ह“स मत पगली, प्यार हो जाएगा

मुकुन्द आचार्य:शीर्ष्ाक देख कर चौंकिए मत । यह मेरा कथन नहीं है, किसी दिलजले या मनचले ने ऐसा कहा होगा । मैं भला ऐसा क्यों कहूँगा । मैं तो चाहता हूँ, सब हंसे, सब राजीखुशी से रहें । मैं तो सागर खय्यामी से सौ फीसदी सहमत हूँ-
कुछ ऐसी चीज मिलाईये नफरत के तेल में
इन्सान मुहब्बत करने लगे होलसेल में !
खैर …..! आइए हँंसी पर जरा हँस लें । वैसे तो सब लोग एक दूसरे पर मन ही मन तो हँसते ही हैं । है कोई ऐसा, जो किसी पर न हँसता हो – आपने भी गौर फरमाया होगा । ‘यहाँ हँसना मना है !’ क्या ऐसा किसी साइनबोर्ड में कही लिखा हुआ दिखा है – फिर भी लोग हँसते नहीं । हँसते भी है तो लगता है, रो रहे हैं । कहाँ चली गई हँसी – किस की नजर लग गई हँसी को – क्यों सूख गए हँसी के झरने – इन सवालों के जवाब ढूंढÞते रहिए मगर जवाव न मिलेगा ।
वैसे तो कहा जाता है, तुम हँसोगे तो दुनियाँ तुम्हारे साथ हँसेगी और रोओगे तो तुम्हे अकेले ही रोना होगा । वैसे कहने वाले ने तो क्या खूब कही है, फिर भी हम हँसने से कतराते रहते हैं । शायद इसीलिए कोई दिल खोल कर नहीं हँसता, चवन्नी छाप मुस्कान से काम चला लेता है । कोई दिल खोल कर हँसता है तो हम उसे डाँटते हैं- क्या बेमतलव में ठिठिया रहा है ! या ठिठिया रही है ! बेचारा ठिठियाने वाला सहम जाता है । उसे लगता है, हमसे कोई बडÞी गलती तो नहीं हो गई – बेचारा चुप्पी साध लेता है । इस तरह हँसी की भ्रूणहत्या हो जाती है । जैसे आजकल बेटी को गर्भ में ही मौत के घाट उतार दिया जाता है, डाक्टर को यमराज और हमराज बना कर । खैर ….!
एक पगली थी, जिसे सारा शहर जानता था । दिन भर सडÞÞकों गलियों में भटकती रहती थी । नौजवानों द्वारा दिनरात घूरे जाने से वह समय से बहुत पहले ही जवान हो गई । फिर खुशमिजाज ऐसी कि जिसे देखती, उसकी ओर एक वजनदार मुस्कुराहट फेंक देती । बहुत सारे नौजवान बेमतलव में घायल हो जाते । नतीजतन उसे हर साल माँ बनना पडÞता था और किस बच्चे का बाप कौन है, यह उस बेचारी अभागन माँ को भी पता न चलता । शायद ऐसी ही हालत में किसी ने उसे सख्त मना किया होगा- हँस मत पगली, प्यार हो जाएगा ! क्या जमाना आ गया, हँसाना भी गुनाह हो गया । चलिए जरा पीछे लौटते हैं । एक ऐसा जमाना भी था, शायद आप भी भूले न होंगे, मधुवाला नाम की हिन्दी फिल्मी नायिका की हँसी पर लाखों लोग लगभग पागल रहते थे । ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है ।
मशहूर सिने-तरिका माधुरी दीक्षित के बारे में आज भी लोग कहते हैं- माधुरी की स्माइल मिलियन डाँलर की है । आप भी भूले न होंगे, एक मशहूर चित्रकार -जो अब अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं) ने माधुरी की स्माइल पर फिदा हो कर एक फिल्म भी बनाई थी- गजगामिनी । माधुरी दीक्षित की भोली सी सूरत थी, मगर उसकी मुस्कराहट जानलेवा थी । नसीब अच्छे थे, जो आप हम बच गए । मैंने सुना है वह पगली मर गई, जो हमेशा मुस्कराती रहती थी और हर साल आसानी से खेल-खेल में माँ बन जाती थी । बेचारी को हँसाना, मुस्कुराना, कितना मंहगा पडÞा । खुदा ऐसी जालिम मुस्कुराहट किसी को न दे ।
एक दूसरी पगली है, जो दिल खोल कर हँसती है । उसकी हँसी के फब्बारे जब छूटते हैं तो पूरा मोहल्ला हिल जाता है । लोग उसकी हँसी सुन कर दूर से ही जान जाते है कि वह अभी किस गली में है और हँसी के कौन से गोले दाग रही है । पूरा आलम खुशनुमा हो जाता है ।
हमने सुना है, हँसी के फब्बारे छोडÞने वाली पगली पहले बहुत ही गम्भीर प्रकृति की थी । उसे हँसते मुस्कुराते कभी किसी ने न देखा था । बेचारी जब हँसने लगी, तब समाज ने उसे पगली करार दे दिया । है न ताज्जुब की बात – हँसोगे तो लोग तुम्हे पागल कहेंगे और न हँसने पर मनहूस । लो, यह कैसी बला आन पडÞी ।
ओशो ने बडÞी दिलेरी दिखाई । अपने चेले-चपाटों को हँसना सिखाया । कृत्रिम हँसी-हँसकर असली स्वास्थ्य पाने का राज बता दिया । अब लोग बागों में जमा होकर हँसने का नाटक करते हैं । वे भले ही नकली हँसी के बदले असली सेहत पा लें, मगर उनकी नकली हँसी हास्यास्पद तो जरूर लगती है । यह नाटक देखने के लिए भी लोग बागों में जमा हो जाते हैं । मुफ्त का मजा भला कोई क्यों न लूटे –
जब हँसना एक ऐसा खतरनाक मुद्दा बनता जा रहा है तो हमारी सरकार को समय में ही र्सतर्क हो जाना चाहिए । हो सके तो नयाँ संविधान बनाते वक्त एक ऐसी धारा भी कहीं घुसेडÞ दे, जिसके द्वारा हँसी पर पूरी तरह पाबन्दी लगा दी जाय । न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी । हालांकि कुछ उद्दण्ड-उच्छृंखल लोग सरकारी पाबन्दी के बावजूद भी हँसने से बाज नहीं आएंगे । इसी तरह र्सार्वजनिक जगहों में खुलेआम हँसने वालों पर सख्त कानूनी कारवाही होनी चाहिए । भगवान ने मुँह दे दिया है तो आप जब चाहें हँसते रहेंगे । ना …यह धाँधली अब नहीं चलेगी ।

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