाते हैं या उन्हें आगे आने ही नहीं दी जाती है । मधेश के भी बहुसंख्यक बुद्धिजिवी कहलाने बाले लोग क्षणिक लाभों के चक्कर में अपने धोती, कुर्ता, गमछा, पगडी और लंगौटियों को फाडकर रातों रात दाउरा, सुरुवाल, ढाका टोपी और अंग्रेजी कोट में सजते रहे हैं । मधेशी को उन बद्धिजिवियों को अपना भविष्य मानना छोडना होगा । वे क्या कहते हैं, उससे भी सतर्क रहना होगा ।
जहाँतक हिमाल, पहाड और कर्णाली क्षेत्र की बात है तो उन क्षेत्रों को शोषण क्या मधेशियों ने की है ? उन क्षेत्रों को दिखाकर भावनात्मक, आजादीय और विकासीय अवरोध खडा करने के नाटकों को मधेश अब बखुबी समझ चुकी हैं । प्रथम शताब्दी से लेकर सन् १८७४ और १९३७ तक अस्त व्यस्त तथा दुसरों के अधिन रहनेबाला पहाडों का खतरनाक देश स्वीट्जरल्याण्ड आज दुनियाँ के लिए मिसाल बन सकता है और कभी किसी की गुलाम न होने का दावा करने बाला नेपाल आज भी वही १५हवाँ और १६हवाँ सती का पिछडापन के गीत सुनाकर दुनियाँ को ठगने और मधेश को निगलने के साजिसों के आलावा और क्या हो सकता है ?
स्वाभिमान नेपाल जो अपने इज्जत और जमीर को बेचकर पलता रहा है, वह स्वाभिमान का ढोल पिटता है । जिस के हर चीज बिकाउ है, वो स्वाभिमानी कहलाता है । जिसके जिस्म से लेकर यौवनतक, पानी से लेकर जवानीतक, युवा से लेकर बौद्धिक तथा प्राविधिकों तक, राजनीति से लेकर राष्ट्रनीति तक और शर से लेकर पाँवतक बेचने को तरस रहा है, वो स्वाभिमान का ताल ठोकता है । जिसके संसद में भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी जब यह कहते हैं कि नेपाल के पानी और जवानी नेपाल के परिधी से बाहर है तो संसद ही ताली पिटती है और अपने सुरक्षा के लिए चिन्तित रहे भारत को नेपाल को तोडने का आरोप लगाता है ।
स्वाभिमान नेपाल अपने स्वाभिमान के लिए भारत लगायत विश्व के अनेक शहरों और गलियों में श्रापित जीवन जीने को बाध्य नेपाली महिलाओं, ५० डिग्री सेल्सियस के तापक्रम में श्रम बेचने को बाध्य कामदारों, १५ से २५ हजार का तलब पाने बाले नेपाली कर्मचारी और पहाडों में खाने के लिए हैरान रहे नेपाली लोग मधेश में आते ही महान् नेता और खरबों के मालिक बनन बाले, मधेश के किसानों को बेहाल करने बाला राजनीति, मधेश के भन्सार और राज्स्व को लुटने बाले नेपालियों से मधेश को आजाद कराना ही उसका सही स्वाभिमान हो सकता है । क्या स्वाभिमान नेपाल इसके लिए तैयार है ?
भारत ही नहीं, दुनियाँ की कोई मुल्क यह नहीं चाहेगा कि उसके पडोस में अशान्ति फैले । उसके बगल के राज्य और राज्य से संरक्षित एक समुदाय से उसके बगल बाले समदायों को पीडा दिया जाय ता कि उसका प्रत्यक्ष नकारात्मक असर उसके देश पर पडे । और अगर भारत यह चाहता है कि मानव अधिकार सबों के लिए मौजुद हों, स्वतन्त्रता लोकतन्त्र की आभूषण हों तो यह भारत और संसार के सारे लोकतान्त्रिक देशों का बडप्पन माना जाना चाहिए ।
वैसे भी नेपाल जैसे परआश्रित राज्य से भारत को कौन सा ऐसा फायदा या लोभ हो सकता है, वह भारत ही जाने । मगर मधेश की जनता अगर आजादी चाहती है तो इससे नेपाल और भारत दोनों को फायदा होना निश्चित है ।

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