हमारे समाज में नारी का स्थान
पूनम झा

नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास र जत नग पग तल में ।
पीयूष-स्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर  समतल में ।
हिन्दी के महाकवि जयशंकर  का नारी के सम्बन्ध में उपर्युक्त कथन नार ी की महिमा का बखान कर  र हा है । नार ी वास् तव में निःसन्देह श्रद्धा है । वह मानव जीवन के समतल में बहनेवाली अमृतधार ा है । जिस प्रकार  तार  के बिना वीणा बेकार  होती है, उसी प्रकार  नार ी के बिना मनुष्य का सामाजिक जीवन भी अर्थहीन होता है । ऐसा लगता है, जैसे जीवन की इस सच्चाई को मनीषियों ने पहले ही जान लिया था । नार ी कितनी महिमामयी है, वह मनु के इस कथन से भी प्रमाणित हो जाता है ः-
‘यत्र नार्यस् तु पूज्यन्ते र मन्ते तत्र देवता’ अर्थात् जहाँ नार ी की पूजा होती है, वहां देवता का निवास होता है । नार ी की स् नेह भर ी वाणी, उदार  व्यवहार , करुणामय हृदय तथा दया भाव समाज तथा मानवता के लिए उस पर मपिता पर मेश्वर  का सर्वोपर ी वर दान है ।
मानव सभ्यता को आगे बढÞाने और  विकास के चर म उत्कर्षतक पहुँचाने में नार ी ने महत्त्वपर्ूण्ा भूमिका निभाई है । वैदिक युग से ही नार ी घर  तथा घर  के बाहर  सम्मान की अधिकारि णी र ही है । नार ी का बहु-आयामी व्यक्तित्व उसके महत्व का परि चालक है । वह माँ, बहन, पुत्री, पत्नी तथा शक्ति के रुप में अपनी विभिन्न भूमिकाएँ निभाती है । बच्चों के भविष्य निर्माण में तो उसकी भूमिका अकथनीय है । गृहिणी के रुप में नार ी अपने त्याग तथा सहनशील व्यवहार  से परि वारि क जीवन तथा दाम्पत्य जीवन दोनों को संतुलित बनाए र खती है । नार ी को मानव जीवन की जन्मदात्री भी कह सकते हैं । हमार ी संस् कृति विश्व-विख्यात है । इस संस् कृति को कायम र खने में नार ी का बहुत बडÞा योगदान आदि से लेकर  अन्त तक र हा है । ‘संस् कृति समन्वय’ की कडÞी के रुप में भी नार ी का योगदान अतुलनीय है । यानी नार ी का काम है, सिर्फजोडÞना, घटाने के लिए तो उसके पास कुछ है ही नहीं । नार ी एक ऐसी शक्ति है, जो प्रत्येक चीज में जान डालती र हती है । परि वार , समाज, र ाष्ट्र सभी में नार ी सदैव एक नई शक्ति का संचार  कर ती र हती है तथा नित्य नवीन शक्तियों का आविष्कार  कर ती र हती है । नार ी नर  की शक्ति है, वह माता, बहन, पत्नी और  पुत्री आदि रुपों में कर्तव्य की भावना जगाती है । वह ममतामयी है अतः पुष्प के समान कोमल है । किंतु जब वह चोट खाकर  अत्याचार  को भी सहन कर  लेती है तो वह बज्र से भी कठोर  हो जाती है । तब न वह माता र हती है, न प्रिया । केवल उस का एक ही रुप होता है और  वह रुप है, चण्डी का । वास् तव में नार ी सृष्टि का ही रुप है, जिस में सभी शक्तियाँ समाहित हैं ।
हमार ा समाज यानी सभ्यता और  संस् कृति का अमूल्य और  उत्कृष्ट संर क्षक । हमार े समाज में शिक्षा और  सम्पत्ति का प्रभुत्व हमेशा र हा है और  हमेशा र हेगा । त्रेता, द्वापर  युग से ही नारि यों की पूजा होती र ही है और  आज के युग में भी -लेडिज फर्स्र् ट) कहा जाता है । पर न्तु आज नार ी की जो दशा है, उसे देखकर  ऐसा लगता है, जैसे नार ी वास् तव में सिर्फऔर  सिर्फवासना पर्ूर्ति का साधन है । आज पुरुष के लिए प्रेम सिर्फवासना है, मनोभाव नहीं । यदि मनोभाव होता तो पत्नियों के लिए नयी और  पुर ानी की संज्ञा नहीं दी जाती । नार ी की विशेषता और  उसके वेवश मनोभावों का वास् तविक रुप आज हमार े समाज में देखने को मिलता है । हमार े समाज में शिक्षा और  सम्प्रभुता का प्रभुत्व और  सदैव र हा है और  र हेगा । अतः जब पुरुष वर्ग अपनी सफलता की पर ाकाष्ठा पर  पहुँच जाते है तो वे अपनी पत्नी को भी पहचानने से इन्कार  कर  देते हैं । आज की नार ी की जो स् िथति है, उसे देखकर  ऐसा लगता है, जैसे वास् तव में आजादी सिर्फपुरुष को ही मिली है । नार ी तो आज भी पर ाधीन है । समाज में नार ी का स् थान आज भी क्या और  कैसा होना चाहिए, यह र हस् यमय बना हुआ है ।
आदिकाल से लेकर  आज तक यानी सदियों से ही हमार े समाज में नार ी पूजनीय है, वन्दनीय है । वह ममता की प्रतिमर्ूर्ति मानी जाती है । नार ी तो दया का सागर  है, जिस में से दया रुपी जल जितना भी लें वो कम है । नार ी तो बचपन से लेकर  बुढापा तक कुछ न कुछ दान ही कर ती है, सेवा सत्कार  में ही लगी र हती है । शुरु-शुरु में माता-पिता, भाइ-बहनों की सेवा कर ती है । जब शादी हो जाती है तो सास, ससूर , पति और  बच्चों की सेवा कर ती है और  जब बुढÞापे में पहुँच जाती है तो आने वाली पीढÞी की संर क्षण में लग जाती है । यानी आदि से अन्त तक नार ी दान ही देती है । तार ा, कुन्ती सीता, सावित्री ये जितनी भी महान नारि याँ है, सब हमार े ही समाज की देन हैं । यदि हम महान नारि यों की बात कर ें तो वह भी हमार े समाज में प्राचीन काल से ही विद्यमान है । पर न्तु बहुत दुःख की बात है कि नार ी की अवस् था आज भी हमार े समाज में दयनीय और  निर ीह है ।
आज पुरुष और  महिला दोनों कदम से कदम मिलाकर  चल र हे हैं । दोनों जमीन से लेकर  आसमान तक साथ-साथ उडÞ र हे हैं, जिस का ज्वलन्त उदाहर ण इन्दिर ा गान्धी, कल्पना चावला, प्रतिभा पाटिल, अनुर ाधा कोइर ाला इत्यादि अनेक हैं । किसी भी क्षेत्र में दिमागी स् तर  की यदि हम बात कर ते हैं तो वहाँ भी महिला पुरुष से आगे है । अर्थात् नार ी का मानसिक विकास भी पुरुष से अधिक शक्तिशाली और  तीव्र है । पर न्तु इतना सब कुछ होने पर  भी नार ी की अवस् था अत्यन्त दयनीय और  पीडÞाजनक है । नार ी की आज की जो अवस् था है, उसे देखकर  ऐसा महसूस होता है कि क्या मैथिलीशर ण गुप्त यह जानते थे कि नार ी चाहे जितना भी त्याग और  ममता की प्रतिमर्ूर्ति बने, वह क्यों न चन्द्रमा पर  पहुँच जाए फिर  भी वह अबला ही र हेगी । उनका नार ी सम्बन्धी दृष्टिकोण कितना अग्रगामी था, इसका अन्दाजा लगाना बहुत कठिन है । इसीलिए तो गुप्तजी की नार ी सम्बन्धी यह उक्ति आज भी बहुत सच और  युक्ति संगत प्रतीत होता है और  ऐसा लगता है जैसे यह उक्ति भविष्य में भी युक्ति संगत ही र हेगी ।
अबला तेर ी हाय यही कहानी
आंचल में है दूध और  आँखों में पानी
ऐसा लगता है, जैसे गुप्तजी जनाते थे कि नार ी चाहे जितना भी त्याग कर  ले, जितना भी बलिदान कर  ले, पर न्तु उस के लिए अबला की संज्ञा ही सटिक और  सुन्दर  है ।
हमार े समाज में महिलाएँ शिक्षित होते हुए भी शोषित हैं । यहाँ तक की वक्त आने पर  कभी-कभी विवाह के अवसर  पर  लिए गए सात फेर ों का भी उसे सबूत देना पडÞता है । नार ी आज भी अपने आप को सच साबित कर ने के लिए दर  दर  भटकती है । इसके लिए जिम्मेवार  कौन है – हमार ा समाज या स् वयं नार ी – सात फेर े पति और  पत्नी दोनों ही साथ-साथ लेते हैं, पर न्तु पति महोदय बडÞी आसनी से सभी कस् मों और  वादों से मुकर  जाते हैं और  पत्नी विवश होकर  मूक भाव से सब सहन कर  लेती है ।
हमार ा सामाज जहाँ नार ी को पूजा जाता है, उसी समाज में नार ी को इतना घृणित बना दिया जाता है कि वह मुँह दिखाने के काबिल भी नहीं र ह जाती है । अतः नार ी-उत्पीडन हमार े समाज का सबसे प्रबल और  प्रमुख समस् या है ।
र ाष्ट्र निर्माण के प्रार म्भ से नार ी पुरुष का साथ देकर , उसके अभिशापों को झेलकर  उसकी यात्रा को सफल बनाकर  तथा र ाष्ट्रीय जीवन में नई शक्ति भर कर  नार ी ने जो कार्य किए हैं, वे कर्ीर्ति के परि चायक हैं । हमार े समाज की नार ी की महानता तो देखिए कि वह यमर ाज से भी अपने पति को बचा लाने में सफल हो गई । उस नार ी का नाम सदैव अखंड ज्योति की भाँति जगमगाता र हेगा । वह नार ी थी ‘सावित्री’ ।
हमार े समाज में नार ी की महानता इस तहर  चर म उत्कर्षपर  पहुँच चुकी है कि वह अपने स् वाभिमान को कायम र खने के लिए धर ती में समाने में भी कोई हिचक महसूस नहीं कर ती है । इसका साक्षत् और  अनुपम उदाहर ण त्रेता युग की नार ी सीता है । द्वापर  युग की नार ी गांधार ी को ही देखिए उसने तो जीवन भर  के लिए अपनी आँखों पर  पट्टी बाँध ली । अर्थात् हमार े समाज में नार ी अपना स् वाभीमान, अपना अस् ितत्व, समाज, परि वार  और  र ाष्ट्र को बचाने के लिए क्या कुछ नहीं कर ती है, पर न्तु बदले में उसे मिलता है अपमान, धोखा और  भी बहुत कुछ, जिसे बयान कर ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है ! कभी-कभी तो ऐसा देखा जाता है कि शादी के पवित्र मण्डप से भी लडÞकियों को उठना पडÞता है तथा गम और  आँसु के घूंट पीकर  उसे जीना पडÞता है । आखिर  ऐसा क्यों होता है – आजकल के शिक्षित युवक भी ऊँचे-ऊँचे पदों पर  काम कर ते हुए भी लडÞकियों को धोखा देते हैं तथा पैसे के लालच में अपने वादे से मुकर  जाते हैं तो मन क्षुब्ध हो जाता है ।
अतः अब समय आ गया है कि नार ी इसका डटकर  मुकाबला कर े और  अपने अस् ितत्व की र क्षा के लिए मार्ग दर्शन कर े । क्योंकि सहानुभूति से भर े मनुष्य जो एक-दूसर े के सुख, दुःख से प्रभावित होते हैं । किन्तु आजकल हमार े समाज में पुरुष वर्ग धन, शक्ति तथा सत्ता और  शिक्षा के अहंकार  में चूर  होकर  नार ी को इतना अपमानित और  घृणित बना देते हैं कि नार ी जीवन पर्यन्त दुःख के अन्धकार  में ही अपना जीवन समाप्त कर  देती है । पर न्तु अब समय आ गया है कि नार ी अबला न होकर  सबला का परि चय दे, जब नार ी के बिना विकास सम्भव ही नहीं है तो फिर  नार ी अबला कैसे हो सकती है – नार ी तो अपर ाजिता है, पर न्तु उसे अपनी इस शक्ति का परि चय देना होगा ।
नार ीको समाज के सामने आकर  अपने अनेक रुपों को सामने लाना होगा । आज पहले जैसी स् िथति नहीं है, आज परि स् िथति बदल चुकी है । आज के समाज में नार ी को अपना स् थान और  सम्मान पाने के लिए अपनी क्षमता और  साहस दोनों का परि चय देना ही होगा । अधिकार  पाना प्रत्येक मानव का जन्मसिद्ध अधिकार  है । अतः उससे वञ्चित र हना अपने स् वाभिमान को नष्ट कर ने के समान है । प्रत्येक नार ी को यह समझना होगा कि हक क्या है व हमार ा अस् ितत्व क्या और  हमें क्या कर ना चाहिए – इतनी सी बात यदि प्रत्येक नार ी में प्रवाहित हो जाय तो वह अबला नहीं, सदैव सबला बनी र हेगी । आज इस बात का पता लगाना बहुत कठिन हो गया है कि आखिर  हमार े समाज में नार ी का स् थान क्या है –

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: