हर साल एक ही पुकार एसएलसी में कैसे हो सुधार

लीलानाथ गौतम:हर साल एसएलसी परीक्षा के नतीजे के वक्त उससे सम्बन्धित विज्ञ तथा सरकारी अधिकारी परीक्षा परिणाम के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हैं । विद्यार्थी कैसे कम उत्तर्ीण्ा हुए हैं – कहते हुए कुछ हफ्ते तक बहस भी चलती है । बहस के क्रम में सभी सम्बन्धित अधिकारी दावा करते हैं कि आगामी साल से नतीजे में सुधार आ जाएगा । उसके बाद सभी विज्ञ के लिए यह बहस और चिन्ता एक साल के लिए समाप्त हो जाती है । जब दूसरे साल पुनः एसएलसी का नतीजा र्सार्वजनिक होता है, फिर वही चर्चे और वादे का इतिहास दुहराया जाता है । नतीजतन विद्यार्थी उत्तर्ीण्ाता के प्रतिशत में वृद्धि नहीं होती, उसके बदले उत्तर्ीण्ाता का प्रतिशत और कम हो जाता है । विगत कुछ सालों से ऐसा ही हो रहा है । पता नहीं है- कब तक यह क्रम जारी रहेगा ।slc nepal
एसएलसी परिणाम के अनुसार सब से चिन्ता की बात तो यह है कि सामुदायिक तथा सरकारी विद्यालय की पढर्Þाई का स्तर और ज्यादा कमजोर हो रहा है, फिर भी वहीं सब से ज्यादा विद्यार्थी अध्ययनरत हैं । दूसरी बात सामुदायिक विद्यालय में वे बच्चे अध्ययन करते हैं, जिनकी पारिवारिक आर्थिक पृष्ठभूमि कमजोर होती है । दुःख की बात तो यह है कि नेपाल के अधिकांश परिवार ऐसी ही पृष्ठभूमि के हैं, जो अपने बच्चे को निजी स्कूल में नहीं भेज सकते हैं । जिसके कारण जब एसएलसी परीक्षा का नतीजा र्सार्वजनिक होता है, ऐसे अभिभावकों की चिन्ता और बढÞ जाती है ।
अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के प्रति चिन्तित कुछ अभिभावक ने तो अपने बच्चे को निजी स्कूल में भेजना शुरु कर दिया है । इसी का परिणाम है कि दिन प्रति दिन निजी स्कूल में अध्ययन करने वाले बच्चो की संख्या बढÞ रही है । यह क्रम जारी है और इसके रुकने के आसार भी नजर नहीं आते । कुछ लोग अपना पेट काट कर भी अपने बच्चों को निजी विद्यालय में भेजते हंै, फिर भी कुछ ऐसे गरीब भी हैं, जो यह भी नहीं कर सकते हैं । वे लोग क्या करें – वर्तमान सरकार तथा सरकारी शैक्षिक निकाय के प्रति यह गम्भीर प्रश्न खडÞा हुआ है ।
निजी क्षेत्र के स्कूलों की तुलना में ज्यादा सुविधा लेकर सरकारी स्कूलों में अध्यापन करने वाले शिक्षक, ‘विद्यार्थी अनुत्तर्ीण्ा हो रहे हैं’, यह बखूबी जानते हंै । लेकिन अपनीे अध्यापन-शैली में कोई सुधार करना नहीं चाहते । अर्थात् सरकारी शिक्षक तथा विद्यालय व्यवस्थापन विद्यार्थी के प्रति उतने जिम्मेवार नहीं होते, जितना निजी क्षेत्र में देखा जाता है ।
निजी स्कूलों की नकल करते हुए बहुत से सरकारी विद्यालय अपने प्राथमिक तह में बोर्डिङ स्कूल से मिलते-जुलते पाठ्यक्रम अध्यापन कराते है, लेकिन इसने भी नतीजे में कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं डाला है । ऐसी अवस्था में सरकारी स्कूलों में अपने बच्चे को भेजने वाले अभिभावक का चिन्तित होना अस्वाभाविक नहीं है । यहाँ यह बात भी समझना चाहिए कि सामुदायिक विद्यालय में अपने बच्चों को पढÞाने वाले अभिभावक उनकी पढर्Þाई के प्रति उतने सचेत नहीं दिखते हैं । ऐसा कार्य व्यस्तता के कारण हो या अज्ञानता के कारण होता है, कहा नहीं जा सकता । दूसरी तरफ निजी स्कूलों की तुलना में सामुदायिक स्कूलों का व्यवस्थापन और शैक्षिक वातावरण भी सन्तोषजक नहीं रहता है । जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव विद्यार्थी शिक्षा और एसएलसी नतीजा में दिखाई दे रहा है ।
अगर सच में ही शैक्षिक स्तर में सुधार लाना चाहते हैं और परिणाम में सकारात्मक प्रभाव देखना चाहते हैं तो सामुदायिक विद्यालय और अभिभावक दोनों को अपने में सुधार लाना जरूरी है । विद्यालय व्यवस्थापन समिति में होने वाले राजनीतिकरण को पर्ूण्ा रूप में बन्द करके सभी शिक्षकों को विद्यार्थी के प्रति जिम्मेवार बनाना होगा । और शिक्षा प्रणाली को विद्यार्थी की क्षमता और समय के अनुसार सृजनशील बनाना होगा । नहीं तो जितनी भी चिन्ता व्यक्त करंे, सामुदायिक विद्यालयों के नतीजे में सुधार आने वाला नहीं है । दूसरी तरफ, बच्चो को बोर्डिङ स्कूल में भेजने से ही उनके शैक्षिक स्तर में सुधार आ जाएगा यह नहीं कहा जा सकता । पढÞने-लिखने का वातावरण अपने घर में भी होना चाहिए । अपने बालबच्चों को शिक्षा देने वाले विद्यालय के शिक्षक और उसके व्यवस्थापक कैसे हंै – विद्यार्थी के प्रति शिक्षक जिम्मेवार हैं या नहीं – इस बात पर भी अभिभावक सचेत रहें तो अवश्य ही सामुदायिक विद्यालयों के शैक्षिक गुणस्तर में वृद्धि हो सकती है । सभी सामुदायिक विद्यालय खराब और सभी निजी शैक्षिक संस्था अच्छे हैं, ऐसी सोच भी  गलत है ।  क्योंकि समग्र में कमजोर होते हुए भी कुछ सामुदायिक विद्यालय ऐसे हैं, जिनका नतीजा किसी निजी विद्यालय से कम नहीं है । और कुछ ऐसे भी बोर्डिङ स्कूल हैं, जो एक विद्यार्थी को भी एसएलसी उत्तर्ीण्ा नहीं करा पाए हैं । इसीलिए सामुदायिक विद्यालय में अध्ययन करने वाले विद्यार्थी को यदि घर में अध्ययन के लिए शैक्षिक वातावरण निर्माण किया जाए तो अवश्य ही बोर्डिङ के विद्यार्थी से वे प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं । इसके लिए, विद्यालय, शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी के बीच आपसी समझदारी का होना जरूरी है, जो सामुदायिक विद्यालय में नहीं हो पा रहा है ।
इसीलिए हम कह सकते हैं- सामुदायिक विद्यालय में अध्ययन करने वाले विद्यार्थी कमजोर होने के पीछे विद्यार्थी, शिक्षक और अभिभावक के सम्बन्ध में तालमेल नहीं होना है । सामुदायिक स्कूलों के अभिभावक प्रायः अपने बाल-बालिका की पढाइ के प्रति उतना ध्यान नहीं देते हैं, यह तो सच है । लेकिन शिक्षक अपने विद्यार्थियों की कमजोरी को लेकर अभिभावक को सचेत करने का कर्तव्य भी पालन नहीं करते हैं । लेकिन निजी स्कूलों में अभिभावकों को ऐसी जानकारी दी जाती है । घर में अपने बच्चे गृहकार्य करते हैं या नहीं -, और उनके कमजोर पक्ष क्या हैं, यह पहचान करके शिक्षकों के साथ पर्रमर्श करने की जिम्मेदारी अभिभावक निर्वाह करेंगे तो अवश्य ही सामुदायिक विद्यालय में अध्ययन करने वाले विद्यार्थी भी सफल हो सकते हैं । यहाँ पर समस्या तो यह है कि अपनेेे शैक्षिक स्तर कमजोर होने के कारण कुछ अभिभावक चाहते हुए भी ऐसा नहीं कर पाते हंै । विद्यालय तथा शिक्षक भी अभिभावकों की इस मजबूरी पर उतना ध्यान नहीं देते हंै । अगर अभिभावक की सक्रियता बढÞ जाए तो उसका प्रभाव शिक्षक, विद्यालय और विद्यार्थी में अवश्य ही पडÞ सकता है । इस बात को स्वीकार करते हैं, दरबार हाइस्कुल के शिक्षक विजयकुमार यादव । उनका मानना है कि ऐसी ही छोटी-मोटी बातों में सुधार किया जाए तो अवश्य ही सामुदायिक विद्यालयों के शैक्षिक स्तर में सुधार आ सकता है ।
समग्र में इतना ही कह सकते हैं- अगर अभिभावक सचेत हैं तो आर्थिक अवस्था कमजोर होते हुए भी बच्चों की पढर्Þाई और भविष्य के प्रति चिन्तित और निराश होने की जरूरत नहीं पडÞती । सब से पहली बात तो यह है कि हम अपने बच्चों में पढर्Þाई के प्रति रुचि पैदा करें और विद्यालय में जाकर शिक्षकों को भी सचेत करते रहें । अगर हम ऐसा कर सकते हैं तो अपने नजदीक में रहे सामुदायिक विद्यालयों के शैक्षिक स्तर में सुधार कर सकते हैं । यदि अभिभावक और शिक्षक अपनी-अपनी भूमिका इमानदारी से निर्वाह करें तो बच्चे सामुदायिक विद्यालयों में भी खुशी-खुशी जाना पसन्द करेंगे, ऐसी राय श्री प्राथमिक विद्यालय अभयनगर-५ सिरहा के शिक्षक नथुनी यादव की है । यादव आगे कहते है- इसके बाद अपने बच्चे को बोर्डिङ स्कूल में ही भेजना चाहिए, ऐसी मानसिकता धीरे-धीरे समाप्त होती जाएगी ।
हाँ, सामुदायिक विद्यालयों में विषय शिक्षकों की पर्याप्त संख्या नहीं होना, समयानुकूल शिक्षण प्रणाली में आधुनिकीकरण नहीं होना, पुराने शिक्षकों को समय अनुसार शैक्षिक तालीम की व्यवस्था नहीं होना, दक्ष और नयी पीढÞी को शैक्षिक क्षेत्र में आकषिर्त नहीं कर पाना, परम्परागत परीक्षा प्रणाली में सुधार नहीं आना, ऐसे बहुत सारे कारण हैं, जिसके चलते सामुदायिक विद्यालय कमजोर दिखाई पडÞते हैं । इसीलिए ऊपर उल्लेखित विषय में भी सुधार की आवश्यकता है । इसके लिए सरकार को सुधार की ओर गम्भीरता के साथ अग्रसर होना पडÞेगा  और छात्रों की अभिरुचि के अनुसार पाठ्यक्रम बनाना  होगा ।
अधिकांश सामुदायिक विद्यालय का नतीजा शून्य
इस साल एसएलसी में सहभागी विद्यालयों में से ३ सौ ३१ विद्यालय की उत्तर्ीण्ाता प्रतिशत शून्य है । ऐसे विद्यालय काठमांडू उपत्यका में ही ११ हैं । परीक्षा नियन्त्रण कार्यालय सानोठिमी के अनुसार इस साल सम्पर्ूण्ा देश में से ९ हजार १ सौ ८७  माध्यमिक विद्यालयों ने अपने विद्यार्थी को एसएलसी परीक्षा में सहभागी करवाया था । उन में से ६ हजार ४५ सामुदायिक और ३ हजार १ सौ ४२ संस्थागत -निजी) विद्यालय थे । सामुदायिक में से २ सौ ८१ विद्यालय का एसएलसी उत्तर्ीण्ा विद्यार्थी संख्या शून्य है । और निजी विद्यालयों का ऐसी संख्या ५० है ।
परीक्षा नियन्त्रण कार्यालय के अनुसार सब से ज्यादा अनुत्तर्ीण्ा विद्यालय पर्ूवाञ्चल में हैं । उस क्षेत्र से एसएलसी में सहभागी १ हजार ९ सौ १९ विद्यालय में से १ सौ ३६ का नतीजा शून्य है । इसी तरह सुदूरपश्चिम के ९ सौ २८ विद्यालयों में से ७६ स्कूलों ने एक छात्र को भी उत्तिर्ण्र्ााहीं कर सके । मध्यमाञ्चल के ३ हजार २ सौ ८५ में से मध्ये ५७ स्कूलों का नतीजा भी ऐसा ही रहा । मध्यपश्चिमाञ्चल में ऐसे विद्यालयों की संख्या ३७ है, जहाँ से १ हजार ९५ विद्यालय एसएलसी परीक्षा में सहभागी हुए थे । पश्चिमाञ्चल के १ हजार ९ सौ ६० विद्यालय में से २५ विद्यालयों का नतीजा शून्य है ।

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