हर तरफ है धुआ“-धुआ“

Randhir Chaudhary

रणधीर चौधरी

रणधीर चौधरी:नेपाली पत्रिका पढÞने से ज्यादा आजकल सामाजिक संजाल में अपने आपको व्यस्त रख्ाता हूँ, ट्वीटर पर  कुछ ज्यादा ही । १८ जनबरी के दिन, नेपाल के एक वरिष्ठ लेखक एवं विश्लेषक खगेन्द्र संग्रौला के एक ट्वीट पर नजर गयी- शान्तिपर्ूण्ा ढंगले अभिमत प्रकट गर्न खोज्दा पद्मरत्न तुलाधरलाई प्रहरी ले लछारपछार गर्न थाले । ए रात्तै- फासिबादले मुन्टो उठाउन खोज्दै हो त – बात है १६ जनबरी की, पद्मरत्न तुलाधर जो कि नेपाल के जनजाति आन्दोलन के महानायक हंै, उन्हीं के नेतृत्व में काठमांडू में चल रहे शान्तिपर्ूण्ा आमसभा में राज्यद्वारा किए गए दमन पर व्यंग्य था, खगेन्द्रजी का वह ट्वीट । अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता का हाल मधेश में इससे भी बदतर है । जिसकी पुष्टि होती है डा. सी.के. राउत की नाटकीय गिरफ्तारी की घटना से, सुबह गिरप\mतार करना और शाम को घर पर ले जा कर छोडÞ देना ।
पिछले संबिधानसभा में सामूहिक असफलता के बाद, दूसरी संबिधानसभा का निर्माण किया गया । जनबरी २२ को संबिधान देने का झूठा वादा भी दिया गया जनता को । परंतु यह झूठ नहीं कि हमारे नेतागण लोग संविधान बनाने की चेष्टा नहीं किये । दिन और रात बालुवाटार के कमरे में संविधान पर चर्चा की गई तो कभी किसी होटल के कमरे में । इसका मतलब यह नहीं कि संविधानसभा भवन मंे वे लोग बैठे ही नहीं । विवादित बिषय वस्तुओं पर जब गहन रूप से बातचीत करनी होती थी तो काठमांडू के सबसे शान्त माने जाने वाले स्थल गोकर्ण्र्ाारसोर्ट जाना पसन्द करते थे । नेपाली कांगे्रस, एमाले और एनेकपा माओवादी के उच्च ओहदे वाले नेतागण गोकर्ण्र्ााें बैठकर नेपाली जनता के भाग्य का निर्धारण और संविधान निर्माण का गोप्य और असफल प्रयास करते थे । कौन बताए इन मान्यवरों को कि, संघीयता सहित के संबिधान की आवश्यकता नेपाल के तामाङ को है, कर्ण्ााली वासियांे को है । संविधान के लिए लालायित तो थारु हैं, जिनको अपनी ही जमीन पर सुकुम्बासी का जीवन व्यतीत करना पडÞ रहा है । मधेेस की मिट्टी से पूछो जिसने संघीयता लाने के लिये अपने ५४ सपूतों का बलिदान दिया है । परंतु विवादित बिषय पर सहमति जुटाने के लिए बालुवाटार से लेकर गोकर्ण्र्ााक लुक्का छुप्पी का खेल तीन दल के शर्ीष्ास्थ नेता द्वारा खेला जाता रहा ।
संविधान निर्माण के नाम पर देश में बढÞ रही गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी को कैसे नजरअंदाज  कर सकती हं कांगे्रस, एमाले की सरकार – प्र.म सुशील कोईराला द्वारा पद तथा गोपनीयता का शपथ लेने के बाद उनका बिशेष जोडÞ देश को सुशासित करने पर था । बिडम्बना ! जनता को न तो निर्धारित समय पर संबिधान मिला, ना ही संघीयता मिली, बल्कि नेपाल को दुनिया के भ्रष्ट देशों की सूची में और ऊपर स्थान मिल गया । अन्तरिम संविधान के अनुसार नेपाल एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में पहचाना जाता है । परंतु हमारे प्रधानमंत्री जी को पता नहीं कि देश कब हिन्दू राष्ट्र से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में बदल गया । दक्षिण एसिया में अर्थ के मामले में हम केबल अफगानिस्तान से आगे हैं ।  संविधान निर्माण के नाम पर पिछले ७ बषोर्ं में लगभग ५० अरब राशि हम खर्च कर चुके हैं । दूसरी संविधान सभा में, सभामुख सुभाष नेमवाङ की अग्रता देखकर लगा था कि इस बार संविधान शायद बन जायगा । फिर सोचने पर पता चला अगर संबिधान बनाना नेम्वाङ के हाथ में है तो- ये अग्रता उनके द्वारा पिछली बार संबिधान निर्माण के समय क्यों नहीं दिखाई दी – पिछले समय तो देश की दो प्रगतिशील राजनीति शक्ति का बहुमत था । “प्रगतिशील” इसलिए कि, संविधान सभा की मांग माओवादी की थी तो ऐतिहासिक संघीयता की मांग मधेशी दलांे की । इस बार की जैसी अग्रता सभामुख ने अगर पिछली बार दिखाई होती तो शायद ५० अरब हमंे खर्च नहीं करना पडÞता । प्रतिपक्षी द्वारा सभामुख पर लगाया जा रहा आरोप कि, सभामुख को अपने अधिकार दायरे का दुरुपयोग नहीं करना चाहिये, आरोप नहीं बल्कि सच्चाई लगने लगी है । और इस सच्चाई को पुष्ट करता है- दो दलीय बैठक में सभामुख का भाग लेना । २२ जनवरी के दिन बालुवाटार मंे आयोजित कांगे्रस-एमाले की बैठक के दौरान सभामुख उस बैठक में उपस्थित थे । इस मुद्दे पर, संविधानविद् एवं सुप्रिम कोर्ट के वकील दीपेन्द्र झा का मानना है कि- “राजनीतिक ध्रुवीकरण के समय में, किसी विशेष दल के बैठक में सभामुख का जाना नाजायज है । सभामुख तो सभी दलों के साझा होते हंै । ‘न्यूट्रल’ रहना चाहिये उनको । संविधानसभा नियमाबली इस बात की पुष्टि करती है ।” जब माँ के नाम से बंशज नागरिकता देने की बात आती  है तो एमाले के कुछ खास राष्ट्रवादी नेता इस बात को संविधान मे दर्ज होने से रोकते हैं और इस मुद्दे पर नेपाली कांग्रेस मौन रूप में एमाले का साथ देती है । क्या इस लिङ्गभेदी भावना से देश आगे बढÞ सकता है – यहाँ जिसको देखो हर कोई एक दूसरे के अधिकार का हनन करने में लगे हुए हैं ।  जब सब अपनी-अपनी मर्यादा का खुद उल्लंघन करने में लगे हांे तो भला हर तरफ धुआं-धुआं क्यों न दिखाइ दे –
दार्श्र्ााक प्लेटो का मानना था कि “भाषण मानव के मस्तिष्क में शासन करने की अच्छी कला है ।” आधुनिक राजनीति में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस कला का बारीकी से प्रयोग किया है । उनके स्वस्थ भाषण का नतीजा है, आज भारत मोदीमय हो चुका है । हमारे देश नेपाल में भी आजकल भाषणबाजी का शौख हावी होता दिखाई दे रहा है । खड्गप्रसाद ओली, एमाले के अध्यक्ष तथा पिछले सत्ता समीकरण के हिसाब से नेपाल  के भावी प्रधानमंत्री, जिस हिसाब से मुहाबरे का प्रयोग कर भाषण देते हैं- डर लगता है कहीं उनके मुहाबरेबाजी का शिकार न हो जाय नेपाल की अखंडता । पिछले भाषण में मधेश को यूपी और बिहार से जुडÞने का भाषण दे रहे थे ओली जी । भाषण मोदी जैसा दे सके तो ओली जी के लिए बेहतर । क्यूँकि प्रधानमंत्री बनने के दौरान मोदी के किसी भ्ाी भाषण के बाद सम्भबतः भारत में उनका पुतला दहन नहीं हुआ है । यहाँ नेपाल में, कुछ नेता हंै जो किसी खास समुदाय को बिखंडनकारी कहकर तो किसी को बंदर की संज्ञा देकर  अपने आपको राष्ट्रबादी सिद्घ करने में लगे हैं ।
देश अभी “सहमति भरसेज प्रक्रिया” की लडर्Þाई में उलझा हुआ  है । संघीयता को थाती रख कर संबिधान घोषणा करने की धमकी जगजाहिर है । जब सरकार में रहे दल प्रक्रिया के लिए दवाब देते हैं तो विपक्षी आन्दोलित हो जाते हंै । यही कारण है कि मधेसी दल भी आन्दोलन करने का मन बना चुके हैं । लेकिन काठमांडू से नीचे उतरने का नाम नहीं ले रहे हैं । नेपाल के वरिष्ठ राजनितिक विश्लेषक सी.के लाल के अनुसार, मधेसी दल के नेतागण को इस वक्त वीरगंज में आन्दोलन करना चाहिये न की बानेश्वर में । न जाने क्यों मधेशी “बडेÞ” नेताआंे को काठमांडू से इतना गहरा प्यार है । शायद वे लोग सोचते होंगे कि सी.के राउत नामक इनसान है, जो मधेश को जगा रहा है । जयप्रकाश गुप्ता के नेतृत्व में गठित तर्राई मधेश राष्ट्रीय अभियान के युवा हैं जो मधेश को मधेशवाद पढÞा रहा है । पर काठमांडू प्रेमी नेताओं को मधेश मंे इसबार झटका लगने वाला है । राउत और गुप्ता ने जातिवाद की राजनीति को बहुत हद तक कम कर दिया है, खास करके मधेशी युवा में इसका असर बहुत दिखाई दे रहा है ।
जयनरायण पटेल का श्रद्धान्जलि सभा में सहभागी होना और संबेदना प्रकट करना अच्छी बात है । लेकिन जयनारायण पटेल को अपनी जान क्यों गंवाना पडÞी – क्या इस बात को हम ने संसद में उठाया है –  जनता को समस्या का हल चाहिए, न की घाव पे मरहम । बात पिछले जून महीने की है, बानेश्वर अल्फा हाउस में माननीय राजेन्द्र महतो जी भावुक होकर बोले थे- “समय आने पर हम सदन छोडÞ कर सडÞक पे उतरेंगे ।” मधेश अब तक प्रतीक्षा कर रहा है, कब आएगा महतोजी का वह समय – यह टिप्पणी किसी ब्यक्ति विशेष पर नहीं बल्कि देश के हरेक नेतागण के लिये है जो कि- जनता, जनता और सिर्फजनता के अधिकार सुनिश्चित करवाने के नाम पर अपना-अपना भविष्य बालुवाटार, शीतल निवास और सिंह दरवार मे चंद सालों के लिये महफूज करवाने मंे लगे हैं । पढÞने के बाद भले ही मेरे इस लेख मे सिर्फनाकारात्मकता दिखे । परंतु आम जनता का मानना यही है ।
अवस्था भले ही नाजुक हो । प्रगतिशील शक्तियों को एकजूट हो कर लडÞने की आबश्यकता है । इतिहास गवाह है कि तानाशाही की आयु लंबी नहीं होती । हम अगर नेपाल को ही देखें, राणा शासन और राजतन्त्र इन दोनो युग का अन्त नेपाली जनता ने ही कर दिखाया है । हमारे पडÞोसी राष्ट्र श्रीलंका को ही लें, जहाँ महेन्द्र राजापाक्षे द्वारा एक लाख तमिल बिद्रोहियों को मार कर जवरदस्ती वहाँ की  जनता को शान्ति की अनुभूति करवाई गई थी । कोई भी ब्यक्ति जब तक चाहे तब तक श्रीलंका का राष्ट्र प्रमुख हो सकता है, कानून में ऐसा संशोधन करवाया था  । किन्तु दो बार राष्ट्र प्रमुख हो चुके राजपाक्षे को इसबार जनता ने सियासत से बहुत दूर फेंक दिया है । हमारे यहाँ भी हालात कुछ ऐसे ही बन रहे हैं । काठमांडू के “मिडल क्लास एलिट” और संघीयता को जबरदस्ती स्वीकारने वाली कुछ राजनीतिक पार्टर्ीीँ संघीयता शब्द को आने वाले संबिधान में स्थान देने से हिचक रहे हैं । संघीयता नेपाल के लिये उपयुक्त नहीं है । देश को संघीयता मंे ले जाना देश को बाँटना है, ऐसी मानसिकता से लडÞना है अब नई शक्तियांे को । जिसके लिए राजनीति का अखाडÞा काठमांडू को न मान कर अपने अपने जिला तथा क्षेत्र को बनाना चाहिये । संघीयता तथा “नया नेपाल” के लडÞने बाले शक्तियांे के लिये मुझे एक शेर याद आ रहा है- जिन्दगी की असली उडÞान अभी बांकी है, जिन्दगी की कई इम्तिहान अभी बांकी है । अभी तो नापी है मुठ्ठी भर जमीन आपने, आगे अभी सारा आसमान बाकी है ।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz