स्वार्थरहित नहीं है, चीन का यह लुम्बिनी प्रेम:

श्रीमन नारायण

नेपाल में जब भी कोई भारत विरोधी सरकार सत्ता पर काबिज होती है चीन की सरकार दिल खोलकर सहयोग करती है माअवादी पर आश्रति एवं उसकी ही र्समर्थन पर टिकी नेपाल की झलनाथ खनाल की गठबन्धन सरकार को चीन ने बहुत बडा तोहफा दिया है वैसे इस तोफे से नेपाली अर्थ व्यवस्था को मजबूती नहीं मिलने बाली है नेपाल में शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, ऊर्जा की अवस्था में सुधार, गरीबी उन्मूलन हेतु या फिर बेरोजगारी दूर करने अथवा औद्योगीकरण के लिए भी यह सहयोग नहीं मिला है गौतम बुद्ध की जन्म स्थली लुम्बिनी के विकास के नाम पर यह सहयोग प्राप्त हुआ है चीन के इस सहयोग से नेपाल को कितना लाभ मिलेगा यह तो नहीं कहा जा सकता परन्तु इससे चीन को इकतरफा लाभ मिलना तय है
धर्म को हफीम या चरस की संज्ञा देनेवाली चीन की धर्मविरोधी कम्युनिष्ट सरकार के द्वारा नेपाल के लुम्बिनी को अन्तर्रर्ााट्रय बुद्ध स्थल के रुप में विकसित करना रहस्य से परे नहीं है ताज्जुब की बात तो यह है कि माओवादी के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल जिस संस्था के उपाध्यक्ष है वह चीन की एक सरकारी संस्था है एशिया पैसीफिक एक्सचेन्ज एण्ड कोअपरेसन फाउन्डेसन नामक इस चीनी संस्था को नेपाल में निवेश करने के लिए इजाजत कैसे मिली – निवेश के लिए आवश्यक सहमति पत्र पर सहमति कैसे बनी नेपाल सरकार ने दस्तखत कब और कैसे किए – नेपाल के तकरीबन एक साल के सालाना बजट बराबर के पैसे से निर्माण होने वाले इस योजना को बहस में लाए बिना ही अनुमति कैसे मिली- यह आर्श्चर्य एवं रहस्यका विषय बना हुआ है
नेपाल की मिट्टी से भारत विरोधी गतिविधि का संचालन करने के लिए अगर चीन को इजाजत देने जैसे सम्वेदनशील विकाय पर बाकयी निर्ण्र्ााहुआ है तो इससे बडा कोई दूसरा आत्मघाती कदम हो ही नहीं सकता क्योकि इसके जो प्रतिक्रिया होगी उसे नेपाल सम्हाल नहीं सकता अगर चीनको इजाजत मिल जाती है तो लुम्बिनी विदेशी अखाडा बन जाएगा एक शक्ति राष्ट्र के लिए अगर नेपाल के दरबाजे खुलेगें तो औरों को आप कैसे मना कर सकेगें – नेपाल इस तरह के बढ्ते अन्तर्रर्ााट्रय हस्तक्षेप को रोक नहीं सकेगा यद्यपि नेपाल की सरकार ने न तो अब तक इसका खण्डन किया है और ना ही पुष्टि ही
चीन पाकिस्तान के सियाचीन होते काश्मिर, तिब्बत की नेपाल सीमा और भारत के हिमाचल प्रदेश के उस पार सामरिक महत्व के टैंक दौड्ने बाली राजमार्ग का निर्माण कर भारतको घेराबन्दी में डालनेका प्रयास कर रहा है नेपाल के माओवादी और एमाले का प्रयोग कर चीन अब लुम्बिनी में अपना पांव पसार रहा है, सवाल उठता है कि, भारत के सबसे बडे और अति सम्वेदनशील राज्य उत्तरप्रदेश की सीमा पर स्थित लुम्बिनी के विकास के नाम पर अपना केन्द्र स्थापित करना चाहता है सवा दो हजार करोड का निवेश एमाले और माओवादी के लिए तो किया जा नहीं सकता इतना अधिक धन का निवेश लुम्बिनी केन्द्रको जासूसी का अखाडा बनाने के लिए ही किया जाएगा नेपाल की वर्तमान सरकार को चाहिए थी कि इस तरह के निवेशकों को आमन्त्रित करती अथवा अनुमति देने से पहले एक आमसहमति बनाने का प्रयास करती कहा तो यह जा रहा है कि बुद्ध के जन्मस्थल लुम्बिनी को उसी तरह भव्य एवं आकर्ष बनाया जाएगा जिस तरह मुसलमानों के लिए मक्काको एवं कैथोलिक इर्साईयों के लिए भैटिकनको सजाया गया है चीन के निवेश से लुम्बिनी में भव्य मन्दिर, हवाई अड्डा, होटल, सभागार एवं बुद्धिष्ट विश्वविद्यालय बनाया जाएगा नेपाल की राजधानी काठमांडू से १०७ मील दक्षिण पश्चिम में स्थित यह मधेशका भू-भाग भारत की सीमा से महज १३ कि.मि. की दूरी पर है काठमांडू से लुम्बिनी तक “फास्ट रेलवे” संचालन के लिए भी इसी माह र्सर्वे का काम होना है
प्रथम चरण में काठमाडौ- लुम्बिनी फास्ट रेलवे र्सर्भिस तथा अन्तर्रर्ााट्रय विमान स्थल का प्रारम्भिक पर्ूवाधार विकास होगा इस आयोजना के लिए एक खर्ब १२ अरब रुपये खर्च चीनी फाउण्डेसन के द्वारा दिया जाऐगा इससे संबंधित आवश्यक विज्ञ चीन से ही आएंगे ९ वर्षकी अवधि में इसे सम्पन्न किया जाएगा, फिलहाल भले ही सबा दो खरब नेपाली रुपए खर्च किए जारहे है परन्तु आवश्यकताअनुसार और पैसे यह संस्था लगाएगी फाउण्डेसन ने एक हजार मेगावाटका पनविजली योजना बनाने का प्रस्ताव भी नेपाल के समक्ष रखा है इस क्षेत्र में पांच बडे होटल भी खोले जाएगे सेण्टसिटी के नाम से लुम्बिनी जाना जाएगा , अमेरिका, अष्ट्रेलिया और चीन के व्यापारी, ये होटल बनाऐगे लुम्बिनी के विकास में जापान, चीन, कोरिया और श्रीलंका पहले से ही सहयोग करते आया है
चीन का यह सहयोग स्वार्थरहित नहीं है, चीन ने कभी भी नेपालको बिना स्वार्थ सहयोग नहीं किया लुम्बिनी विकास के नाम पर वह वहाँ भारत के खिलाफ षड्यन्त्र करना चाहता है विशेषज्ञ के नाम पर चीन के जासूस आवेगे लुम्बिनी विकास के साथ ही एक हजार मेगावाट पनबिजुली योजना बनानेका प्रस्ताव से ही चीन के असली नियत साफ होती ही है
माओवादी के र्समर्थन पर टिकी वर्तमान सरकार के समय में चीन को नेपाल से अपनी बात बनबाना अनुकूल सावित होते दिख रहा है चीनी जनमुक्ति सेना के प्रमुख जनरल येन बिडदेन मार्च के आखिरी सप्ताह में नेपाल दौरा पर आए इससे पहले सन् २००० के अप्रील में जनरल फू क्वानयु आए थे नेपाल और चीन के बीच १४१४ कि.मि. सीमा लगती है पिछले ११ वर्षमें नेपाली सेना को चीन से १३० मिलियन डलर का सहयोग प्राप्त हुआ है इसमे मेडिकल उपकरण, विकास निर्माण संबंधी उपकरण आदि का सहयोग चीन करती आई है परन्तु भारत का योगदान अहम है भारत से खरीद किए गए सत्तर फीसदी सामग्री नेपाल को अनुदान के रुप में प्राप्त हुआ है तो बाँकी तीस प्रतिशत भी अनुदान में ही तब्दील कर दिया गया चीनी सेना प्रमुख के नेपाल दौरा के एक महिने बाद ही चाईना एमिएसन टेक्नोलोजी इम्पोर्ट एक्सपोर्ट कर्पोरेसन -केटिक/ के उप प्रमुख याङ्ग पिङ्ग नेतृत्व में एक टीम नेपाल आई थी इस टोली के नेपाल आनेका मकसद था शाह ज्ञानेन्द्र के समय में हुए सम्झौते के अनुसार नेपाली सेना के लिए जहाज खरीद करने हेतु पहल करना शाह ज्ञानेन्द्र ने अग्रिम राशि के तौर पर ४० करोड नेपाली रुपये में चीनको दिया था सन् २००५ के सेप्टेम्बर में की नेतृत्व बाली सरकार ने सेना और राजपरिवार के प्रयोजन के लिए दो जहाज चीन से खरीद करने का सम्झौता किया था पुरानी ही कीमत पर अगर चीन जहाज बेचने के लिए तैयार होता है तो शायद सौदा बन जाएगी इतना ही चीन वर्तमान सरकार से और अपेक्षा रखती है मसलन, नेपाल एवं तिब्बत की सीमा से र्सर्ते क्षेत्रों में तिब्बती शरणार्थी के प्रवेश पर रोक
चीन तिब्बत में महावाणिज्य दूतावास बनाने का भी प्रस्ताव नेपाल के समक्ष किया है नेपाली महावाणिज्य दूतावास का निर्माण अगर चीन ही करता है तो चीन के सहयोग से निर्मित नेपाली द ूतावास नेपाल की सुरक्षा और स्वार्थ का संरक्षण करने के बजाय तिब्बती शरणार्थियों का लेखाजोखा करने में ही समय बिताएगा वैसेभी नेपाल और चीन के द्विपयीय व्यापार में नेपाल का पलडा काफी हल्का है तथा एकततरफा रुपमें भी भारी घाटा सहने
के लिए नेपाल बाध्य है अगर चीन के सहयोग से ही ल्हासा में यह कार्यालय बनता है तो वहाँ पदस्थापित नेपाली कर्मचारी के मनोबल पर कैसा प्रभाव पडेगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है वैसे ल्हासा में विश्व के एक ही देश नेपाल का अन्तर्रर्ााट्रय कूटनीतिक मिसन खुला है लेकिन वहाँ पर स्थापित कर्मचारी वेतन पाने के अलावे कुछ कर ही नहीं सकते भारत के विदेश मन्त्रालय मातहत के फाँरन र्सर्भिस इन्स्िटच्यूट में नये नेपाली अधिकृत को इस लिए नहीं पढने दिया जाता है कि कहीं वे भारत के प्रति उदार न हो जाएं परन्तु चीन के पैसे से भी बनने बाले नेपाल का कूटनीतिक कार्यालय नेपाल के प्रति कितना उदार और चीन के प्रति कितना अनुदार होगा – यह तो समय बताएगा, बहरहाल ये जरुर कहा जाएगा कि नेपाल की नयी सरकार को सब कुछ सोचसमझकर ऐसे निर्ण्र्ाालेने चहिए चीन ही नहीं भारत भी हमारा पडÞोसी ही है यह बात हर एक नेपाली शासको के जेहन में होगा नेपाल के हित में होगा
विकिलिक्स साप्ताहिक के खुलासे के बाद तो स्पष्ट ही हो गया कि नेपाल की उत्तरी सीमा में तैनात सुरक्षाकर्मी तिव्वत से नेपाल आए शरणार्थी को चीनी सुरक्षाकर्मी के हवाले कर देते हैं और एवज में उन्हे चीन से पैसे मिलती है चीन ने प्रचण्ड के नेतृत्ववाली माओवादी सरकार के समक्ष प्रस्ताव भी रखा था कि नेपाल एवं चीन के बीच भी वैसा ही संबंध हो जैसा कि नेपाल एवं भारत के बीच है खास करके खुली सीमा एवं सुपर्ुदगी सन्धी आदि चीन के दोने प्रस्ताव पर दस्तखत होने से पहले ही प्रचण्ड जी की सरकार चली गयी थी झलनाथ खनाल की नेतृत्व बाली सरकार के समक्ष भी अगर चीन का प्रस्ताव आए तो आर्श्चर्य नहीं संविधानसभा के निर्वाचन के वाद सत्ता में आई सरकार को चाहिए कि वे संविधान निर्माण और जारी शान्ति प्रकृया को मुकाम तक ले जाएँ विवाद खडी करने वाले सम्झौतों से बचा जाय परराष्ट्र संबंध एक नाजुक मामला है और वह भी जब आप दो वडे महाशक्ति राष्ट्र के बीच में अवस्थित हो दो बडे पत्थर के बीच पडे नाजुक वस्तुको अपने भविष्य की चिन्ता होनी चाहिए जब भी नेपाल में दोनो पडोसी देशों के साथ एक समान संबंध रखने की वात होती है तब यह मान लिया जाना चाहिए कि दाल में कुछ काला है शाह महेन्द्र और पंचायत के ३० साल, शाह ज्ञानेन्द्र का शासन, माओवादी अध्यक्ष की नेतृत्व बाली सरकार और वर्तमान सरकार का उदाहरण के लिए प्रशस्त है देश की विदेशी नीति बनाने और उस पर अमल करने की जिम्मेवारी सरकार की होती है परन्तु देश हिंत और पर जनहित को सर्वोपरी मामना अच्छा रहता है
उत्तरी पडोसी का लुम्बिनी प्रेम एवं बुद्ध भक्ति गले से नहीं उतरता चीन की जिस माओवादी कम्युनिष्ट सरकार ने सांस्कृतिक क्रान्ति के नाम पर तिब्बत के अनगिनत बुद्ध मन्दिरों को ध्वस्त कर दिया, भगवान बुद्ध के प्रतिमा तहसनहस कर दिया भिक्षुओं एवं भिक्षुणियोंको शादी करने के लिए बाध्य कर दिया, हिरासत में रखा तथा अनेको को अपनी मातृभूमिको छोड वेवतन होने को बाध्य कर दिया वही चीन नेपाल में लुम्बिनी विकास के नाम पर बुद्ध धर्मका प्रचार करना चाहता है दलाई लामा जैसे धार्मिक नेता आज भी निर्वासन में है चीन के जेल में आज भी अनेकों भिक्षु बन्द हैं अगर चीन को बुद्ध धर्म का ही विकास करना था तो वह बुद्ध देश के नाम से चर्चित तिब्बत को भी अन्तर्रर्ााट्रय बुद्ध धर्मका केन्द्र बना सकता था तिब्बत में आज भी बुद्ध धर्म की अवस्था चिन्ताजनक है चीन का यह लुम्बिनी प्रेम राजनीतिक एवं सामाजिक हित से जुडा एक गम्भीर एवं कुटिल चाल है जिसे बक्त रहते सम्झना होगा अन्यथा कल, भारत, पाकिस्तान, अमेरिका और अन्य देश भी अपने हिसाब से कुछ न कुछ करना चाहेगा क्या पैसा ही सबकुछ है –
Em२ष्स् िबल)कजचimबल२थबजयय।अom
ििि

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz