हर ओर निराशा कब तक –

रमेश झा:नेपाल जब से गणतान्त्रिक देश बना है, तब से हर ओर निराशा व्याप्त है । चाहे वह धर्म हो, कृषि हो, मानवीय संवेदना हो और सीमा सुरक्षा हो, इन सबसे व्याप्त निराशाओं से जनता त्राहिमाम कर रही है । क्या गणतान्त्रिक नेपाल नेपाली जनता को घोर निराशापर्ूण्ा दिशा-दशा प्रदान करते हुए आगे बढÞेगा – विचारणीय विषय है ।
२०६३ जेष्ठ ४ के दिन प्रतिनिधि सभा द्वारा की गई घोषणा अविचारित रूप में आई । जिसने हिन्दू अधिराज्य नेपाल को हठात, अविचारित, अविवेकपर्ूण्ा एवं विदेशियों के षड्यन्त्रकारी धर्मान्तरण प्रक्रिया को गतिशीलता देने के उद्देश्य के तहत धर्मनिरपेक्ष बना दिया । जिसका प्रतिकूल प्रतिफल बहुसंख्यक जनता भोग रही है और भोगती रहेगी । र्’धर्मनिरपेक्षता बारे चीन’ शर्ीष्ाक नामक लेख नेपाल के एक प्रमुख समाचार पत्र -२७ साउन २०६३ में प्रकाशित हुआ था । लेखक चीन स्थित प्रा.डा. माधवप्रसाद पोखरेल थे । लेख में ‘चाइना डेली’ द्वारा प्रकाशित धर्म सम्बन्धी श्वेतपत्र की चर्चा करते हुए चीन मे प्रवेश के समय विदेशी व्यक्ति द्वारा पालन किए जाने वाले कडÞे नियमों के बारे में विस्तृत उल्लेख किया गया था । चीन प्रवेश करने वाला इर्साई है तो उसके पास एक प्रति ‘बाइबल’ सामान्य माना जाता है, पर दो या दो से अधिक है तो उसे साथ नहीं ले जाने का नियम है । यही नियम अन्य धर्मावलम्बी के हक में भी लागू है । डा. पोखरेल का लेख पढÞने वालों में से कोई एक पाठक चीन के ‘हाउगुजी’ का हवाला देकर नेपाल में धर्मान्तरण अभियान को नहीं रोका जा सकता है, जैसी प्रतिक्रिया छपवाई । बेल्जियम का स्थायी पता दिखाकर काठमांडू से लिखा गया सुभाष शर्मा के उस पत्र में नेपाल में करीब एक हजार गिरजा घर र्-चर्च) आठ लाख ५० हजार ख्रिष्ट विश्वासी लोग और ३५० मिशन संस्था बाइबल काँलेज और तालिम केन्द्र हैं । ऐसा दावा किया गया था । पत्र लेखक ने धर्मनिरपेक्षता का उल्लेख नेपाल र्’इर्साई’ धर्म विस्तार के उद्देश्य से ही सन्देश देने की कोशिश किया था । धर्म निरपेक्षता के उल्लेख को धर्मान्तरण अभियान की इजाजत पत्र -लाइसेन्स) माना गया है । इसके लिए कहीं न कहीं दस्तूर चुकाया जाता होगा । इतना ही नहीं गणतन्त्र बनने के सात वर्षबाद आज की स्थिति में धर्मान्तरण अभियान तेजी से बढÞा है । गत वैशाख की शुरुआत में ओक्लोहोमा के ग्राम चर्च के पादरी नक्सले ने लिखा था कि सन् २००३ में नेपाल में २-३ लाख इर्साई थे, पर १० वर्षबाद अर्थात् २०६३ वि.सं. के बाद उक्त संख्या २० लाख पहुँच गई है । -धार्मिक स्वतन्त्रताको दुरुपयोग लेख गो.प. ०७१) नेपाल में धर्मान्तरण की स्थिति नेपालियों के लिए मर्मान्तक पीडÞादायी है । इस ओर समय रहते जिम्मेवार सभी को ध्यान देना चाहिए ।
शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला अधिकार, बाल अधिकार आदि क्षेत्र में समाज सेवा के नाम पर वषार्ंर्ेेे रह रहे कतिपय गैरसरकारी संस्थाएँ धर्मान्तरण अभियान चला रही है । यह बात स्वतन्त्र समाचार पत्रों के माध्यम से समय-समय पर र्सार्वजनिक किया गया है । जैसे कारोबार दैनिक ०६९ माघ में र्’धर्मप्रचारमा आइएनजीओ’ शर्ीष्ाक में विस्तृत समाचार छापा गया था ।
कभी नेपाल अन्न निर्यातक कृषि प्रधान देश था, कृषिप्रधान देश अभी भी है पर आज यह क्षेत्र उपेक्षित और अवहेलित है । फलतः समय-समय पर किसान लोग अपने द्वारा उत्पादित वस्तु को लागत मूल्य न मिलने के कारण चौराहे पर फंेकने को बाध्य हैं । कुछ दिन पहले कालीमाटी तरकारी बाजार के आगे सात गाडÞी टमाटर रास्ते पर फेंक कर सरकारी नीति का विरोध किया । इस समाचार को समाचार पत्रों में और दूर्रदर्शनों पर अग्रस्थान मिला । उत्पादित वस्तु को रास्ते पर फेंक कर विरोध प्रकट करने की प्रक्रिया यह पहली नहीं है । कुछ वर्षपहले किसानों ने उत्पादित दूध का उचित मूल्य न मिलने पर, दूध को रास्ते पर फेंक कर विरोध जताया था और सरकार का ध्यानाकर्षा किया था ।
हुम्ला, जुम्ला, मुस्ताङ में उत्पादित सेवों को कौडÞी के दाम पर व्यापारी के हाथों बेचने को बाध्य है तो वही सेव काठमांडू में आने पर ३००, ४०० रुपैया किलो बेच कर व्यापारी धनार्जन करते हैं । पर बाजार तथा उचित भण्डार के अभाव में किसानों के हाथ खाली ही रह जाते हैं । किसानों का श्रम और लागत दोनों व्यापारियों को मोटा कर रहा है, जो सरकारी नीति का दुष्परिणाम है । किसान दिनरात खून-पसीना एक करके साग सब्जी, फल , अन्न उत्पादन करते हंै पर लाभांश व्यापारी लेते हंै । एक तरफ किसान अपने श्रम का सम्मान नहीं ले पाता है तो दूसरी ओर उपभोक्ता वर्ग अधिक मूल्य चुकाने को बाध्य है । युवावर्ग विदेशों में पलायन कर रहे हैं । क्या होगा इस देश का – अतः सरकार को चाहिए कि कृषि क्षेत्र में अच्छी कृषि नीति लाकर कृषि को व्यवसायोन्मुख बनाए, किसानों में क्षमता का विकास करे, इस क्षेत्र में व्याप्त समस्या का उचित निदान करंे तथा किसानों के श्रम को सम्मान करे ।
पर्राई स्त्री को माता और दूसरे के धन को मिट्टी के समान समझने वाला समाज आजकल मानव तस्करी, नृशंस हत्या, बलात्कार, लूट, भ्रष्टाचार के चंगुल में फँसकर आपराधिक बनता जा रहा है । पैसा के लिए मानवीयता की बिक्री कर रहा है । राक्षसी प्रवृत्ति हावी हो रही है समाज पर । क्यों हमारा समाज अपराधीकरण की ओर बढÞ रहा है – यह सोचने की जरूरत है । समाज में ऐसी अनेक समस्याएँ हैं, बेरोजगार युवक रोजगारी के अभाव में कुलत की ओर बढÞ रहा है, रोजगार नहीं है, आमदनी नहीं है, आवश्यकता बढÞती जा रही है । ऐसी स्थिति में मानव जल्दी पैसा कमाने के लिए बुरे धन्धो में फँसता जा रहा है । अपराध मुक्त समाज कैसे होगा – यह बडÞी समस्या है ।
मानव तस्करी के सदर्न्भ में नेपाल-भारत दोनों देश को परस्पर सहयोग के आधार पर उच्चस्तरीय र्सतर्कता अपना कर हो रहे अमानवीय अपराध पर अंकुश लगाने से दोनों देशों में अमन चैन स्थापित हो सकता है । जो दोनों देशों के बदलते नेतृत्व और आसन्न भारतीय प्रम मोदी के भ्रमण के सर्न्दर्भ में सहज हो सकती है । नेपाल-भारत सीमा पर सुरक्षार्थ भारतीय एस.एस.पी द्वारा अवाञ्छित क्रियाकलाप पर भी नेपाल को कूटनैतिक स्तर पर बहस करना समय की मांग है । सीमा पार स्थित उक्त सेना द्वारा यदा-कदा महिलाओं के ऊपर अत्याचार, दमन, शोषण सम्बन्धी समाचार सञ्चार मध्यम केे द्वारा पढÞने सुनने को मिलता है । भारतीय एसएसपी सीमा क्षेत्र में किए जाने वाले अमानवीय व्यवहार से दोनों देशों के बीच सदियों से स्थापित बेटी रोटी का सौहादर््रपर्ूण्ा सम्बन्ध बिखण्डित हो रहा है, सामाजिक कटुता बढÞ रही है, जो भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है । सीमा क्षेत्र में बढÞ रही सामाजिक व्रि्रूपता को समय रहते हुए दोनों सरकारों के बीच कूटनैतिक उच्चस्तरीय वार्ता नहीं हर्ुइ तो हमारे बीच सामाजिक सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक, सौहादर््र सम्बन्ध दुष्प्रभावित हो सकता है । अतः भारतीय प्रधानमन्त्री के आसन्न सद्भावना भ्रमण के क्रम में होने जा रहे द्विपक्षीय वार्ता के क्रम में सीमा पर की जा रही दैनिकी समस्या की ओर अवश्य नेपाल सरकार की तरफ से प्रस्ताव प्रस्तुत करना चाहिए । मुझे विश्वास है कि यदि नेपाल की ओर से इस विषय पर प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया तो आज के सर्न्दर्भ में भारत सरकार समस्या का समाधान जरूर करेगी और करना भी चाहिए ।

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