हिन्दी की जीवन–यात्रा, हिन्दी दिवस को समर्पित : विनोदकुमार विश्वकर्मा

विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’, काठमांडू ,२६ जनवरी |
साहित्य किसी भी सभ्यता या समाज का उद्भव, विकास, उत्थान, तत्कालीन जनमानस की चेतना एवं विचारधाराओं को यथार्थ के आसपास जानने एवं समझने का जीवन प्रमाणिक दस्तावेज होता है । इसलिए कहा गया है साहित्य समाज का दर्पण है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य को— जनता की संचित चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब माना है ।

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भाषा–साहित्य के आत्मा की आवाज है, अभिव्यक्ति का माध्यम है । डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार हिन्दी भाषा का जन्म सातवीं शताब्दी होना चाहिए । उनके अनुसार ‘पुष्प’ नामक कवि संवत् ७५० के आसपास हिन्दी भाषा में रचना कर रहे थे । हिन्दी साहित्य के इतिहास काल के विभाजन पर इस क्षेत्र के इतिहासवेत्ता —जॉर्ज ग्रियर्सन, मिश्र बंधु, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ. रामकुमार वर्मा, डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त आदि का मत एक नहीं रहा । सुविधाजनक एवं उपयोगी काल विभाजन निम्न प्रकार माना जा सक्ता है — १. आदिकाल, २. भक्तिकाल, ३. रीतिकाल और ४. आधुनिक काल (अ) भारतेन्दु युग (आ) द्विवेदी युग (इ) छायावाद युग (ई) छायावादोत्तर युग (उ) नई कविता युग (ऊ) साठोत्तर युग ।
उपरोक्त कालचक्र को सन्दर्भ बिन्दु मानकर हिन्दी की जीवन–यात्रा के साथ भारत की आंतरिक परिस्थितियों का अध्ययन भी किया जा सकता है । जब हिन्दी पैदा हो रही थी, तब ‘हिन्दू संस्कृति’ का पराभव होना शुरु हो चुका था । ये हर्षवर्धन के साम्राज्य के अंतिम दिन थे । यवनों के आक्रमण हो रहे थे । हिन्दू राजाआों में सामंजस्य नहीं था । आतः धीरे–धीरे अव्यवस्था, अराजकता, गृहकलह एवं विद्रोह के स्वर सुनायी पड़ने लगे । आठवीं शताब्दी से पंद्रहवीं शताब्दी तक यवनों, तुर्कों, अरबों एवं मुगलों के लगातार आक्रमण होते रहे । इस दौरान इस्लाम का उत्थान बहुत जोरों से हुआ । विश्व में अपना परचम फैलाने वाली बैदिक संस्कृति एवं उसकी ‘संस्कृत’ भाषा धीरे–धीरे वर्ण व्यवस्था के भेदभाव के कारण उपजे असंतोष को नहीं झेल पायी । बौद्ध, जैन, सिद्ध, नाथ आदि के बढ़ते प्रभाव के कारण जन मानस में प्रचलित ‘प्राकृत’ भाषा का उदय हुआ । जैसे–जैसे हिन्दू, समाज का पराभव होता गया । भाषा एवं संस्कृति भी बदलती गयी । धीरे–धीरे ‘अपभ्रंश’ ने जगह ले ली । यदि जगतगुरु शंकराचार्य ने बौद्धधर्म के प्रसार को नहीं रोका होता, तो वैदिक संस्कृति का बहुत बड़ी नुकसान हो गया होता । यही नहीं, जैन धर्म का प्रभाव भी इतना अधिक था कि आचार्य बल्लभ, चैतन्य, निम्बार्क आदि नहीं हुए होते, तो जो आज हमें विरासत में मिला है, वह भी नहीं मिलता । हताश–निराश जनमानस के पास दो ही विकल्प थे— वीर रस या आध्यात्मिक साहित्य से ताकत पाना । अतः परिस्थितियों में — ‘चारण’ और ‘भट्ट’ पैदा हुए । वे राजाओं का स्तुतिगान कर रहे थे और दूसरी तरफ – जैन, नाथ, सिद्ध आदि धार्मिक भावना का साहित्य प्राकृत और अपभ्रंश में रचकर धर्म प्रचार कर रहे थे ।
आचार्य शुक्ल के अनुसार इस काल में दो भाषाएं प्रचलित थीं — अपभ्रंश और देश भाषा (हिन्दी) । इस विपरीत परिस्थितियोंं में भी जनमानस की आवाज बनकर ‘हिन्दी’ धीरे–धीरे बढ़ रही थी । उस काल में देश भाषा में लिखी आठ पुस्तकें उपलब्ध हैं — खुमान रासो, बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो, जयमयंक, जयचंद्रिका, जयचन्द्र प्रकाश, परमाल रासो, खुसरों की पहेलियां और विद्यापति की पदावली । चार अन्य रासो और भी हैं । ऐसा नहीं कि उस समय के साहित्य में श्रृंगार भावना नहीं थी । प्रकृति का वर्णन एवं लौकिक साहित्य भी मिलता है । साहित्यिक शिल्प भी मिलता है । उस समय जो भाषा के रूप में प्रचलित थीं, उनमें अपभ्रंश, डिंगल, पिंगल, मैथिली, खड़ी बोली आदि हैं ।
जैसे–जैसे सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध जनजागृति पैदा होती थी— जनभाषा का प्रभाव बढ़ता गया । इससे आया ‘भक्तिकाल’ । यह हिन्दी साहित्य का स्वर्णिम काल माना जाता है । इस काल की दो धाराएं निकलीं — १. निर्गुण काव्यधारा (क) संत काव्यधारा (ख) सूफी काव्यधारा २. सगुन काव्यधारा (क) राम (ख) कृष्ण भक्ति काव्यधारा ।
जैसे–जैसे साहित्य एवं भाषाएं समृद्ध होने लगीं, लोगों का ईश्वर में विश्वास बढ़ने लगा । विद्वानों की जिज्ञासा भी बढ़ने लगी — ‘रहस्यवाद’ का समय आया । रहस्यवाद अंगे्रजी ‘मिस्ट्रिसिज्म’ का हिन्दी अनुवाद है । इसे हिन्दी में रहस्यवाद और छायावाद नाम दिया गया । रहस्यवाद में लेखक ने आत्मा, परमात्मा एवं जगत तीनों को जोड़ा है । छायावाद केवल ‘आत्मा’ और ‘जगत’ से संबंध रखता है और उसका दार्शनिक आधार है । जबकि रहस्यवाद पूर्ण रूप से अलौकिकता और आध्यात्मिकता से भरा हुआ है ।
‘साहित्य मनोदशा का मुक्त उदगार है ।’ जब नारी और कमजोर वर्ग का दमन होता है, तब जनकवि चुप नहीं बैठता — इससे उपजा प्रगतिवाद । साहित्यकारों का ध्यान ‘कम्युनिज्म’ की तरफ गया । इस विचार पर १९३५ ई. में पेरिस में ई.एम.फॉस्र्टर की अध्यक्षता में प्रगतिशिल लेखक संघ का अधिवेशन हुआ । इससे प्रेरणा लेकर सज्जाद जाहीर और डॉ. मुल्कराज आनंद ने ‘प्रगतिशिल लेखक मंच’ की स्थापना की । अब हिन्दी साहित्य दिन पर दिन विकास करता गया । नये–नये प्रयोग होने लगे और आ गया ‘प्रयोगवाद’, फिर ‘प्रतीकवाद’, ‘बिंबाद’ और ‘उत्तर आधुनिकतावाद’ हमारे सामने गुजरा । और अब समकालीन कविता ने सब कुछ बदल दिया ।
आज हिन्दी जो कुछ महत्व पा रही है – वह अपनी सर्जनात्मकता के कारण ही । इसमे तथ्य, भाव, ज्ञान लालित्य एवं संभावना को सर्जन या रचना के माध्यम से प्रकट करने की पूरी शक्ति है । हिन्दी आज बहुत आगे जा चुकी है । ग्यारह सौ वर्षों से यह सृजन में लगी है । सिद्धों, नाथों, चारणों, साहित्य साधकों, भक्तों, श्रृंगारिक कवियों, नवजागरण, सुधारवादी साहित्यकारों, छायावादी साहित्यकारों, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी, साठोत्तरी एवं समकालीन साहित्य और भाषा की सर्जन में यह लगी हुई है । आज इसमे विश्व की निधियां मिल रही हैं । आज के अंतराष्ट्रीय संबंधों, समझौतों और ज्ञान–विज्ञान के प्रचार माध्यमों से इसकी सर्जना को बड़ी सहायता मिल रही है । दिनोंदिन इसकी क्षमता बढ़ती जा रही है । कम्प्युटर और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में भी इसको सफलता मिल रही है । विज्ञान, गणित, चिकित्सा, तकनीकी आदि विधाओं को इसमें लिखा, पढ़ा और व्यक्त किया जा रहा है । संस्कृत, अरबी, फारसी, तुर्की और अंगे्रजी से लड़कर आज यह विकसित हो रही है । हिन्दी का जिस फल्क पर लगातार विस्तार हो रहा है, उसे देखकर विश्वास होता है कि अपनी समरस प्रकृति के कारण हिन्दी पूरे विश्व को एक दिन अपना आत्मीय बना लेगी ।

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