Fri. Sep 21st, 2018

हमारी आत्मा निर्दोष है

 

हमारी आत्मा का मूल स्वरूप अहिंसक है। गुस्सा तो उस के लिए विजातिया तत्व की तरह है। हमारी आत्मा निर्दोष है। जब कभी हमारा दिमाग चीजों में उलझता है। तब हम गुस्से और हिंसा से भर उठते हैं।

अगर हम ध्यान की मदद से अपनी आत्मा को शक्तिशाली बनाएं तो अपने गुस्से और हिंसक बर्ताव पर भी काबू पा सकते हैं।

हमारा मस्तिष्क इच्छाओं की तृप्ति चाहता है और जब वे पूरी नहीं होती हैं तो वह निराशा और नाराजगी जाहिर करता है। कुछ लौगों को भौतिक वस्तुओं की जरूरत होती है तो कुछ लोगों को नाम और प्रशंसा की।

कुछ सत्ता चाहते हैं तो कुछ सेना। इस तरह की इच्छाएं अनंत हैं और वे आत्मा के बजाए दिमाग से उपजती हैं। दिमाग से ही वे पैदा होती हैं।

इच्छाओं के अतृप्त रहने पर हम कई तरह से गुस्सा जाहिर करते हैं। कई बार हम अपने हाव-भाव से गुस्सा जाहिर करतते हैं तो कई बार अपशब्दों से। आवाज का उतार-चढ़ाव भी गुस्सा जताने के काम आता है।

जिंदगी में दो लोगों के विचार में हमेशा ही अंतर होगा, तो फिर हिंसा या गुस्से के लिए जगह क्यों होना चाहिए ? लेकिन गुस्सा समझबूझ को हर लेता है। तो प्रयत्न गुस्से को जीतने का होना चाहिए।

कैसे गुस्से को जीता जाए ?  जब भी क्रोध से सामना हो तो तुरंत कोई प्रतिक्रिया न दी जाए। उस समय शांत रहें। हो सके तो उस जगह या उस स्थिति से खुद को हटा लें।

जहां गुस्सा आ रहा है। शांति से बैठकर चीजों के बारे में सोचें। इस तरह सोचने पर ही आप किसी रचनात्मक और सही समाधान तक पहुंच पाएंगे।

इस तरह आप पाएंगे। बेवजह चीजों को तूल देकर आप अपनी आत्मा की शांति को भंग कर रहे हैं। अपने मन को शांति की तरफ ले जाएं तो आप अपने गुणों की ओर ध्यान दे पाएंगे।

गुस्सा सिर्फ दूसरों का ही अहित नहीं करता वह आपको भई गंभीर नुकसान पहुंचाता है। हमारी पूरी कोशिश होना चाहिए कि हम अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें।

 

जागरण

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