हिंसा का खौफ क्यों ?

तो जरा सोचा जाय, राष्ट्रीय आत्म–निर्णय के अधिकार सहित बहुत से प्रांतीय अधिकारो को छोड़कर, मधेश को दो टुकड़े किए जाने के दुष्कर्म को भी बर्दास्त कर, केवल सीमांकन केंद्रित आंदोलन पर तो जो खस–गोर्खाली साम्राज्यवादी अपनी सारी शक्ति के साथ पेश हो रहे हैं, उन से क्या मिलेगा मधेश को ?

फिलहाल चल रहे मधेश आंदोलन में भी अब तक जितने लोग शहादत को प्राप्त हुए उन में से केवल दो लोग आंदोलनरत दल के सदस्य थे । साढ़े चार दर्जन शहीदों में बाँकी सभी के सभी सर्वसाधारण मधेशी जनता ही है । तो इससे भी कल स्थापित होने वाला मधेश स्वराज में भी तो जिनको राजसिंहासन मिलेगा वह भी तो इन्हीं शहीदों के खून से सना होगा
गोपाल ठाकुर :फिलहाल नेपाल में जारी तीसरा मधेश आंदोलन साढ़े चार महीने पूरा कर चुका । राष्ट्रीय आत्म–निर्णय के अधिकार सहित का समग्र मधेश एक प्रदेश की तो बात ही दूर, सामान्य स्वायत्तता के अधिकार सहित मधेश में दो प्रदेश की मांग को भी अब तक खस–गोर्खाली साम्राज्यवादी विखंडनकारी बता रहे हैं । दो प्रदेश में विभाजन कर भी मधेश प्रदेश के सीमांकन को ये उपनिवेशक अपना गर्दन कह रहे हैं जिसे काट कर देने को ये कतई तैयार नहीं दिखते । दूसरी ओर मधेशी मोर्चा और गठबंधन दो प्रदेश ही सही सीमांकन के बिना कोई समझौता करना नहीं चाहते ।
सभी को मालूम है जारी आंदोलन भी कई मायने में उद्देश्यविहीन संघर्ष और लक्ष्यविहीन प्रहार का पर्याय बन गया है । सिर्फ एक वीरगंज–रक्सौल नाका के अलावा सभी नाका निर्वाध रूप से खुला हुआ है । पेट्रोलियम के साथ साथ बहुत सी सामग्रियों की पैठारी जारी है । अघोषित नाके से तस्करी पैठारी भी जारी है । फिर भी इस आंदोलन से पहाड़ और मधेश दोनों में तबाही मची हुई है । इसके बावजूद ओली सरकार मंत्रालय फोड़ कर ही सही, मन्त्रियों की कुर्सी की गिनती आये दिन बढ़ाती चली जा रही है । ये वह सिर्फ इसलिए कर रही है कि मधेशियों को कुछ देना न पड़े । किंतु सिर्फ ओली सरकार ही नहीं, विपक्षी नेपाली कांग्रेस, जिसके पक्ष में मधेशी मोर्चा के शातिर नेताओं ने प्रधानमंत्री पद के लिए वोट भी डाला था, भी निगलते मधेश को उगलना नहीं चाह रही है ।
ऐसे में किस्ताबंदी में अधिकार लेने के लिए आंदोलन करते रहने का कोई तुक नहीं है । अतः अगर पहाडि़यों द्वारा हड़प ली गई मधेशी भूमि में से सूई की नोक बराबर भूमि भी हमारे प्रांत के लिए मिलना नामुमकिन है तो मधेश का टुकड़ा पाने के लिए गिड़गिड़ाने से क्या फायदा ? इतना ही नहीं जब मधेशी मोर्चा के नेता उपेंन्द्र और महंथ स्वयं मधेश को अलग राष्ट्र बताते हैं, दो मधेश के लिए जारी अपने आंदोलन की निरंतरता में इस गोर्खाली आततायियों की पुलिस के सांघातिक प्रहार से राजेंद्र जिंदगी और मौत की आँखमिचौली से जूझ रहे हैं, तो राष्ट्रीय आत्म–निर्णय के अधिकार के लिए आंदोलन क्यों नहीं ? समग्र मधेश एक प्रदेश के लिए आंदोलन क्यों नहीं ? मधेश के बीच की विविधता में एकता का सूत्र ढूँढने का प्रयास क्यों नहीं ? जाहिर है पराजित मानसिकता और अर्थहीन चातुर्य ही मधेश आंदोलन को इस तीसरे किश्त तक घसीट लाया । अब तो कम से कम हम होश संभाले ! इसलिए अभी जरूरत है मधेश और मधेशियों के ऊपर जारी औपनिवेशीकरण के खिलाफ सारी शक्तियाँ एकजूट हो सशक्त और एकीकृत आंदोलन का संचालन करें और वो भी समझौताहीन आंदोलन का । ऐसा आंदोलन जो राष्ट्रीय आत्म–निर्णय सहित का समग्र मधेश एक प्रदेश के लिए खस–गोर्खालियों को विवश कर सके । ऐसा आंदोलन जो सशक्त हो और जरूरत अनुसार सशस्त्र भी । किंतु एक ओर खस–गोर्खाली शासक आये दिन मधेश प्रदेश निर्माण को अपने अस्तित्व पर चुनौती मानकर इसे निस्तेज करने का हर तिकड़म पर उतारू है तो दूसरी ओर मधेशी मोर्चा का नेतृत्व आंदोलन लंबा चलने पर हिंसा का खौफ दिखाकर मधेशी जनता और सरकार दोनों ओर दहशत का माहौल बनाने का निरर्थक प्रयत्न कर रहे हैं । आये दिन मधेशी मोर्चा के किसी नेता की अंतरवार्ता संप्रेषित होती है जिसमें कहा जाता है कि अगर उनके शांतिपूर्ण आंदोलन में मधेशी जनता का साथ न रहा या खस–गोर्खाली शासक इनकी मांग पूरी करने में कोताही किये तो आंदोलन इनके हाथ से निकलकर किसी और के हाथ चला जाएगा जो हिंसा में विश्वास रखते हैं । यानी आंदोलन के हिंसात्मक होने से पहले ही इन्हें मधेशियों का मसीहा घोषित हो जाने का अवसर प्राप्त हो । तो कम से कम इन्हें मालूम होना चाहिए कि जिस महात्मा गाँधी की बुनियाद को अहिंसात्मक बताते हैं उस गाँधी ने भी अपने सत्याग्रह आंदोलन में आत्म–रक्षा के लिए सशस्त्र नहीं हो पाने की मानसिकता को कायर बताया था ।
जहाँ तक हिंसा की बात है, दुनिया का हर जीव अपनी रक्षा को सर्वोपरि मानता है । इसलिए जान पर पड़ी तो एक–दूसरे की जान लेने पर उतारू हो जाता है । फिर भी अहिंसा की दुहाई देते वे लोग नहीं थकते जिन्होंने असंख्य जीवों की जान लेकर ही अपने को सुरक्षित रखा है । इसलिए तो कहा गया हैः जीवः जीवम् भक्षति । अर्थात जीव जीव का ही भक्षण करता है । हम देखते भी हैं, बड़ी मछलियाँ छोटी को खा जाती हैं, अपने ही अंडे को सर्पिनी निगलती जाती है । इसलिए कहा जाता है कि अगर सर्प के सभी अंडे बँच जाये तो दुनियाँ में केवल सर्प ही दिखेंगे । इस तरह अपनी ही जाति को खाकर जीवित रहनेवाले अनेक जीव इस दुनियाँ में हैं । जहाँ तक मानव की बात है तो उसका भी प्रारंभिक जीवन कुछ ऐसा ही था । तभी तो आदिम मानवों में नरबलि प्रथा भी चली थी । बड़े बड़े राजा–महाराजा नरमेध यज्ञ भी करते थे । खैर नरमेध को छोड़ दिया जाए, अश्वमेध यज्ञ के दौरान भी सैकड़ों लोगों की बलि चढ़ती थी । हमारे पौराणिक आख्यानों में भी सिपाहियों की बलि पर ही साम्राज्य के टिके रहने या विजय पाने की बात अनेक जगहों पर बताई गई है । फिलहाल चल रहे मधेश आंदोलन में भी अब तक जितने लोग शहादत को प्राप्त हुए उन में से केवल दो लोग आंदोलनरत दल के सदस्य थे । साढ़े चार दर्जन शहीदों में बाँकी सभी के सभी सर्वसाधारण मधेशी जनता ही है । तो इससे भी कल स्थापित होने वाला मधेश स्वराज में भी तो जिनको राजसिंहासन मिलेगा वह भी तो इन्हीं शहीदों के खून से सना होगा । इनकी ही बलिबेदी पर हमारे मधेशी राजनेता सत्तारूढ होंगे । तो फिर सत्ता निर्माण कहें या तख्तापलट, हिंसा बिना तो कतई संभव नहीं दिखता ।
अभी पिछले माहांत की ओर सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष राजेंद्र महतो के सिर और पैर पर पुलिस ने अंधाधुँध लाठियाँ बर्साई । उनकी हड्डी–पसली एक करने की तमन्ना जरूर थी आतताई शक्ति के भठियारों की । उनके साथ और लोग पर भी ये लाठियाँ बरसी थीं । लेकिन नाम केवल राजेंद्रजी का लिया जा रहा है । इसे पुलिस का बर्बर दमन बतलाया जा रहा है । तो क्या जिन लोगों की छाती और ललाट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई, वह बर्बर दमन नहीं था ? क्या यह हिंसा नहीं है ? बिल्कुल हिंसा है । तो जरा सोचा जाय, राष्ट्रीय आत्म–निर्णय के अधिकार सहित बहुत से प्रांतीय अधिकारो को छोड़कर, मधेश को दो टुकड़े किए जाने के दुष्कर्म को भी बर्दास्त कर, केवल सीमांकन केंद्रित आंदोलन पर तो जो खस–गोर्खाली साम्राज्यवादी अपनी सारी शक्ति के साथ पेश हो रहे हैं, उन से क्या मिलेगा मधेश को ? साथ ही तीन बार जनता ने मधेश के लिए कुर्बानी देने को तत्पर हुई है, तो क्या अभी हम टुकड़ा में अधिकार विहीन मधेश लें ? फिर कल समग्र मधेश एक प्रदेश के लिए चौथा आंदोलन करें ? उसके बाद फिर राष्ट्रीय आत्म–निर्णय के अधिकार के लिए पाँचवी बार आंदोलन करें ? यानी हरेक एक मुद्दे के लिए बार बार आंदोलन करते रहें ? फिर उस समय तक हमारी मधेशी पहचान बरकरार रहेगी, इसकी भी क्या सुनिश्चितता है ?
निश्चित रूप से मधेश हमारा राष्ट्र है जिसे दो शताब्दी पहले खस–गोर्खाली और अंग्रेजों ने तो दो टुकड़े कर ही दिये, गोर्खा साम्राज्य में भी राष्ट्रीय पहचान के बदले प्रशासनिक संघीयता के नाम पर अभी खस–गोर्खाली छ टुकड़ों में बाँट चुके हैं । इसके खिलाफ हम आंदोलन में लगे हैं । फिर भी हमारे नेतागण अभी भी इस सच्चाई से मुँह मोड़े दिखते हैं । मधेश राष्ट्र को गैर–मधेशी प्रांतों में रखने का क्या मकसद हो सकता है ? तो क्या छ टुकड़ों में हमारी राष्ट्रीयता बिखरती दिखती है और दो टुकड़ों में नहीं बिखरेगी ? अगर राष्ट्रीय आत्म–निर्णय का अधिकार नहीं मिला तो क्या ये टुकड़ों में बँटे प्रांतों में हम गैर मधेशी आप्रवासन को रोक पायेंगे ? क्योंकि नागरिक अधिकार की अपव्याख्या करते हुए किसी भी राष्ट्रीयता के नागरिक को कहीं भी रहने बसने का अधिकार इस संविधान ने दे रखा है । इतना ही नहीं कोई भी प्रांत अगर सार्वभौमिकता और अखंडता के विरुद्ध कुछ करेगा तो वहाँ की सरकार और सदन दोनों की बर्खास्तगी खस–गोर्खालियों का क्षेत्रप प्रदेश प्रमुख निमेष के भीतर कर सकता है । तो कुल मिलाकर अगर बिना राष्ट्रीय आत्म–निर्णय के अधिकार के टुकड़ों में बँटा मधेश प्रदेश बना तो उसकी खैर नहीं रहेगी, इतना निश्चित है ।
कल तक तो मधेशी मोर्चा और गठबंधन नेपाल की अखण्डता को अक्षुण्ण रखने की बात कर रहे थे । अभी मधेश एक अलग राष्ट्र है, ये बात उनके नेताओं के मुँह से भी सुनने को मिल रही है । तो नेपाल की अखंडता के लिए मधेश की अखंडता आवश्यक नहीं है ? अगर है तो टुकड़ा मधेश के लिए आंदोलन क्यों ? जबकि वह भी मिलने के आसार नहीं है ।
इसलिए आत्म–निर्णय के अधिकार सहित समग्र मधेश एक प्रदेश से नीचे रहकर अगर कोई मधेश आंदोलन का सुत्रपात करता है तो या तो वह मधेश के बारे में खुद ही बेखबर है या गद्दार है । अगर इस बुनियाद को पकड़कर आंदोलन की बात करता है तो राज्य को इसके लिए विवश करना ही होगा । राज्य को विवश करने के लिए वैकल्पिक राज्य की अवधारणा से मुँह चुराकर भी बैठा नहीं जा सकता । फिर अगर वैकल्पिक राज्य की अवधारणा को लेकर आगे बढ़ना है तो याद रखें जिस जनता की सेना नहीं होती उसका राज्य कतई संभव नहीं है । यानी हिंसक राज्य को प्रतिहिंसा के जरिए ही समाप्त किया जा सकता है और यही सोच वैज्ञानिक है ।
तो अभी जो हिंसा का खौफ मधेशी मोर्चा के कुछ नेता दिखा रहे हैं वह किसको ? क्या खस–गोर्खाली साम्राज्य इनके इस खौफ से इन्हें कुछ रियायत देगा ? जी नहीं, अगर देना होता तो कब के हम मधेश प्रदेश ले लिये होते । तो फिर मधेशी जनता की ओर ही यह खौफ लक्षित दिखता है ? फिर तो यह वही बात हो गई जो मानसिक चेतना शुन्य अवस्था में रही माँ अपने बच्चे को रोते देख सिपाही का खौफ दिखाकर सोने को कहती है । मनोज्ञानिक दृष्टि से ऐसा करने से बच्चे दब्बू हो जाते हैं । तो क्या मधेशी मोर्चा के नेता मधेशी जनता को दब्बू बनाना चाहते हैं ? ऐसा तो नहीं होना चाहिए किंतु अगर चाहते भी हैं तो मधेशी जनता को अब यह मंजूर नहीं है । क्योंकि आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा छोड़ा गया अश्रुगैस सेल को अब तो आंदोलनकारी भी उठाकर पुलिस की ओर फेंकने लगे हैं । बंदी की अवज्ञा करनेवाले वाहनों में आग भी तो लगाई जा रही है । इतना ही नहीं मोर्चा के आह्वान में ही लाठी जुलुस निकाला जा रहा है । मधेश आंदोलन के दौरान रेकर्ड गीतों में से अगर सबसे अधिक चर्चित गीत कोई है तो वह है ‘लाठी–फाठा लेके हो जा तैयार’ । इसका अर्थ है मधेशी जनता अब हिंसा के खौफ से नहीं डरती ।
राज्य भी तो सभी को सुरक्षा नहीं देता । सुरक्षित होने के लिए ये खुद व खुद हथियार रखने का इजाजतपत्र भी देता है । इसलिए हम भूले नहीं, इस आततायी राज्य को हम लोककल्याणकारी राज्य में तबदील करना चाहते हैं जो वैकल्पिक राज्य की अवधारणा से परे रहकर संभव नहीं है । तो हिंसक राज्य की हिंसा से बँचने के लिए भी हमें सशस्त्र होना पड़ेगा । यह भी निश्चय है कि हम आत्म–रक्षा के लिए ही इसका प्रयोग करेंगे । अतः कम से कम मोर्चा के नेताओं से जनता इतना उम्मीद जरूर करती है कि वे राज्य को कहें कि मधेशियों को हिंसक बनने को विवश न करे ।
जब हम खुद बिना हिंसा जीवित नहीं रह सकते तो फिर निरर्थक रूप में अहिंसा की बात करते हुए हमें शर्म आनी चाहिए । इतना जरूर है हिंसा का प्रकार, इसकी मात्रा और इसके संभावित प्रतिरोध के बारे में हमें पहले से सचेत होकर ही आगे बढ़ना होगा । अगर नहीं मानते हैं तो हमारे उपनिवेशकों को ही देखें । जरूरत अनुसार उन सभी ने हिंसा का प्रयोग किया और अब हिंसक साम्राज्य के खूद मालिक बन बैठे हैं । इसलिए इनकी हिंसा भी अब जायज मानी जाएगी किंतु दूसरा अगर इन्ही के मार्ग पर चलता है तो उसके माथे ये हिंसक होने का अभियोग मढ़ते रहेंगे । बड़ा महाराजा पृथ्वीनारायण शाह से लेकर ज्ञानेंद्र तक के सभी राजा, जंगबहादुर से लेकर मोहन शमशेर तक के सभी राणा, इसके बाद जनता का प्रतिनिधि बतानेवाली नेपाली कांग्रेस, नेकपा –एमाले), एकीकृत नेकपा –माओवादी) में से राज्य को अपने हाथ लेने के लिए हिंसा किसने नहीं की ? फर्क सिर्फ इतना है कि इनके हिंसात्मक विद्रोह में जो शामिल थे उन्हीं पर अब ये हिंसा का प्रयोग कर रहे हैं । इसलिए हम उत्पीडि़त मधेशियों को कम से कम मधेशी नेताओं की ओर से ही किसी अनजान कोने से हिंसा का खौफ दिखाकर मधेशियों को फिर से नये तरीके से खस–गोर्खाली साम्राज्यवादियों के दास बनाने की जाने अनजाने में कोशिस न की जाए ।
कचोर्वा–१, बारा
दिसंबर २८, २०१५‘

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