हड़बड़ी के ब्याह कनपट्टी में सेनूर


व्य‌ंग्य ( बिम्मी शर्मा
हड़बड़ी का काम हमेशा गड़बड़ी वाला होता है । हड़बड़ी करने वाले लोग कहते या बोलते एक चीज हैं पर करते दुसरा ही हैं । यह बिना हड्डी की जीभ जिस तरह लपलपाती है कुत्ते की तरह यही सब आफत की जड़ है । संसद के निर्वाचन में भारी मत से जीत हासिल करने वाली नेकपा एमाले पार्टी को यही जीत अब गले में फांस कि तरह अटक गई है । घोषणा पत्र में तो ईन्होने बहुत बडेÞ–बडेÞ वादे किए और मतदाता को आश्वासन भी खुब दिया । पर जब इन वादों और आश्वासनो को अमली जामा पहनाने का वक्त आया तब नेकपा एमाले के सुप्रिमो कहते हैं कि निर्वाचन के समय मे बोले गए बातों और आश्वासनो पर अब समीक्षा होगी ।
देखा आपने ऊंट को, कैसे पहाड़ के नीचे आने पर उसको अपनी औकात पता चलती है । चन्द्रमा पर रकेट पहुंचाने और पांच साल में गरीबी खत्म करने की बात जो नेकपा एमाले की घोषणा पत्र में उल्लेख है अब उसको पूरा करें तो कैसे ? उपर से स्थानीय तह के निर्वाचन में पांच साल के अदंर ही मोनो और मेट्रो रेल निर्माण का भी आश्वासन मतदाताओं को दिया गया था । अब उसको पूरा करे तो कैसे ? जनता अब उतनी भोली भी नहीं रही जो लालीपाप दे कर फुसलाने से बहल जाए । वह तो अब अपने हरेक मत का हिसाब रखती है चाहे वह वोट नोट में ही क्यों न बिका हो । जब जनता गले पड़ कर घोषणा पत्र की बात को पूरा करवाने के लिए जिद करेगी तब क्या होगा ? अब श्री केपी ओली महाशय के हाथ के तोते उड़ गए हैं । इसी लिए समीक्षा करने की बात करने लगे हैं । उनके मुहावरों से लवरेज जिह्वा भी अब शायद कुंद पड़ गई है ।
नेकपा एमाले के ही वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल भी पांच साल के अदंर मोनो और मेट्रो रेल का वाद पूरा करना संभव नहीं है कह कर पल्ला झाड़ रहे हैं । वरिष्ठ नेता नेपाल ने तो यहां तक कह दिया कि घोषणा पत्र हड़बड़ी में बनाया गया है । यह तो वही बात हो गई हड़बड़ी में ब्याह करने पर दूल्हन के माँग पर दूल्हे के द्धारा लगाने वाला सेनूर कनपट्टी मे लगने पर दूल्हन बेचारी का हाल क्या हुआ होगा ? बेचारी रुआंसी हो कर सोचती है कि हाय दैया हडबडी में कैसा दूल्हा मिल गया मुझे जो सब गड़बड़ कर गया । नेपाल की जनता भी उसी दूल्हन की भांति है जो नेकपा एमाले के सुप्रिमो ओली और वरिष्ठ नेता नेपाल की बातें सुन कर चकरा गयी है ।
कुछ साल पहले की एक सच्ची घटना है जो वारा जिले में हुई थी । किसी लडकी की शादी में ठीक सिदूंर दान के समय बिजली के गूल हो जाने से दूल्हन की मांग पर लगाया जाने वाला सिदूंर बगल में बैठी सास या कोई दुसरी औरत की मांग पर गलती से लग गया था । यहां नेकपा एमाले के नेता गण के दिमाग की बत्ती गुल हो गई है ईसी लिए हड़बड़ी में घोषणा पत्र में असंभव से आश्वासनो का पिटारा खोल कर जो गडबड कर चुके हैं अब उसको कैसे संभाला जाए इसी में अपने डेढ आने के दिमाग को खर्च करे हैं । इसी में बेचारी नेकपा एमाले नाम की पार्टी को ही लोडसेडिगं हो गया है । इसी लिए बेचारी कुछ देख नहीं पा रही हैं ।
संसद के निर्वाचन में ज्यादा से ज्यादा सीट में जीत हासिल करने के लिए नेकपा एमाले ने एमाओवादी के साथ जो ‘ठगबंधन’ किया था वह गले की हड्डी बन चूकी है जो न निगलते बन रही न उगलते । ओली और कमरेड प्रचंड की जुगलबंदी बहुताें को रास नहीं आ रही है । उस पर तुर्रा यह कि इन दोनो दलों के बीच अगर एकता हो गई तो पार्टी अध्यक्ष कौन बनेगा इृसी पर विवाद है । उस पर ताजा जनादेश के मुताबिक नए, नवेले प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति कौन बनेगा इस पर भी दोनो कथित एक हुए दल के बीच विवाद होगा । ओली तो कह ही चुके है कि एकता हो ही यह जरुरी नहीं है । बस सरकार बनाने तक के लिए सभी एक, दुसरे को आस, भरोसा दे रहे हैं । सरकार बनने के बाद यही नेता और इन का कथित राजनीतिक दल उसको गिराने के लिए एडी, चोटी का जोर भी लगाएगा ही । सौ बात की एक बात यह है कि यह कथित एकता या गठबंधन सब छलावा है निर्वाचन में ज्यादा से ज्यादा सीट पर जीत दर्ज करवाने के लिए । हाथी के खाने के दांत कुछ और खाने के दांत कुछ और हैं । बस मुर्ख मतदाता को यह बात देरी से समझ आई है । जीभ चलाने कि तरह आसान नहीं है मोनो रेल या मेट्रो रेल चलाना । उसको दौड़ाने के लिए एक अदद ट्रैक की जरुरत होती है । खयाली पुलाव में कोई स्वाद नहीं होता । ईसी लिए घोषणा पत्र लिखते समय थोड़ा सा ध्यान देते तो यह ‘हड़बड़ी के ब्याह कनपट्टी में सेनूर’ वाली बात नहीं होती । हड़बड़ी करने से चुनाव तो जीत गए पर घोषणा पत्र में हुई गड़बड़ी की भरपाई कौन करेगा ? बोलते समय जीभ पर थोड़ी सी भी लगाम लगाते तो आज ऊँट की हालत नहीं होती जनाब ।

 

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