हिंदी के नाम पर १०५ डिग्री का बुखार क्यों चढ़ जाता है ? बिम्मी शर्मा

बिम्मी शर्मा,काठमांडू ,४ अक्टूबर | भाषा का लफड़ा …..

हमें लड़ने में मजा आता है इसी लिए किसी न किसी बहाने से लड़ते ही रहते हैं । जब लड़ने के लिए कुछ नहीं मिलता तो हम भाषा पर ही झगड़ने लगते हैं । क्या करें आदत ही ऐसी है । कभी अपनों से, कभी दोस्तों से तो कभी पड़ोसी से लड़ कर हम अपना समय काट रहे हैं । जो बात गृह मंत्री ने कही ही नहीं उसे ब्रम्हाजी की तरह अपनी नाभी से उत्पन्न कर के हम आत्म सन्तुष्टि ले रहे हैं । हमारी मीडिया जो बोला गया है वह नहीं लिखती या दिखाती है । पर जो नहीं बोला गया उसे जोर शोर से लिख कर और दिखा कर सभी को अवसाद मे डालने का काम ही मीडिया नाम की भेड़िया करती है ।

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हम हिंदी सिनेमा, हिंदी टिभी सिरियल, हिंदी साहित्य देखते सुनते हैं और पढ़ते हैं इस मे किसी को कोई नहीं अखरता पर जब हिंदी को भी अन्य भाषा की तरह सम्मान या स्थान देने की बात उठी तो सभी उसी हिंदी से छी, छी दुरदुर करने लगे । गोया हिंदी कोई अछूत कन्या या सौतेली मां हो जैसे । हिंदी, नेपाली या चाहे और भी कोई भी भाषा हो सभी की जननी तो आखिर में संस्कृत भाषा ही है । जब सभी एक ही मां के संतान हैं तो फिर आपस में विवाद और झगड़ा क्यों ?

जब कि हिंदी और नेपाली भाषा की लिपि भी एक ही है देवनागरी । दोनों में एक ही तरह से वाक्य गठन होता है । तब सहोदर बहनों मे इतना भेदभाव क्यों ? जबकि भारत के संविधान में १४ राष्ट्र भाषा में नेपाली को भी रखा गया है । भारत में नेपाली की तरह नेपाल में हिंदी भाषा को भी मान्यता मिले तो इस में गलत क्या है ? जो हिंदी बोलने वाले है वह हिंदी बोलेगें और जो नेपाली भाषी हैं वह नेपाली बोलेंगें । सभी की भाषा और परपंरा का सम्मान होना चाहिए । भारत में तो किसी हिंदी भाषी ने इसका विरोध नहीं किया था । भारत के एक प्रांत के कुछ हिस्सों में नेपाली बोली जाती है ।

पर हिंदी तो मधेश की साझा संपर्क भाषा है । तो उस का विरोध क्यों ? मधेश में जब कोई मैथिली, भोजपूरी, मारवाड़ी, सिक्ख या मुसलमान एक दूसरे से मिलता है और वंहाँ की स्थानीय भाषा नहीं जानता तब आपस में यह लोग हिंदी में ही बातचीत करते हैं । पर राष्ट्रवाद के घाट का पानी पिए हुए कुछ लोगों को यह हजम नहीं हो रहा है । भाषा तो विचार व्यक्त करने का एक जरिया है मुख्य तो भाव ही है । भाषा को भी राजनीति के दलदल में फंसा कर कुछ लोग अपने स्वार्थ की रोटी सेंक रहे हैं । देश के अन्य समस्याओं पर तो इन का ध्यान जाता नहीं हैं पर वौद्धिक बहस और भाषा का बवाल खड़ा करने में देश के तथाकथित बुद्धीजीवियों का कोई जोड़ नहीं है । यह बने ही इसी के लिए हैं ।

जब भाषा का आविष्कार नहीं हुआ था तब लोग इशारों से, आंख से या मुँह से आवाज निकाल कर ही अपनी बात दूसरों के सामने रखते होगें । उस समय कोई इस के लिए लड़ता या झगड़ता नहीं था । पर अब लोग जब आधुनिक हो गए हैं कपडे और तकनीकी उपकरणों से । तब दिमाग और विचार से और भी ज्यादा पुरातन पंथी और लकीर का फकीर हो गए हैं । जाति, सम्प्रदाय और धर्म के लिए लड़ते लड़ते अब भाषा के लिए भी लड़ने लगे । नेपाली या गोर्खाली लडाकू जाति है यह इन के मीनमेख निकालने का स्वभाव और झगड़ा करने की आदत से पता चलता है ।

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हिंदी को भी नेपाल की अन्य भाषा की तरह मान्यता देने के सवाल पर आयोग गठन किया गया है । यह आयोग विचार, विमर्श कर के अपना निर्णय देगी ही । पर कुछ लोगों को अभी से हिंदी के लिए १०५ डिग्री का बुखार चढ़ा हुआ है । गृह मंत्री ने हिंदी को किसी और भाषा की बैशाखी कि जरुरत नहीं है बोला था उस दिन । उन्हाेंने कतई यह नहीं कहा था कि हिंदी को भी नेपाल का राष्ट्र भाषा माना जाए । जब भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी संयूक्त राष्ट्र संघ मे हिंदी मे ४५ मिनट तक धारा प्रवाह भाषण करते है तो उस को अखरता नहीं है । पर नेपाल में किसी नें सार्वजनिक कार्यक्रम में हिंदी बोल दिया तो समझिए सामने वाले को ४४० वोल्ट का करेंट लग गया । आखिर मे नेपाल भी तो संयूक्त राष्ट्र संघ का सदस्य है । तो अपनी सदस्यता नेपाल को खारिज कर देनी चाहिए ।

नेपाल में भानु जयंती या मोती राम जंयती जितने धूमधाम से मनाया नहीं जाता है उतना भारत के दार्जिलिगं मे मनाया जाता हैं । वहां इन नेपाली साहित्यकारों का बड़ा बड़ा शालिक निर्माण किया गया है । तब तो हमें बहुत फख्र महसूस होता है नेपाली भाषा और साहित्य की गरिमा बढ़ने पर । पर नेपाल में हिंदी भाषा को कोई नेता संसद में बोले या किसी हिंदी साहित्यकारों का जन्म दिन सार्वजिक कार्यक्रम में मनाया जाए तो हमें बहुत अखरने लगता है और हजम नहीं हो पाता है क्या करें ।

जब नेपाली भाषा का ही यहां के विद्धान उस का पैर काट कर लगंडा और अपाहिज बना रहे हैं तो स्वाभाविक है हिंदी ही क्या अगल, बगल की अन्य भाषा भी यहां और फलने फूलने लगेगी । जब हम खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाडी मार रहे है तो दूसरों को दोष देने से नुकसान अपना ही है । नेपाली तो प्रमुख भाषा के रुप मे तो राज करेगी ही । यदि सहायक या साझा या संपर्क भाषा के रुप में हिंदी या अन्य कोई भाषा को लिया जाता है तो इसमें हर्ज ही क्या है । गंगा प्रमुख नदी के रूप में मानी या पूजी जाती है । तो इस का मतलब उस के साथ बहने वाली अन्य सहायक नदियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है ? तीन कोस पर पानी का स्वाद और बानी (भाषा) बदल जाती है । नेपाली भाषा का मान और सम्मान तब और ज्यादा बढेगी जब इसकी सहोदरा हिंदी को भी नेपाल में वही मान मिले जो भारत के संविधान में नेपाली भाषा को मिला हुआ है । क्योंकि दूसरों की भाषा, परपंरा और संस्कृति को मान देने से ही अपना भी मान, सम्मान बढ़ता है ।

(व्यग्ंय)

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