हिंसा की त्रासदी से कैसे मिले छुटकारा ?: साध्वी प्रबुद्वयशा

आश्चर्य नहीं एक अकल्पित सच है कि बुद्ध और महावीर ने जिस धरती को करुणा और अहिंसा के स्नेहिल स्रोतों से अभिसिंचित किया, आज उसी तीर्थस्थली पर क्रूरता और हि.स मुक्त रूप से अठखेलियाँ कर रही हंै । राम और रहीम ने जिस देश के लोगों को प्रेम और मानवता का पाठ पढ़ाया, वहीं देश आज हिंसा की ज्वाला में झुलस रहा है । ऋषि–मुनियों की जिस तपस्थली पर शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते थे, आज उसी तपोभूमि पर मानव, मानव के भय से संत्रस्त है । गांव के गलियारों और मैदानों में खुले आसमान के नीचे अलमस्त सोने वाला आदमी आज बन्द मकान में भी निश्चित होकर नहीं सो पाता  । मनुष्य विकास के आधार पर जीता है और उसी के आधार पर विशेष काम करता है । आज पिता–पुत्र जैसे नजदीकी रिश्तो में भी विश्वास की आधारशिला डाँवाडोल हो रही है । सन्देह और आतंक के वातावरण में आदमी की साँसे घुट रही हैं । जहाँ मूँछ का एक बाल भी आदमी की ईमानदारी की साख भरता था, वहाँ आज मानव स्वयं भी अपनी ईमानदारी के बारे में संदिग्ध रहता है । देश में घटित एक भी दुर्घटना या दुराचार का संवाद जहाँ सिहरन पैदा कर देता था, वहाँ आज आए दिन समाचार–पत्रों के मुखपृष्ठों पर हिंसा, बलात्कार, अपहरण, लूटखसोट आदि की अमानुषिक वारदातें सुन–पढ़कर भी आदमी के मन में संवेदना पैदा नहीं होती ।
भारत की आजादी के साथ ही कवि की कल्पनाओं ने आकार लिया । इसकी एक पंक्ति थी–
“हम लाएं है तूफान से कश्ती निकाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के”
पर शायद यह देश का दुर्भाग्य ही है कि जिन अबोध बालकों से देश का भविष्य संवरेगा, उनका वर्तमान बालश्रम के बोझ तले दब रहा है । खेलने, कूदने, पढ़ने, लिखने की उम्र में ही छोटे–छोटे मासूम मजबूरन मजदूर बन रहे हैं । देश भर में बालश्रमिकों की दिन प्रतिदिन बढ़ती संख्या विकास का दावा करने वाली सामाजिक संस्थाओं पर एक प्रश्नचिन्ह है । समाज में ऐसे असमाजिक तत्व पैदा हो रहे हैं, जिनमें मानवीय सम्वेदना है ही नहीं । वे हिंसा के नये–नये चेहरे प्रस्तुत कर रहे हैं । जो नौनिहाल देश के भविष्य हैं, वे उनके द्वारा अपहरण के शिकार हो रहे हैं । बाल अपहरण और बालश्रम बालपीढ़ी के सुन्दर भविष्य पर दर्दनाक कुठाराघात हैं ।
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” की संस्कृति वाले राष्ट्र में आज नारी उत्पीड़न की बात गम्भीर बनी हुई है । महिला को मात्र वस्तु समझने वाली मानसिकता से मातृशक्ति अपमानित, प्रताडि़त और लांछित हो रही है । अत्याचार के सघन अंधेरे में तड़प रही न जाने कितनी कन्याएँ सामूहिक दुष्कर्म की शिकार हो रही हैं । अशिक्षित अबलाएँ ही नहीं शिक्षित स्वावलम्बी स्त्रियाँ भी सुनियोजित षड्यन्त्र में फंसी जा रही है । महिला बलात्कार की चीत्कारें समाज का करुण क्रन्दन है । अन्धविश्वासी, अभावग्रस्त और बेटी को बोझ मानने वाले समाज में प्रतिवर्ष हजारों कन्याएँ धरती पर आकर आँखे खोलने से पहले ही अन्तिम सांसे गिन रही है । जन्म से पहले ही परलोक गमन की दारुण कहानी– कन्या भ्रुण हत्या । इस जघन्य अपराध से समाज में लिंगानुपात का ग्राफ असंतुलित हो रहा है । इतना ही नहीं, दहेज–उत्पीड़न के कारण कितनी–कितनी निर्दोष महिलाएँ आत्महत्या के लिए विवश हो रही हैं । दहेज का दावानल समाज में जिस गति से फैल रहा है, उसे देख सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं । एक दर्दनाक दौर से गुजर रही है बेटियाँ । कहीं भ्रुणहत्या की त्रासदी है, कहीं दहेज हत्या और तलाक की समस्या है तो कहीं अश्मत की सुरक्षा का अभाव । ऐसा माना जा सकता है कि एक नहीं अनेक रूपों में नारी पर शोषण के शिंकजे कसते जा रहे हैं । तेजावी हमले, अपहरण, हत्या, बलात्कार, दहेज उत्पीड़न, घरेलूहिंसा, मानसिक प्रताड़ना आदि नारी की अस्मिता के लिए चुनौती बन गए हैं ।
इस कालखण्ड में एक ऐसी क्रान्ति की जरुरत है, जिससे शान्ति का साम्राज्य स्थापित हो । हिंसा की त्रासदी से छुटकारा मिले । आदमी सुख भरे संसार में सांस ले । शान्तिदूत आचार्य श्री महाश्रमण का इस दिशा में एक महान आध्यात्मिक उपक्रम है– अहिंसा यात्रा । आचार्य की महाश्रमण अहिंसा यात्रा के माध्यम से मानवता का उत्थान कर रहे हैं । वे पांव–पांव चलते हुए गांव–गांव जाकर जन–जन में सद्भाव, नैतिकता और नशामुक्ति की लौ प्रदीप्त कर रहे हैं । वे अनुकंपा की चेतना और मैत्री भावना की जागरण के लिए प्रयत्नशील है । धरातल छोड़ती हुई मानवता को ठोस आधार देने का प्रयास कर रहे हंै । आचार्यश्री का अभिमत है कि समाज का हिंसक चेहरा तभी बदलेगा, जब आदमी अपनी क्षमताओं का उपयोग विध्वंस में नहीं सृजन में, पतन में नहीं उत्थान में करेगा ।
बीसवीं सदी के महान क्रान्तिकारी राष्ट्रसंत आचार्य चुलसी का उद्घोष था– “सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से राष्ट्र स्वयं सुधरेगा ।’ अच्छे राष्ट्र–निर्माण के लिए जरुरी है– अच्छे व्यक्ति का निर्माण हो । आजकल यह भी देखा जाता है कि आदमी स्वस्थ रहने के लिए प्राणशक्ति को मजबूत करता है । वहीं योगाचार्यों के परामर्श से आसन–प्राणायाम का अभ्यास करता है । आयुर्वेदाचार्यों की राय से औषधि सेवन करता है । ज्योतिषी के कथनानुसार ग्रहदशा अच्छी बनाने का प्रयास करता है । मन्त्रविदों की प्रेरणा से जप आदि का प्रयोग करता है । स्वस्थ शरीर के लिए जैसे प्राणशक्ति की जरुरत है, वैसे ही स्वस्थ्य और अहिंसक समाज की संरचना के लिए त्राणशक्ति आवश्यक है । मानव–मानव में यह भावना जगे कि मैं प्राणियों का भक्षक नहीं, रक्षक बनुँ, संहर्ता नहीं, त्राता बनुँ । आदमी के भीतर एक–दूसरे की रक्षा करने की मनोवृत्ति बलवती बनें ।
भागवद् गीता का सन्देश है– ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषा न समाचरेत्’ अर्थात् जो अपने लिए प्रतिकूल है, वह व्यवहार दूसरों के साथ भी मत करो । महावीर वाणी का उपदेश है– “आयतुले पयासु” प्राणियों को आत्मतुल्य मानो । जो व्यवहार हम स्वयं के लिए चाहते हैं, वही व्यवहार दूसरों के साथ करे । स्वयं प्रोत्साहन चाहते हैं तो दूसरों को भी प्रोत्साहित करें । मानव के मन, वाणी और कर्म में मानवीय चेतना मुखर हो । किसी को गिराने वाला नहीं, गिरे हुए को उठाने वाला मानव है । किसी को घाव करने वाला नहीं घाव पर मलहम करने वाला मानव है । किसी को डुबोने वाला नहीं, डूबे हुए को बचाने वाला मानव है । आचार्य की महाश्रमवाणी स्वस्थ्य समाज की संरचना के दो सूत्र बताते हैं– आदमी के जीवन व्यवहार में अहिंसा की देवी और बाजार में नैतिकता की देवी प्रतिष्ठित हो । अहिंसा और नैतिकता रूपी देवियों की प्रतिष्ठापना से हम हिंसा की त्रासदी से मुक्त होकर अहिंसा, प्रेम और भाइचारे के उन्मुक्त आकाश में उड़ान भर सकते हैं । हम एक सुन्दर, स्वस्थ और स्नेहिल राष्ट्र में सांस ले सकते हैं ।

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