हमारी आवाज की गलत व्याख्या की जाती है (भाग १)

लेकिन नेपाल–एकीकरण का इतिहास देखें तो वहां अपने ही देश में रहनेवाले अलग जाति और भाषा–भाषी वाली जनता के नाक, कान और हाथ–पैर काट दिए गए हैं
विभेदपूर्ण इतिहास
इतिहास देखने से पता चलता है कि नेपाल में विभिन्न जाति, आदिवासी, मधेशी, मुस्लिम आदि समुदाय सदियों से अपने अधिकार से वञ्चित होते आ रहे हैं । इसीलिए अधिकार से वञ्चित समुदाय संघर्ष करते आ रहे हैं । आज तक उन लोगों ने जो संघर्ष किया, अकेले ही किया । लेकिन संघर्ष करनेवालों की पीड़ा समान है । पीड़ा और संघर्ष का उद्देश्य समान है, लेकिन संघर्ष अकेले करने के कारण उन्हें सफलता नहीं मिली है । अब अकेले नहीं, सभी पीड़ितों को एक होकर संयुक्त संघर्ष करने का समय आ गया है ।
आदिवासी, जनजाति, मधेशी तथा दलित ऐसे जनसमुदाय हैं, जो ऐतिहासिक रूप में विभेदित में हैं । शासन–सत्ता में उन लोगों की पहुँच शून्य के बराबर हैं । जात–जाति, भाषा–भाषी और अमीर–गरीब के आधार में वे लोग शोषण में पड़ रहे हैं । यहाँ तक कि राज्य द्वारा कानूनी रूप में ही उन लोगों के ऊपर शोषण होता आ रहा है । गोरखा राज्य के विस्तार से ही इस देश में रहनेवाले बहुत भाषाभाषी और जाति अपना अस्तित्व खो बैठी है, यह जीवित इतिहास हमारे सामने है । एकीकृत नेपाल का नेतृत्व करनेवाले शासक वर्ग कानून निर्माण कर ‘एक भाषा, एक भेष’ की नीति को लागू किया । गोरखा राज्य विस्तार को इतिहास में ‘नेपाल एकीकरण’ कह कर नामाकरण किया है । लेकिन वह एकीकरण, वास्तविक एकीकरण नहीं था । जहाँ दो या दो राज्यों से ज्यादा राज्यों का एकीकरण होता है, एकीकरण से प्राप्त नए भूगोल में रहनेवाली जनता को भी अपने देश के ही नागरिक की तरह सम्मान किया जाता है । उन लोगों के नाक और कान नहीं काट दिए जाते हैं । लेकिन नेपाल–एकीकरण का इतिहास देखें तो वहां अपने ही देश में रहनेवाले अलग जाति और भाषा–भाषी वाली जनता के नाक, कान और हाथ–पैर काट दिए गए हैं । इसीलिए पृथ्वीनारायण शाह द्वारा किया गया एकीकरण सिर्फ भू–गोल का एकीकरण था । भावनात्मक एकीकरण नहीं था । अगर भावनात्मक एकीकरण होता तो जनता खुश होती । लेकिन उस समय से आज तक जनता एकीकरण से खुश नहीं है । राज्य शक्ति को प्रयोग कर उस वक्त का वास्तविक इतिहास आज मिटाने की कोशिश हो रही है ।
कहीं राज्यों के बीच एकीकरण होता है तो वहाँ जनसंख्या में वृद्धि होती है, भूमि के क्षेत्रफल में वृद्धि होती है । देश के प्राकृतिक साधन–स्रोत में भी वृद्धि होती है । इन सभी पक्ष में वृद्धि होने के कारण देश समृद्ध होना चाहिए था । देश के नागरिक अमीर होने चाहिए थे, लेकिन नहीं हो सका । क्यों ? क्योंकि उस वक्त जिन्होंने भू–गोल में जीत हासिल किया, वो वहां रहनेवालों का दिल नहीं जीत पाए । विजेता ने ठान लिया है कि वह विजयी शासक हैं । इसी घमण्ड के कारण वह अपनी मनमानी करते आ रहे हैं । विजयी शासक राज्य में रहनेवाले विभिन्न जात–जाति और भाषा–भाषी के ऊपर शासन करते रहे । वहां रहनेवालें नागरिकों को भी नागरिक नहीं, दास मान लिया । सामन्त लोग जिस तरह व्यवहार करते हैं, उसी तरह उस भू–गोल में रहनेवाली जनता के ऊपर व्यवहार होता रहा । शासक और जनता के बीच नौकर और मालिक की तरह संबंध रहा । संक्षेप में कहे तो विजयी भूमि में शासको ने औपनिवेशिक शासन लागू किया । दुर्भाग्यपूर्ण यही इतिहास, आज के शासक वर्ग भी जारी रखना चाहते हैं । जिसके चलते आज हमारा देश विकसित नहीं हो पा रहा है और हम लोग संघर्ष कर रहे हैं ।


इतिहास अध्ययन करते हैं तो पता चलता है कि तत्कालीन औपनिवेशक शासन–सत्ता के विरुद्ध सिर्फ पूर्वी पहाड़ तथा पूर्वी मधेश में १२५ से ज्यादा सामाजिक नेतृत्व ने विद्रोह किया था । लेकिन तत्कालीन राज्य सत्ता ने उन लागों को चोर–डाकू कहा, विभेद के विरुद्ध शुरु विद्रोह को गलत व्याख्या किया, और राज्य शक्ति के बल पर उन लोगों के ऊपर दमन किया । उक्त वक्त विद्रोह को निमर्मता पूर्वक दमन किया गया, उसी दमन को आज कुछ वर्ग एकीकरण नाम देकर गर्व करते हैं । उस वक्त अगर जनता की भावनात्मक पक्षों को एकीकरण किया जाता तो उस तरह दमन नहीं करना पड़ता था । एकल जाति, एकल भाषा, एकल धर्म के वर्चश्व स्थापना के लिए ही वह दमन हुआ था । दुर्भाग्य कि बात तो यह है कि आज की २१वीं शताब्दी में भी वही एकल जाति, भाषा और धर्म के नाम में राज्य सञ्चालन का प्रयास हो रहा है । हमारे विद्रोह, हमारे आन्दोलन वही एकल जातीय पहचान के विरुद्ध है ।
अगर शरीर में आत्मा नहीं रहेगी तो वह शरीर सिर्फ मांसपेशी और अस्थिपञ्जर सम्मिलित नाशहीन और कामहीन वस्तु बन जाता है, वहां जीवन नहीं रहता । आत्मा बिना का अस्थिपञ्जर हो या नहीं, इससे कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है । राज्य विस्तार के बाद एकीकृत नेपाल की हालत भी ऐसी ही अवस्था में थी । अस्थिपञ्जर तो थी, लेकिन आत्मा नहीं थी । जनता–जनता के बीच आपसी आत्मीयता नहीं थी । शासकों का अत्याचार चरमोत्कर्ष पर था । उसी अत्याचार के विरुद्ध हम लोगों ने आवाज बुलंद किया, जो आज भी जारी है । लेकिन हमारी आवाज की गलत व्याख्या की जाती है, ‘राष्ट्रीयता विरोधी आन्दोलन’ कह कर प्रचार किया जाता है । आज समय आ गया है– अब ऐसे कु–प्रचार और भ्रम को मिटाना है ।
हमारी चुनौती
विभेद विरुद्ध जारी आन्दोलन को सफल बनाना ही हमारी प्रथम चुनौती है । उसके लिए तराई–मधेश, पहाड़ और हिमाल में रहनेवाले सभी उत्पीड़ित समुदाय को एकजुट होना चाहिए । सभी समुदाय का अपनी–अपनी जगह से मोर्चा में शामिल होने का समय आ गया है । क्योंकि मधेश में रहनेवाले मधेशी और पहाड़–हिमाल में रहनेवाले जनजातियों की पीड़ा समान है । समान रूप में शोषित–पीड़ित जातजाति, भाषाभाषी और समुदाय अपनी–अपनी जगहों से आन्दोलन नहीं उठाएंगे तो विभेदकारी राज्य संरचना में परिवर्तन आनेवाला नहीं है । जब तक राज्य संचरना में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक हमारे ऊपर लादा गए विभेद का अंत नहीं हो सकता है । आज जिस संविधान के नाम में एकल जातीय पहचानवादी लोग हमारे ऊपर शासन कर रहे हैं, उसके विरुद्ध अब हमलोगों को एक होना चाहिए । उसके लिए हिमाल से लेकर पहाड़ और मधेश के कोने–कोने में रहनेवाले उत्पीड़ित समुदाय को गोलबन्द करना होगा । यह काम उतना सहज नहीं है । जातीय, क्षेत्रीय, भाषिक, सांस्कृतिक, लैंगिक, वर्गीय, किसी भी आधार में क्यों न हो, विभेद में रहनेवाले लोग जब तक इकठ्ठा नहीं होंगे, तब तक अधिकार प्राप्ति की लड़ाई अंत होनेवाली नहीं है । ऐसे लोगों को राजपा नेपाल में गोलबन्द होने समय आ गया है । इसी अभियान में आज राजपा नेपाल आगे बढ़ रहा है । राजपा नेपाल और खुम्बुवान राष्ट्रीय मोर्चा के बीच सम्पन्न एकता प्रक्रिया इसी अभियान का एक पहलू है । क्रमश …

 

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