हमें अधूरी नागरिकता नहीं चाहिए

Aasha chaturbedi

आशा चतुर्वेदी

७० वर्षों से नेपाली जनता जो सपना देखती आ रही थी कि संविधानसभा से जनता का संविधान जारी हो । उस प्रक्रिया में संविधानसभा प्रवेश कर चुका है । हमारी पार्टी (मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल (लोकतान्त्रिक) और हमारे पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष विजय कुमार गच्छेदार जी का अथक प्रयास, निरन्तर होता रहा, जिसके परिणामस्वरूप ४ पार्टी के बीच १६ बुँदे सम्झौता सम्भव हुआ है । हमारी पार्टी के लिए राष्ट्र और जनता हमेशा से केन्द्रविन्दु रही है । देश और जनता के प्रति हमारा कर्तव्य सर्वोपरि रहा है ।
आज हमारे पार्टी के प्रयास के फलस्वरूप प्रथम मसौदा जनता के समक्ष पहुँच पाया । ७५ जिला से जो सलाह, सुझाव, सन्तुष्टि, असंतुष्टि आक्रोस, विरोध  आया है, इसे मैं सकारात्मक रूप में लेती हूँ । अगर मसौदा जनता के बीच नहीं जाता तो कैसे पता चलता कि यह मसौदा अपूर्ण है, सभी जात, जाति, धर्म क्षेत्र, लिंग वर्ग समुदाय के अधिकार, हक को उनकी भावनाओं को समेटा नहीं गया है । जनता को यह संविधान हमारा है, इसकी अनूभूति नहीं हो पाई ।
जनता चाहती थी कि देश को संविधान मिले । परन्तु कहीं ना कहीं पेश किया गया मसौदा उनकी भावनाओं के अनुरूप नहीं है । इसलिए कहीं कहीं इसका विरोध भी किया गया है । मैं मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल (लोकतांत्रिक) पार्टी से सम्बद्ध हूँ बावजूद इसके पेश किए गए मसौदे में नागरिकता सम्बन्धी जो प्रावधान आए हैं, मैं इसका विरोध करती हूँ । कई मुद्दे हैं जो मधेशी महिलाओं के खास कर अंगीकृत नागरिकता प्राप्त महिलाओं के हक में नहीं हैं । मैंने सभा में भी इसपर ध्यानाकर्षण कराया है ।
१ नागरिकता का प्रावधान– में ‘आमा र बुबा’ की जगह में ‘आमा वा बुबा’ होना पड़ा । धारा १२ (१ख) हटाना पड़ा । धारा– १३ (३) अस्वीकार्य है । क्योंकि अगर औरत को जन्म देने का अधिकार है तो बच्चे को अपना नाम देने का भी अधिकार होना चाहिए । बच्चा माँ के नाम से भी समाज में जाना जा सकता है, यह प्रावधान होना चाहिए । किसी कारणवश अगर पिता बच्चे को अपना नाम ना दे तो क्या वह बच्चा लावारिश होगा या नाजायज होगा ? इसलिए नागरिकता में आमा वा बुवा शब्द रखना आवश्यक है ।
२ धारा १८२ का है, पदाधिकारी के नागरिकता सम्बन्धी विशेष व्यवस्था के सम्बन्ध में । मेरी सबसे बड़ी आपत्ति और असन्तुष्टि धारा १८२ में है । मैं इस देश के शीर्ष नेताओं से  और हिमाल, पहाड़, तराई के सम्पूर्ण जनता से अपील करना चाहती हूँ– वो आगे आएँ और मांग करे कि ऐसा विभेदपूर्ण और अन्यायपूर्ण धारा को परिमार्जन किया जाए ।
कहा जाता है कि लाठी मारकर पानी को अलग नहीं किया जा सकता– पर दुःख के साथ कहना पड़ रहा मसौदा के धारा २८१ की लाठी से मार कर चार पार्टी के शीर्ष नेताओं ने पानी को अलग करने का प्रयास किया है । आखिर क्यों ? बात मैं अंगीकृत नागरिकता के सम्बन्ध में कर रही हूँ । नेपाल–भारत का सम्बन्ध तो सदियों से ‘बेटी और रोटी’ का रहा है । हमारी बोल–चाल, भेषभूषा, रहन–सहन, धर्म–संस्कृति, शादी–ब्याह जैसे अटूट सम्बन्ध को क्यों (२८२ धारा रखकर) बलि चढ़ाया गया है ? कौन सा बदला ले रहे है– भारत से आई बेटियो से ?
भारत की बेटी, पत्नी, बहु, माँ, सास, दादी, बन सकती है, पर नेपाल मातृभूमि की पूर्ण नागरिक क्यों नहीं ? अधूरी नागरिकता क्यों ? आखिर इतना बड़ा  अन्याय क्यों ? नेताओं से अनुरोध है कि अगर भारतीय बेटियों को अपनाना है तो पूर्ण रूप से अपनाएँ क्योंकि …..
इसी मसौदा में ‘मौलिक हक र कर्तव्य’ के धारा २३ में (समानता के हक) में लिखा है– सबै नागरिक कानून को दृष्टिमा समान हुनेछन् । कसैलाई पनि कानूनको समान संरक्षण र लाभबाट बञ्चित गरिने छैन ।’
इसीलिए नेपाली नागरिक का अधिकार देते है तो पूर्ण रूप में अपनाएँ– हमें अधूरा नागरिक बन कर नहीं जीना । शीर्ष नेताओं  से अनुरोध है कि अगर भारत के बेटियों को पत्नी, बहू बना कर लाना है तो उन्हें पूर्ण नागरिकता का अधिकार देना होगा । नहीं तो धारा २८२ में एक और उपधारा जोड़ दीजिए कि कोई नेपाली नागरिक भारत की बेटियों से शादी–ब्याह नहीं कर सकता । कानून पूर्ण माना जाएगा । इस कानून के चलते कम से कम संविधान में उनकी राष्ट्रप्रेम और मातृभूमि प्रेम के ऊपर प्रश्न चिन्ह तो खड़ा नहीं होगा ।
आज मैं बहुत मर्माहत होकर अपनी भावना व्यक्त कर रही हूँ । मैं भी भारत की बेटी और नेपाली नागरिक की पत्नी, बहू माँ, दादी हूँ । मेरी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत भी  ‘विभेद के विरुद्ध’  शुरु हुई थी, जो मधेशियों के साथ वर्षों से विभेद होता आ रहा है । और मैं भी एक मधेशी महिला हूँ । यह मातृभूमि हमारी भी है, मधेशी जनता भी नेपाल के ही धरतीपुत्र हैं । फिर नागरिकता के सवाल पर उन्हें कमजोर करने की कोशिश क्यों की जा रही है ? हमें अंगीकृत बनाया गया और अब हमारे संतानों को भी अधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है । यह कहाँ तक न्यायोचित है ? नागरिकता सम्बन्धी धाराओं में पूर्ण व्याख्या की आवश्यकता है । धारा शब्दों का खेल है इसलिए इसकी स्पष्ट व्याख्या होनी चाहिए ताकि कल कोई असमंजस की स्थिति ना रह जाय । मैंने समर्पित भाव से देश की सेवा की है उस वक्त मैंने यह नहीं सोचा है कि मैं अंगीकृत नागरिक हूँ, तो मैं औरों से कम देश की सेवा में अपना योगदान दूँ । सवाल यह उठता है कि अगर हमारी सेवा पूर्ण है, देश के प्रति हमारी भूमिका वंशज के नागरिक से कम नहीं है तो नागरिकता पूर्ण क्यों नहीं ? हम किसी सर्वोच्च पद के अधिकारी क्यों नहीं हैं ? क्यों हमारी राष्ट्रीयता पर शक किया जाता है या हमें कम आँका जाता है ? क्यों हमारी संतान उच्च पदों की अधिकारी नहीं होगी, इन सवालों का  राज्य को जवाब देना ही होगा और नागरिकता के प्रावधान में सुधार करना ही होगा । विभेदपूर्ण नीतियों को अगर लागू किया जाता है तो स्पष्ट है कि मधेश की जनता इसे नहीं मानेगी । मैंने पूर्ण निष्ठा के साथ देश की सेवा की है, तो मैं मानती हूँ कि मुझे यह प्रश्न करने का भी अधिकार है और मैं यह प्रश्न राज्य से सम्पूर्ण अंगीकृत महिला नागरिक की ओर से कर रही हूँ । सरकार को इसे संशोधित करना ही होगा नहीं तो सीमापार से आज तक जो सुमधुर रिश्ता मधेश का रहा है उसमें तो खटास आना तय है । उक्त प्रावधान महिलाओं की नहीं उनकी संततियों की भी जड़ें कमजोर करने वाली है । इसे समय रहते सम्बोधन की आवश्यकता है । जय नेपाल ! जय मधेश !
(लेखिका मधेशी जनअधिकार फोरम (लोकतान्त्रिक) की केन्द्रीय उपाध्यक्ष हैं ।)

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