हमने दीवारो दर को अपना लहू तक पिला दिया, फिर भी यह देश किराए का घर लगा : मुरलीमनोहर तिवारी

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), बीरगंज , २४ अक्टूबर |

जब आंदोलन के ७०दिन के बाद भी अंजाम अनिश्चित हो, तो नेपाल के नाम पर रोना आएगा ही। हम भूल जाते है, हमारी लड़ाई स्थाई सत्ता से है, जिसने नक्कली संघियता, नक्कली परिवर्तन, नक्कली नया नेपाल के नाम पर हजारों नेपालियों को मौत के घाट उतार दिया। आज नाकाबंदी में वही जनता परेशान है जिसे इन्होंने हर बार लूटा है, हर बार रौंदा है। ये नाकाबंदी सालों चलती रहे, ये झूठे राष्ट्रवाद, झूठे नारों और झूठे जुमलों से पहाड़ी जनता को भ्रमित करके मौज उड़ायेंगे। स्थाई सत्ता की जरुरत हर हालात में पूरी होती ही है। द्वंदकाल में इन्हें सुरक्षा, सुबिधा, क्षतिपूर्ति मिलती रही। भूकंप में तिरपाल, खाद्य सामग्री मिलती रही। नाकाबंदी में भी तेल, गैस, रासन मिल ही रहा है। बाक़ी पहाड़ी जनता भूखे मरे इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। “जनता चाहे मरता, अपना पेट भरता”। अफ़सोस आता है की पहाड़ी जनता इतनी सरल और सहज है की आज तक इनके झांसे में आती रही है। “जिसने लूटा है, वही रोता है इनके हाल पर, आप ही कहिए, ये रोना क्या अदाकारी नहीं”।

ए  आंदोलन,  तेरे  अंजाम  पे  रोना  आया।
जाने क्यू, अब नेपाल के नाम पे रोना आया।।

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मधेश में आंदोलन के स्वरुप पर बहस छिड़ी है। उपेन्द्र यादव आंदोलन कड़ा होने का दम्भ भरते दिख रहे है। महंथ ठाकुर पुरे दृश्य से ओझल हो गए है। पर आगे की तैयारी कुछ नहीं है। सिर्फ बीरगंज भरोसे आंदोलन टिका हुआ है, जो की एक दुर्घटना में समाप्त हो सकता है। कही भी आंदोलन का संगठन निर्माण नहीं हुआ। छठ बाद धान कटनी में उपस्थिति कम हो जाएगी, तब क्या होगा ? पहाड़ी दल के मधेशी अब बिल से निकलने लगे है। नेका के केंद्रीय सदस्य अजय चौरसिया माहौल भाप कर नाका पर पहुचे, समर्थन भी किया, पर बड़ी चालाकी से अपनी पार्टी के कुकृत्य पर पर्दा डाल आएं। पर्सा के बिरंचीबर्वा में एमाले वालो ने शहीद परिवार का सम्मान नहीं होने दिया। मधेशी जनता के आक्रोश और बिरोध के बिच राजेन्द्र महतो उसी मधेश बिरोधी के घर भोजन करने का कार्यक्रम बनाने से, जले पर नमक छिड़कने और शहीदों का अपमान करने का कार्य हो रहा है। “छोड़ दो सांपो को दूध पिलाना, हादसा किसी रोज भयानक होगा”।

आज भी मधेशी दल एक साथ नहीं है। एक दूसरे पर छिटाकसी हो रही है। बिरगंज के अलावे बाक़ी सब नाका का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। इस पर कोई चर्चा, कोई रणनीति नहीं बना। सब जगह युवा अलग देश का नारा उछाल रहे है, जो की और भयावह है। अलग देश की बात बुज़दिली है। अगर दम है तो पुरे नेपाल पर शासन स्थापित कर अपनी काबलियत का प्रमाण देने की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। सीके राउत का तिलिस्म सर चढ़कर बोल रहा है। अलग देश का फेंटेशि युवाओ को आकर्षित तो कर रहा है, पर दम- बेदम है। इन्होंने कल्पना पर अलग देश, अलग बिधान, मधेश राष्ट्र गान सब बना लिया है। अब मधेश देश का मंत्रिमंडल बना कर, दलाईलामा की तरह निर्वाषित जीवन निर्वाह करना मात्र बाक़ी रह गया है।sipu-2
“कुछ यु हमारे ज़ख्मो का किया इलाज, मलहम भी लगाया तो काटो की नोक से”।

सरकार अभी भी धमकी ही दे रही है। कायर तभी धमकी देता है, जब सुरक्षित होता है। इस धमकी पर मनन करने की जरुरत है। अपनी रणनीति बनाने की जरूरत है। हमें नाका के साथ-साथ काठमांडू में भी बिरोध का कार्यक्रम करना चाहिए। अब हिम्मत करके पहाड़ में भी कार्यक्रम करना चाहिए, शुरुआत में बिरोध झेलना पड़ेगा, फिर भी हमें पहाड़ी जनता के बिच जाना चाहिए। उन्हें बताना होगा की हमारी मांगे उनके खिलाफ नहीं है। क्या स्वायत्ता सिर्फ मधेश के लिए होगा या और राज्य भी लाभान्वित होंगे। क्यों भारत, अमेरिका, राष्ट्र संघ ने सबिधान का स्वागत नहीं किया ? क्यों घर में घुस कर गोली मारी गई ? क्यों छुपे हुए को निकालकर मारा गया ? क्यों घायल को पानी पिलाते समय पीछे से गोली मारा ? क्यों साइकल से घर जाने वाले को, जमीन पर गिरे घायल को, ट्यूसन से लौटती किशोरी को गोली मारी गई ? क्या ये आतंकवादी थे ? कही बम लगाने जा रहे थे ? क्या नेपाल के लोकतंत्र के लड़ाई में हम साथ नहीं थे ? क्या भूकंप के समय हमने दर्द बाटने की कोशिश नहीं की ? फिर ये भेदभाव क्यों ? “हमने इन दीवारो दर को अपना लहू तक पिला दिया, फिर भी ये हमेशा किराए का घर लगा”। जय मधेश।।sipu-1

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