स्वास्थ्य योग तथा योगासन आचार्य :श्री स्वामी ध्रुव

 

श्री स्वामी ध्रुव

श्री स्वामी ध्रुव

सबसे पहले इस प्रथम विश्वयोग दिवस के शुभ अवसर पर सभी योग प्रेमियों और इसके अनुयायिओं को हार्दिक बधाई देता हूँ । साथ ही भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को भी धन्यवाद ज्ञापन करता हूँ ।  क्योंकि उनके प्रयास के कारण ही इस वर्ष से सम्पूर्ण संसार में विश्वयोग दिवस मनाया जा रहा है । सच में योग प्रेमियों के लिए यह दिव्य उपहार भी है ।
भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने यूनाइटेड नेशनस के जेनरल ऐसेम्बली में २७ सितम्बर १९१४ को दिये अपने भाषण में योग को विश्व योगा दिवस के रूप में मनाने की बात कही । श्री मोदी के इस प्रस्ताव का समर्थन चीन, कनाडा, अमेरिका के अलावे विश्व के १७५ देशों ने किया । जिसमें नेपाल के प्रधानमंत्री श्री सुशील कोइराला भी थे । इसके परिणामस्वरूप यूनाइटेड नेशनस के जेनरल ऐसेम्बली के दवारा ११ दिसम्बर २०१४ को सर्वसम्मति से यह फैसला किया गया कि आगामी वर्ष से प्रत्येक वर्ष २१ जून को विश्व योगा दिवस ९क्ष्लतभचलबतष्यलब िम्बथ या थ्यनब० मनाया जायेगा ।
वैसे तो नेपाल में भी विभिन्न गुरुओं के अनुयायिओं दवारा सैकड़ों योगा केन्द्र खोले गये हैं । परन्तु इन सारे केन्द्रों में सिर्फ योगासन के बारे में ही बताया जाता है । बहुत थोड़े से केन्द्र है जहाँ पर योगासन के साथ–साथ योग की भी शिक्षा दी जाती है । आमतौर पर ज्यादातर लोग शारीरिक समस्याओं से मुक्ति के लिए योगासन का सहारा लेते हैं तथा योग के बारे में न कुछ जानने का प्रयास करते हैं और न उन्हें कुछ बताया जाता है । यहाँ एक बात अच्छी तरह से समझना जरुरी है कि योग और योगासन में जमीन आसमान का अंतर है ।
आस्तिक शाखाओं के अन्तर्गत छः दर्शन आते हैं ।
१.न्याय, २.वैशेषिक, ३.सांख्य, ४.योग, ५.पूर्वमीमांसा और ६.उत्तरमीमांसा ।
नास्तिक शाखाओं के अंतर्गत छः दर्शन इस प्रकार है ।
१.     चार्वाक, बौद्ध (बौद्ध दर्शन के चार भेद है) बौद्ध चतुष्टयम् २.माध्यमिक, ३. योगाचार, ४.सौेत्रान्तिक ५.वैभाषिक ६. जैन ।
इस प्रकार सामान्यतः बारह दर्शन माने जाते हैं । यहाँ मैं आपको आस्तिक शाखा के अन्तर्गत आनेवाले योग दर्शन के बारे में विस्तृत जानकारी देने जा रहा हूँ ।
इस दर्शन के व्याख्याकार महर्षि पतंजलि है । इसमें ईश्वर जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से व्याख्या किया गया है । इसके अनुसार परमात्मा का ध्यान आँतरिक होता है । जबतक हमारी इन्द्रियाँ बर्हिगामी है, तब तक ध्यान कदापि संभव नहीं है ।
योग दर्शन
योग शब्द संस्कृत के युज धातु से बना है । युज का अर्थ होता है मिलना–जीवात्मा का विश्वात्मा से । इसे ही समाधि कहते है । समाधि मतलब चित्त, अन्तः करण, बुद्धि, अहंकार और मन का निर्मल हो जाना तथा परमात्मा से मिल जाना । हिन्दू दर्शनों में योग दर्शन का महत्व सबसे ज्यादा है । सभी लोग इस पर अत्यधिक श्रद्धा करते हैं । हिन्दू संस्कृति का प्राण योग दर्शन है । परन्तु जैसे नदी पहाड़ों से निकलती हैै तो निर्मल रहती है पर जैसे–जैसे  आगे बहती है मलीन और अशुद्ध होती  चली जाती है । उसी प्रकार विशेषकर ईशा के बाद के व्याख्याकारों ने योग दर्शन को भी मलीन और अशुद्ध कर दिया । सामान्यजन बिना चिंतन मनन के किसी भी टीकाकार या गुरु के अनुयायी बन जाते हैं और मिथ्या भ्रान्तियों से मुक्त नहीं हो पाते हैं ।
महाभारत के पाँच हजार वर्षो के बाद एक ऋषि ने योग साधना के द्वारा विशेष अनुसंधान करके समस्त वैदिक वाङगमय को अच्छी तरह समझा तथा काफी चिंतन मनन  करके अति प्राचीन योग दर्शन को बड़े सरल ढंग से क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया । उनका नाम पतंजलि कहा जाता है । वैसे प्राचीन शास्त्रों के अनुसार लगता है कि जैसे वेदव्यास पद का नाम था व्यक्ति का नहीं उसी  प्रकार पतंजलि भी पद का नाम था व्यक्ति का नहीं । पतंजलि के अनुसार चित्तवृत्तियों का निरोध करने से शक्ति, शान्ति और ज्ञान प्राप्त होता है जिससे मोक्ष भी प्राप्ति होती है ।
जैसे चिकित्सा शास्त्र के चार मुख्य अंग है–रोग, रोग का कारण, आरोग्य और आरोग्य का साधन (उपाय) । उसी प्रकार योग के भी चार भाग है ।
१.    हेय– दुःख का असली रूप क्या है ?
२.    हेय हेतु –त्याग करने वाले दुःख का वास्तविक कारण क्या है ?
३.    हान– दुःख का अभाव क्या है ?
४.    हानोपाय– दुःख मुक्ति का उपाय क्या है ?
इसके उत्तर में योग दर्शन क्रमशः इस प्रकार ये कहता है ।
१. जो भविष्य का दुःख है उसका त्याग संभव है जो दुःख भोगा जा चुका है या वर्तमान में भोगा जा रहा है उसकी निवृत्ति मुश्किल है ।
२.    प्रकृत्ति का संयोगी ही दुःख का कारण है और यह संयोग अज्ञानता
(अविधावश) से होता है ।
३.    प्रकृत्ति और पुरुष का संयोग न होना मोक्ष है ।
४.    मिथ्याज्ञान से मुक्ति मोक्ष का उपाय है और इसका साधन योग है ।
समस्त वैदिक वाङमय के अधिकांश इतिहास के नष्ट होने से यह पता लगाना मुश्किल हो रहा है कि योग की उत्पत्ति कब और कैसे हुई परन्तु प्राप्त जानकारी के अनुसार लगता है भगवान शिव योग के जन्मदाता थे , वैसे श्री महाविष्णु और ब्रह्मा भगवान भी योग के ज्ञाता  थे । योग की महिमा के बारे में समझाते हुए भगवान शिव एक बार माँ पार्वती को बोले–हे प्रिय–ज्ञानवान, विरक्त, धर्मविभूषित, जितेन्द्रिय देवता भी योग के बिना मुक्ति नहीं पा सकते है । महर्षि बादरायण व्यास के द्वारा भी योगसूत्रों पर भाष्य मिलता है । इन्होंने ही महाभारत की रचना की थी । महर्षि वेदव्यास ने वेदान्तसूत्रों तथा महाभारत की रचना की है एवं योग सूत्रों पर भी इनका भाष्य है ।
गीता के १८ अध्यायों में १८ विशेष योगों का वर्णन है –
१.विषाद योग, २.सांख्य योग, ३.कर्मयोग, ४.ज्ञानकर्म सन्यास योग, ५. कर्म सन्यास योग, ६.आत्मसंयम योग, ७.ज्ञानविज्ञान योग, ८.अक्षर ब्रहम योग, ९.राजविधा राजगुह योग, १०. विभूति योग, ११.विश्वरूप दर्शन योग, १२.भक्तियाृेग, १३.क्षेत्रक्षेत्रज्ञ विभागयोग, १४. गुणत्रय विभाग योग,१५.पुरुषोत्तम योग, १६.दैवासुर संपद्विभाग योग, १७.श्रद्धात्रयविभाग योग, १८. मोक्षसन्यास योग ।
इन सभी में तीन प्रमुख योग है– कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग
इन तीनों में ही १८ प्रकार के योग निहित है । एक से लेकर छह  अध्याय में कर्मयोग का, सात से लेकर १२ अध्याय में भक्तियोग का, तेरह से लेकर १८ अध्याय में ज्ञानयोग का वर्णन है ।
शुभ और निष्काम कर्म करना कर्मयोग है । भगवतचेतना को धारण करना भक्तियोग है । भगवदतत्व को जानना ज्ञानयोग है ।
महात्मा बुद्ध के आसपास जो ऋषि पतंजलि हुए उनके अनुसार योग के प्रमुख एवं अन्तिम अंगो में आठ को काफी महत्वपूर्ण माना है । इसे ही अष्टांगिक योग कहते हैं । जन सामान्य लोगों को आसानी से समझने के लिए यह सरल मार्ग है ।
ये है – यम,  नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । इसमें प्रथम चार का संबंध  भाव शुद्धि, शरीर शुद्धि तथा व्यवस्था शुद्धि से है । अन्तिम चार का संबंध  आत्मज्ञान, मुक्ति तथा सत्य प्राप्ति से है ।
एक सरल यौगिक प्रणाली के द्धारा आप भी योग के महत्व को समझ सकते है एवं उससे लाभ उठा सकते है । प्रातः काल स्नान करके कंबल के आसन पर एकांत या बन्द कमरे मे पदमासन, बज्रसान या सुखासन में बैठ जायें । प्रारंभ मे १५ मिनट बैठे बाद में समयानुसार बढ़ायें । इस मे शांत होकर बैठे । आखों को बन्द करके अपना सारा ध्यान जीभ के अग्रभाग पर लगायें । आप तुरन्त पाएँगें कि आपका मन शांत होता चला जा रहा । यह विधि भगवान शिव के शिव सूत्र से लिया गया है इसके व्याख्याकार ओशो हैं ।
संस्थापक तथा संरक्षक
सृष्टि साधना केन्द नेपाल तथा स्प्रिच्युअल इंस्टीच्यूट आँफ माइंड मैनेजमेन्ट, भारत

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