हसरत उनकी :मनीषा गुप्ता

एक हसरत जो आज बड़े प्यार से उसने मुझ से कही । बहुत कुछ लिखती हो ! आज कुछ मुझ पे लिखो,लिखो मेरे प्यार के एहसास को तुम । आज कुछ मेरी बेचैन आँखो पे लिखो।
उसकि इस मनुहार को मै ठुकरा ना सकी और उठा के कलम और कुछ शब्द जो शायद कम थे उसके प्यार के सजदे मे । प्यार के उस बोल को तमन्ना कि डोर मे पिरो कर अपनी भावनाओ को अर्पित करने निकली 

‘’एक जहाँ जो तेरे आँखो कि मलकियत है’’hasrat

हर पल वो अपनी नजरों को
मेरी नजरों से बचाते रहे ।
कि उनकि आखो को पढ के
मुझे उनके प्यार कि गहराई का ।
एहसास ना हो जाए कही
आँखो पर अपनी चश्मे का आवरण।
वो हर पल चढा के रहे ………………………
आज जब सामने ह्म रुबरु से हुए ।
बरसो से प्यासी नजर वो अपनी
आज मेरी नजरो से छुपा ना सके ।

‘’आज नजरो ने उनकी प्यार को कुछ यूँ बयान किया ‘’
नजरों मे अपनी तुझे बरसों से बसाय बैठा था
इश्क मे तेरे खुद को कतरा-कतरा डुबाए बैठा था
न कोई तस्वीर ना दीदार तेरा था ………………………
एक आस की लौ को हाथो से बचाए बैठा था
दिल-ए वीराने मे तेरी यादो के गुलिस्ता खिलते थे
उसकी महक से खुद को आबाद किया करता था
कि जागता था तेरे एहसास को साथ लिए …………
और कारवाँ पर अपने निकलता था ………………………………।
आज जो सामने जो तु बैठी है मेरे …………………………………।
उसकि रहनुमाई पे यकीन नहीं होता .……………………………।
जी चाहता है हाथ को बढा तुझे छु कर …………………………।
तेरे एह्सास को यकिन मे बद्लूं…………………………………………।
डरता हुं कहीं खुबाब हुआ तो बिखर जाउँगा ……………………।
बहुत मुश्किल से जी रहा था तेरे बिना ……………………………।
अब वो हिम्मत कहाँ से लाउंगा………………………………………………।

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