हमारा संघर्ष विखण्डन के लिए नहीं, पहचान के लिए हैं (भाग २)

पहचान में आधारित राज्य व्यवस्था
हमारा संघर्ष पहचान में आधारित संघीय राज्य निर्माण के लिए हैं । अभी हाल जो प्रस्ताबित संघीय राज्य है, वह पहचान में आधारित नहीं है । इसीलिए संविधान और प्रस्तावित संघीय संरचना के विरुद्ध मधेशी मोर्चा तथा संघीय लोकतान्त्रिक मोर्चा ने लम्बे समय तक संघर्ष किया । अभी तक हम लोग उसमें पूर्ण सफल नहीं हो पाए हैं । मैं जोर देकर कहता हूँ कि नेपाल में पहचान के आधार में संघीय राज्य निर्माण होना ही चाहिए । क्योंकि हमारे यहां जो विभेद होता आ रहा है, वह सब पहचान के आधार में ही हो रहा है । विभिन्न जातजाति, भाषाभाषी तथा सांस्कृतिक विविधता ही हमारी पहचान है । राज्य संयन्त्र भी हमारे इसी पहचान के आधार में विभेद करता है । पहचान के आधार में विभेद किया जाता है तो पहचान के आधार में ही संघीय राज्य निर्माण होना चाहिए, उसके बाद ही विभेद की श्रृखला का अंत हो सकता है ।
वि.सं. २०६२–०६३ में तत्कालीन शाही शासन के विरुद्ध जनआन्दोलन हुआ । जनआन्दोलन के बाद जो अन्तरिम संविधान निर्माण किया गया, उस में लिखा है कि सभी जातजाति, भाषाभाषी और सांस्कृतिक विभेद का अंत कर राज्य की अग्रगामी पुनर्संरचना की जाएगी । अन्तरिम संविधान में एकात्मक राज्य संचरना को अन्त करने की बात भी उल्लेख है । लेकिन नयां संविधान जारी करते वक्त उस को अनदेखा किया गया । हम लोग कह रहे थे– लोकतान्त्रिक संघर्ष से प्राप्त उपलब्धि को समानता के आधार में वितरण करना चाहिए, लेकिन उन लोगों ने नहीं सुना । हमारे ऊपर विखण्डनकारी का आरोप लगाया गया । लेकिन हमारा संघर्ष विखण्डन के लिए नहीं, पहचान के लिए हैं । हम भी नागरिक है, नागरिक को प्राप्त होनेवाला अधिकार और हैसियत समान रूप में मिलना चाहिए । हमारे देश में जो भी प्राकृतिक सम्पदा तथा मानव निर्मित भौतिक स्रोत–साधन है, उन सभी में हमारा भी समान पहुँच और अधिकार स्थापित होना चाहिए । इसके लिए ही पहचान में आधारित राज्य संरचना आवश्यक है ।
अभी जो सत्ता में हैं, वहीं लोग राज्य के सम्पूर्ण साधन–स्रोत के हकदार बन रहे हैं । शासन संयन्त्र में एक निश्चित जाति, भाषा–भाषी और सांस्कृतिक पहचानधारी का ही प्रभुत्व है । अन्य सब पीछे पड़े है । जो पीछे हैं, वे लोग अपने कारण पीछे नहीं हैं । राज्य संयन्त्र के दमन के कारण पीछे हैं । ऐसी ही अवस्था को औपनिवेशक शासन कहा जाता है । इसीलिए हमारी मांग है कि यह अघोषित औपनिवेशिक शासन अंत हो, समान अधिकार और हैसियत प्राप्त हो । इस तरह की चाहत सिर्फ मधेशियों की नहीं है, खुम्बुवान राष्ट्रीय मोर्चा के नाम में जो आन्दोलन हो रहा था, उसके अन्दर भी यही चाहत थी । इसीलिए आज हम लोग एक हुए हैं ।

नेपालः एक बहुराष्ट्रीय राज्य
यहां एक महत्वपूर्ण बात स्मरण करना चाहता हूँ । जब संसार में शासक वर्ग कमजोर हो जाते हैं, जब वे लोग अपनी सत्ता और प्रभुत्व में खतरा महसूस करते हैं, तब भयभीत होने लगते हैं । ऐसी अवस्था में वे लोग ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रीयता’ की बात करते हैं । हमारे देश में अभी वही हो रहा है । ऐसी अवस्था सिर्फ आज ही दिखाई दे रही है, ऐसा नहीं है । समय–समय पर होता ही रहता है । और यह सिर्फ नेपाल में ही नहीं, विश्व राजनीति में भी ऐसा ही होता आ रहा है । जब जनता अधिकार के लिए आन्दोलित हो जाती हैं, तब देश के शासक वर्ग ‘राष्ट्रीयता’ का नारा लगाने लगते हैं । राष्ट्रीयता की गलत व्याख्या कर अधिकार माँगनेवाले जनता को बदनाम करने लगते हैं ।
राष्ट्रीयता क्या है ? राष्ट्रीयता तो जनता की सामुहिक राजनीतिक पहचान है । और, यह आन्दोलन भी है । अपनी–अपनी राष्ट्रीयता अर्थात् राजनीतिक पहचान के लिए ही आज हम संघर्षरत हैं । यहाँ एक बात स्वीकार करनी ही होगी– नेपाल एक बहुराष्ट्रीय राज्य है । प्रत्येक राष्ट्र को अपने ऊपर शासन करने का अधिकार खुद को होता है । लेकिन हमारे यहां राष्ट्रीयता के नाम में हम लोगों को बदनाम किया जा रहा है । मधेशी जनता जो राष्ट्रीयता चाहती है, उस को देने के लिए परम्परागत मानसिकता लेकर चलनेवाले शासक वर्ग तैयार नहीं है । उसी तरह जनजाति जो राष्ट्रीयता मांग रहे हैं, वह देने के लिए भी शासक वर्ग तैयार नहीं हैं ।
जनजाति तों कहा जाता है, लेकिन जनजाति को एक ‘राष्ट्र’ अर्थात् ‘राष्ट्रीयता’के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता । हम जिसको जनजाति के रूप में जानते हैं, उन लोगों की अपनी ही भाषा, संस्कृति और भू–गोल है । यह उनकी पहचान है, यही पहचान ही उनके लिए ‘राष्ट्रीयता’ है । लेकिन हमारी पुरानी राज्य संरचना और उसके सञ्चालक इस सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है ।
मधेशी और जनजाति नेपाल के वास्तविक निवासी हैं, यह भूमि उन की अपनी भूमि है । उन लोगों की पहचान ही, उनकी राष्ट्रीयता है । जब मैं विद्यार्थी था, उस वक्त ‘वल्लो किराँत’, ‘पल्लो किराँत’ आदि के बारे में पढ़ते थे । आज ‘लिम्बुवान’ तथा ‘खुम्बुवान’ भी सुनने को मिल रहा है । कोई तो मुझे बता दे कि यह क्या है ? खैर, मैं ही बताता हूँ– यह उन लोगों की भौगोलिक पहचान है, संस्कृति है । अब क्या यह ‘राष्ट्रीयता’ की परिभाषा नहीं हो सकती ? इसीलिए अभी जो संविधान जारी किया है, उसमें अपनी पहचान तलाश करनेवाले तमाम मधेश, जनजाति, आदिवासी, थारु अपनी पहचान नहीं देख रहे हैं ।

बहु–भाषिक देश
राजतन्त्रीय शासन व्यवस्था में ‘एक–भाषा’ नीति लागू की गई, जिस को हम ‘नेपाली भाषा’ के रूप में जानते हैं । इसीतरह एक ही भेष (पोशाक) का नारा भी दिया गया, जहाँ सभी जनजाति, समुदाय तथा भाषा–संस्कृति वाले लोग शासक द्वारा निर्धारित पोशाक पहने के लिए बाध्य हो गए हैं । इसीतरह हिन्दू धर्म ही राज्य का धर्म रह गया । इतना ही नहीं, शाह वंश तथा उनके उत्तराधिकारी को गौरवपूर्ण इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया गया, उस को स्वीकार करने के लिए सभी नागरिकों को बाध्य किया गया । और इसी को ‘राष्ट्रीयता’ का प्रतीक माना गया । अगर कोई इस तथ्य को अस्वीकार करते थे तो वह राष्ट्र–विरोधी तत्व हो जाता था । लेकिन अब नेपाल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हो गया है । राजतन्त्र भी नहीं है । कल तक हम लोग जिस को अपना गौरव मानते हुए सम्मान करते थे, वह संस्था भी आज नहीं है । अर्थात् कल जो ‘राष्ट्रीयता का प्रतीक’ थी, आज वह इतिहास हो चुका है । अब उस वक्त का अत्याचारपूर्ण इतिहास हमारे सामने नहीं है । उस में कुछ परिवर्तन तो जरुर हुआ है । लेकिन अभी भी पूर्ण परिवर्तन नहीं हो पा रहा है । आज भी भाषा को ‘राष्ट्रीयता का आधार माना गया है । यह तो अन्याय है । क्योंकि नेपाल में रहनेवाले सभी एक ही भाषा नहीं बोलते हैं । यहां विभिन्न भाषाभाषी रहते हैं । यहाँ एक ही धर्म–संस्कृति माननेवाले व्यक्ति भी नहीं है । इसीलिए भाषा और संस्कृति के नाम में जो विभेद हो रहा है, उसका भी अंत हम लोग चाहते हैं ।
हां, आर्थिक दृष्टिकोण से हम लोगों में से कोई अमीर और कोई गरीब हो सकता है । लेकिन भाषा और संस्कृति के दृष्टिकोण से हम अमीर हैं । लेकिन हमारी भाषा–संस्कृति का संरक्षण क्यों नहीं हो रहा है ? हमारे संघर्ष का एक प्रश्न यह भी है । जब हम लोग पहचान की बात करते हैं, वहां भाषा और संस्कृति की बात जुड़ कर आती है । भाषा और संस्कृति कभी भी लोगों को आपस में तोड़ने का काम नहीं करती, जोड़ने का काम करती है । लेकिन हमारे शासक वर्ग कहते हैं– ‘इसके चलते सामाजिक विद्वेष फैल जाता है, भाषा आपस में द्वन्द्ध पैदा करती है और आपस में युद्ध हो जाता है ।’ इस तरह का गलत प्रचार करने से सत्य को छिपाया नहीं जाता । भाषा और संस्कृति हरदम लोगों को आपस में करीब लाती है । जिस देश में जितनी ज्यादा भाषा और संस्कृति होती है, उतना ही देश सम्पन्न माना जाता है । भाषा और संस्कृति के कारण ही हमारी ज्ञान की सीमा बृहत हो जाती है । दूसरी बात, भाषा विश्वव्यापी पहचान भी है ।
जब हम विदेश जाते हैं, हम नागरिकता और पासपोर्ट दिखाते हैं, उसमें क्या लिखा होता है ? हमारा नाम–जाति के अलावा हमारा जन्मस्थान का ठिकाना भी होता है । वह हमारी भूमि की पहचान है । अर्थात् उससे हमारी मातृभूमि की पहचान हो जाती है ।
हमसे पूछा जाता है कि हमारा संघर्ष किस लिए ? हमारी भाषा, हमसे छीन ली गई, हमारी संस्कृति के ऊपर दमन और शोषण हो रहा है, फिर भी हमसे प्रश्न किया जाता है कि आप का संघर्ष किस लिए ? इस प्रश्न से मुक्ति पाना ही होगा । इसके लिए नेपाल को बहुराष्ट्रीय राज्य के रूप में स्वीकार करना ही होगा । नेपाल में जितनी भी भाषा और संस्कृति है, वह किसी भी शासक से कमजोर नहीं है । शासक वर्ग का दमन में रहते हुए भी यहां उत्कृष्ट कलाकृति का जन्म हो रहा है । लेकिन शासन–सत्ता के दमन के कारण वह सब पीछे है । हम लोग उसको आगे लाना चाहते हैं ।
यहां एक बात को स्वीकार करना ही होगा कि पहाड़ में रहनेवाली जनजाति और तराई में रहनेवाले मधेशियों के ऊपर शोषण करने के लिए ही उन लोगों को नेपालीकरण किया गया है । एक भाषा, एक भेष और एक संस्कृति की जो नीति है, वह शोषण के लिए ही है । इसीलिए बहुजातीय, बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक पहचान को अंत कर एकल जातीय पहचान स्थापित किया गया है । आज जो दमन में पड़े हैं, जातीय और भाषिक विभेद में पड़े है, उन समुदायों की पहुँच शासन–सत्ता में नहीं है । हमारी जमीन और स्रोतों के ऊपर शोषण हो रहा है । एक तथ्य की ओर ध्यानाकर्षण करना चाहता हूँ । वर्तमान राज्य संरचना में कितनी संख्या में जनजाति हैं ? कितनी संख्या में मधेशी हैं ? निर्णायक तह में कौन–कौन रहते हैं ? इन सभी प्रश्नों का एक ही जवाब आता है– हर जगह में एकल जातीय पहचान ही पाते हैं । क्या यही है, राज्य की पुनसंरचना ?     क्रमश ….

हमारी आवाज की गलत व्याख्या की जाती है (भाग १)

 

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