Thu. Sep 20th, 2018

हंस पत्रिका के संपादक मशहूर साहित्यकार राजेंद्र यादव का निधन

 rajendra-yadav-writerअपनी चुंबकीय लेखन शैली से हिंदी साहित्य में बड़ा मुकाम बनाने वाले 84 वर्षीय दिग्गज साहित्यकार राजेंद्र यादव का बीती रात को निधन हो गया। मासिक पत्रिका हंस के संपादक राजेंद्र यादव को कल रात सांस लेने में तकलीफ होने लगी और अस्पताल ले जाते वक्त उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।

28 अगस्त 1929 को आगरा में जन्मे राजेंद्र यादव की गिनती हिंदी के शीर्ष साहित्यकारों में होती थी. उन्‍होंने आगरा विश्वविद्यालय से 1951 में हिंदी साहित्‍य से एमए किया था. उनकी पत्‍‌नी मनु भंडारी भी मशहूर साहित्यकार हैं. राजेंद्र यादव अपनी लेखनी के अलावा कई विवादों के चलते भी चर्चा में रहे. जिस हंस पत्रिका का संपादन राजेंद्र यादव ने किया था, उस हंस पत्रिका का संपादन कभी मुंशी प्रेमचंद ने भी किया था.

वह नयी कहानी के प्रवर्तक भी रह चुके हैं. कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ उन्होंने नयी कहानी आंदोलन की शुरुआत की. इसके अलावा उन्होंने कई उपन्यास और कहानियां लिखीं. उनके मशहूर उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर बाद में बासु चटर्जी ने फिल्म भी बनाई. इसके अलावा उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं. इनमें देवताओं की मृत्यु, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक और वहां पहुंचने की दौड़ प्रमुख हैं.

– राजेंद्र यादव की प्रकाशित पुस्तकें

* कहानी-संग्रह

देवताओं की मूर्तियां (1951), खेल-खिलौने ( 1953), जहां लक्ष्मी कैद है (1957), अभिमन्यु की आत्महत्या (1959), छोटे-छोटे ताजमहल (1961), किनारे से किनारे तक (1962), टूटना (1966), चौखटे तोड़ते त्रिकोण (1987), श्रेष्ठ कहानियां, प्रिय कहानियां, प्रतिनिधि कहानियां, प्रेम कहानियां, चर्चित कहानियां, मेरी पच्चीस कहानियां, है ये जो आतिश गालिब (प्रेम कहानियां) (२००८), अब तक की समग्र कहानियां, यहां तक (पड़ाव) -1, पड़ाव -२ ( 1989), वहां तक पहुंचने की दौड़, हासिल तथा अन्य कहानियां उपन्यास सारा आकाश (1959) (‘प्रेत बोलते हैं’ के नाम से 1951 में), उखड़े हुए लोग (19556), कुलटा (1958), शह और मात (1959), अनदेखे अनजान पुल (1963), एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ) 1963, मंत्रा-विद्ध (1967), एक था शैलेन्द्र (2007)

* कविता-संग्रह

आवाज तेरी है (1960),

* समीक्षा-निबन्ध कहानी ( स्वरूप और संवेदना) 1968, प्रेमचंद की विरासत (1978), अठारह उपन्यास (1981), औरों के बहाने (1981), कांटे की बात (बारह खंड) 1994, कहानी अनुभव और अभिव्यक्ति (1996)

* उपन्यास : स्वरूप और संवेदना (1998), आदमी की निगाह में औरत (2001), वे देवता नहीं हैं (2001), मुड़-मुड़के देखता हूं (2002), अब वे वहां नहीं रहते (2007), मेरे साक्षात्कार (1994), काश, मैं राष्ट्रद्रोही होता ( 2008), जवाब दो विक्रमादित्य,(साक्षात्कार) (2007), संपादन प्रेमचंद द्वारा स्थापित कथा-मासिक ‘हंस’ अगस्त (1987) से, एक दुनिया समानान्तर (1967), कथा-दशकः हिंदी कहानियां (1981-90), आत्मतर्पण (1994), अभी दिल्ली दूर है (1995), काली सुर्खियां (अश्वेत कहानी-संग्रह) (1995), कथा यात्रा, 1967 अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य 2000, औरत : उत्तरकथा 2001, देहरी भई बिदेस, कथा जगत की बाग़ी मुस्लिम औरतें, हंस के शुरुआती चार साल 2008 (कहानियां), वह सुबह कभी तो आएगी (सांप्रदायिकता पर लेख) (2008), चैखव के तीन नाटक (सीगल, तीन बहनें, चेरी का बगीचा) अनुवाद उपन्यास : टक्कर(चैखव), हमारे युग का एक नायक (लर्मन्तोव) प्रथम-प्रेम(तुर्गनेव), वसन्त-प्लावन(तुर्गनेव), एक मछुआ : एक मोती(स्टाइनबैक), अजनबी(कामू)- ये सारे उपन्यास ‘कथा शिखर’ के नाम से दो खंडों में 1994, नरक ले जाने वाली लिफ्‌ट, 2002, स्वस्थ आदमी के बीमार विचार,2012 ,प्रभातखबर,जागारण

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मोहन राना
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वाहहहहह

मोहन राना
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मोहन राना

लेखक की क्या सुन्दर लेखनी है