हाय रे सावन : बिम्मीशर्मा

बिम्मीशर्मा, काठमांडू,१८ जुलाई |

हाय रे सावन । यह तूने क्या कर डाला ? सभी तेरे आने की खबर पा कर बौराए हुए है । कोई हाथों में मेहंदी पीस कर मसल रहा है तो कोई हरी चुड़ियाँ पहनने से ज्यादा फोड़ रहा है ? बेचारे हमारे आराध्य देव शंकर जी को भी सावन के महीने में उन के भक्त चैन से रहने और सोने नही देते । शिवजी के भक्त द्धारा सावन महीने भर चढ़ाए हुए जल से उन के लंबे बाल भीगे ही रहते हैं । गीले बाल से वह सोएगें कैसे ?उनके दयालु भक्त शिवजी के बाल सुखने ही नहीं देते ।

और सावन महीने में बांकी ११ महीने पति से लड़ती, झगड़ती रहने वाली पत्नियों का मन अचानक पतियों के प्रति प्यार और श्रद्धा सावन मेघ की तरह उमड़ घुमड़ करने लगता है । बांकी महीने तो बेचारे पतियों के भाग में सूखा ही छाया रहता है । ज्यादातर पत्नियां पतियों के पैसे से ही मेहंदी, हरी चूड़ियां और बांकी श्रृगांर का सामान पहन, ओढ़ कर इठलाती रहती है । इसी लिए भी वह ज्यादा अपने पति के भक्ति भाव दिखाती है । नहीं तो क्या पता केले के पत्ते कि तरह फिसल कर पति महाशय किस के मोहजाल में फंस कर पत्नी और घर गृहस्थी को त्याग दें ।

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यह सावन महीना आफत का महीना है । बारिश इतनी ज्यादा होती है कि आकाश और आंख साथ मे झड़ी की बरसात कर के प्रतिस्पर्धा करने लगते है । रास्ते में कीचड़ और पानी इतना ज्यादा होता है कि हलवा और सूप जैसा दिखाई देता है । बेचारे माँस, मछली व्यवसायी के लिए यह सावन महीना दुश्मन है । सारे शिवभक्त और बाबाधाम जाने वाले इस महीने भर माँस, मछली को हाथ लगाना तो दूर कि बात इस के दुकान की तरफ झांकते भी नहीं । मक्खियां भी परेशान हो जाती होगीं ।

चूड़ी, मेहंदी, पोते और पूजा सामग्री बेचने वालो की चांदी है इस महीने में । माँस व्यापारियों के लिए जैसे दशहरा होता है वैसा ही होता है इन्हे सावन के महीने में । सुंदर सुंदर हाथों और कलाइयों को अपने हाथ में थाम कर मेहंदी और चूड़ी लगाने का सुख और स्पर्श वह मांस व्यापारी क्या जाने ? बेचारे शिवजी भी तरस जाते होंगे अपनी प्रिया पार्वती का सुंदर हाथ को थामने का सौभाग्य न पा कर । उनके भक्तभोले बाबाको इस रंगीन महीने में भी संन्यासी बना देते हैं ।

सावन महीना प्रेमी जन का महीना है । प्रेम में पागल हो कर अपने प्रिय की याद में तड़पने वाला सावन की झड़ी को अपने हृदय में थाम कर उसी से विरह की कविता लिख डालता है । कालिदास ने मेघदूत महाकाव्य इसी सावन के महीने और आकाश में छाए मेघ को देख कर लिख डाला था । तब से सावन का महीना कवियों का महीना बन गया ।

सावन महीने में मन भले तामसी हो जाए पर लोग शरीर से सात्विक हो जाते है । सावन के सोमवार को सभी को शिवालय और पशुपतिनाथ जाते देख यह जबरदस्ती सात्विक होने का ढोंग करने लगते है । तनपूजा में और मन भुजा (मुरई) में रख कर यह बेचारे जैसे तैसे सावन महीना काट देते हैं । पतियों के लिए सावन महीना सुनामी आने जैसा महीना है । पत्नियाँ ब्रत के नाम पर पतियों के जेब खाली कर देती है । जेब में हाथ डाल डाल कर इतना बड़ा छेद कर देती है कि उसमें सिर्फ चूहा ही घुस सकता है । सावन के सोमबार पति की आयु लंबी करने के बहाने से अपने शरीर की मोटाई और चौड़ाई बढ़ा देती है । फलफूल, दूध और शूद्ध घी मे तला हुआ सुखा मेवा खा कर पत्नी तो हथिनी हो जाती है और पति बेचारा गधा बन कर जीवन भर का बोझा ढोता रहता है । अब यह पतियों के लिए सुनामी आने जैसा ही है न ? साल भर उपर, नीचे का कमाई कर के जुगाड़ किया हुआ पैसा पत्नियां सावन और तीज के नाम अपनी भावनाओं की नही में बहा देती है । पति बेचारा तैर भी नहीं पाता ।

एक के खाने से जब दुसरे का पेट नहीं भर सकता तो एक के ब्रत लेने से दुसरे की आयु लंबी कैसे हो जाती है । और पति की उम्र कोई रबड़ है जो पत्निया सावन के महीने भर खींच, खींच कर लंबा कर देती हैं । पुरुष बेचारा कितना निरीह है और उस कि स्थिति कितनी दयनीय है । कोई कन्या उस के लिए सोमवारी का ब्रत न बसे तो बेचारे की शादी भी नहीं हो पाती । और पत्नियां उस के नाम से मागं में सिदूंर न भरे और गले मे मगंलसूत्र न पहने तो पतियों की उम्र जहां का  तहीं अटक जाए ट्रैफिक में फंसे गाड़ी की तरह । पति या पुरुष बेचारा तो सचमुच में दया का पात्र है जो संग्रहालय में सरक्षण किए गए किसी अनमोल विलुप्त वस्तु की तरह पत्नी की मांग, गले और कलाई मे संरक्षण पाता है । तब भी पत्नियां कहती हैं कि उन्हें समान अधिकार नहीं मिला, आरक्षण चाहिए आदि आदि ।

जो पति को मंगलसूत्र बना कर पहन लेती है उसके पास सोचिए तो कितनी ज्यादा शक्ति होगी ? इस सावन के महीनें मे तो पति को ही आरक्षण की जरुरत है । बेचारा कुछ क्षण मधुशाला में बैठ कर अपना गम भी भुला नहीं पाता है । सोमवारी ब्रत के धुन मे रमी हुई पत्नी पति के बालो को खिंच कर शिवजी का जटा बनाने मे भ िगुरेज नहीं करती । आखिर में शिव भक्त जो ठहरीं । पति के लिए शिव का ब्रत करती है और शिव के लिए पति को अर्पण कर के निहाल हो जाती है ।

यह सावन का महीना है ही ऐसा । यह महिना महिला मैत्री और पुरुष की दुश्मन है । पत्नियों का प्यारा और राजदूलारा और पतियों के जेब मे डाका डालने वाला । पत्नी सज, धज कर षोडषी हो जाती है और पति काम में जुता हुआ कोल्हू का बैल वा बोझा ढोता हुआ गधा बन कर बूढा हो जाता है । कवि काले, काले मेघ को देख कर कविता लिख, लिख कर पाठकों का आंख, दिमाग और मन खराब करता है । प्रेमी बारिश में टपके हुए छत को अपनी प्रेमिका के बालों से गिरे हुए पानी से तुलना कर ठिठुरते हुए रात काट देता है । एक अनार सौ बीमार जैसी हालत है सभी का इस सावन के महीने में । सावन के महीने में महिने में महिलाओं को छोड कर बांकी सभी को घाटो ही घाटो है । व्यग्ंय

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