हिन्दी को विश्वभाषा बनाने के अभियान का प्रारंभ निकटतम पडोसी नेपाल से हो: उपराष्ट्रपति झा

Ramashis

रामाशीष

रामाशीष:राजा ज्ञानेन्द्र शाह को गद्दी से पर्ूण्ा उतारे जाने तथा बहुदलीय संसदीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की घोषणा के बाद निर्मित अन्तरिम संविधान के तहत नेपाल के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया गया था । विक्रम संवत २०६५ श्रावण ८ गते -२३ जुलाई २००८) को आयोजित उक्त समारोह में शामिल नेपाली गणमान्य नागरिकों, नेपाल में कार्यरत विभिन्न देशों के राजदूतों एवं राजनयिकों के साथ ही देश-विदेश के मीडियाकर्मियों के चेहरे पर एक नया उत्साह स्पष्ट रूप से दिख रहा था । सबों की कुतूहल भरी निगाहें नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डाँ. रामवरण यादव और सुप्रीम कोर्ट के पर्ूव न्यायाधीश परमानन्द झा पर टिकी हर्ुइ थी । मीडिया पंडाल में बैठे मीडियाकर्मी आपस में यह कयास लगा रहे थे कि चूंकि ”डाँ. यादव और जस्टिस झा,” दोनों ही मधेशी मूल के हैं तथा साथ ही ”हिन्दी-मैथिली” भाषी भी हैं । इसलिए वे मैथिली या हिन्दी में ही शपथ ग्रहण करेंगे । parmanand jha
मीडियाकर्मी इस बात की भी चर्चा कर रहे थे कि डाँ. यादव, कोइराला परिवार के अत्यन्त ही वफादार एवं नेपाली कांग्रेस में गिरिजा प्रसाद कोइराला के मुंहबोले नेता भी हैं । साथ ही वह नेपाली पोशाक ”लबेदा सुरबाल -पहाडÞी पोशाक)” में सजे हुए भी हैं, इसलिए वह कोई जोखिम उठाना नहीं चाहेंगे और नेपाली भाषा में ही शपथ ग्रहण करेंगे । जबकि, दूसरी ओर न्यायिक सेवा में रहते हुए हमेशा ”लबेदा सुरबाल” पहननेवाले न्यायाधीश झा, भारतीय सीमा से लगे नेपाल के तर्राई क्षेत्र की पवित्र पहिरन- धोती, कर्ुता और बंडी -जवाहर कोट) में सजे हुए थे । इसलिए, यह अनुमान लगाया जा रहा था कि ‘चूंकि वह मधेशी जनाधिकार फोरम पार्टर्ीीे संबद्ध हैं और ‘मैथिल ब्राहृमण’ भी हैं, इसलिए ”वह मैथिली” भाषा में ही शपथ ग्रहण करेंगे ।
शपथ ग्रहण का कार्यक्रम शुरू हुआ और सबसे पहले राष्ट्रपति पद के लिए डाँक्टर यादव को शपथ दिलाया गया, उन्होंने अनुमान के अनुसार ही नेपाली भाषा में शपथ ग्रहण किया । लेकिन, समारोह में तो सनसनी तब फैल गई जब, मधेशी पोशाक धोती कर्ुता पहने झा ने नेपाली भाषा का हिन्दी में अनुवाद करते हुए शपथ लेना शुरू किया । शपथ ग्रहण के बाद इसी सनसनी वातावरण में विभिन्न देशों के राजनयिकों तथा गणमान्य नागरिकों द्वारा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को बधाई देने का सिलसिला शुरू हुआ । चाय-जलपान चला जिसके दौरान काना-फूसी का विषय ही ‘हिन्दी में शपथ’ रहा । इन पंक्तियों के लेखक समारोह से बाहर निकले तो सद्भावना पार्टर्ीीे अध्यक्ष राजेन्द्र महतो गेट पर मिले । उनके साथ पार्टर्ीीदाधिकारी अनिल झा भी थे । राजेन्द्र महतो ने झट इसकी वाहवाही लूटते हुए कहा ”हां, अनिल जी ने मुझे बताया था कि ‘उन्होंने उपराष्ट्रपति जी से आग्रह किया था कि वह हिन्दी में ही शपथ लें’ । बहुत ही अच्छा हुआ । नेपाल के इतिहास में एक रर्ेकर्ड तो हो ही गया” ।
लेकिन, हाय-तौबा तो तब मच गयी जब राजधानी सहित देश भर के नेपाली और अंग्रेजी भाषा के अखबारों, नेपाली प्रसारण के एफ एम रेडियो स्टेशनों और टीवी चैनेलों के साथ नेपाली नेताओं ने इस मुद्दे को सिर पर उठा लिया । न्यायाधीश झा को, जो उपराष्ट्रपति बन चुके थे, जिन शब्दों में गाली-गलौज किया, उसे उन्हीं शब्दों में फिर से व्यक्त नहीं किया जा सकता । यही नहीं हिन्दी शपथ ग्रहण के कारण उन्हें छह महीने तक निलम्बित भी रहना पडÞा । इसके लिए अन्तरिम संविधान में संशोधन लाकर उन्हें हिन्दी या मैथिली में शपथ ग्रहण करने को कहा और उन्होंने वैसा किया भी । इस कारण उनके प्रति आदरभाव रखनेवाले लोगों की वक्र दृष्टि के भी शिकार हुए । इस संबंध में जब उपराष्ट्रपति झा से एक विशेष भेंट के दौरान पूछा गया कि आखिर आपने हिन्दी में ही क्यों शपथ ग्रहण किया और बाद में क्यों पलट गए तथा नेपाली एवं मैथिली में शपथ लिया – तो उनका कहना था जिस समय मैं शपथ ग्रहण कर रहा था उस समय नेपाल में बोली जानेवाली नेपाली, मैथिली हिन्दी सहित सभी भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त था । जनगणना रिपोर्ट में भी हिन्दी भाषियों की संख्या एक लाख से उपर बतायी गई थी । इसलिए मैंने हिन्दी में शपथ लिया । लेकिन, बाद में जब अदालत ने उसे खारिज कर दिया तो अन्तरिम संविधान में सातवीं बार संशोधन किया गया जिसके अनुसार मुझे नेपाली या मैथिली में ही शपथ लेने की बाध्यता हो गयी । और, मैंने दोनों ही भाषाओं में शपथ ली ।
लेकिन, उपराष्ट्रपति झा को लगभग छह-सात वषर्ाें के बाद जब मौका मिला तो उन्होंने हिन्दी के प्रति अपना संकल्प तथा नेपाली शासकों द्वारा पहुंचायी गई चोट की कसक को एक भरी सभा में साहस के साथ आखिर व्यक्त कर ही दिया । अवसर था भारत के विश्व हिन्दी दिवस समारोह का । स्थानीय अन्नपूर्ण्ाा होटल में १० जनवरी की जगह १४ जनवरी को यह समारोह मनाया गया था । प्रमुख अतिथि के रूप में उपराष्ट्रपति झा उस समारोह में उपस्थित हुए थे । भारतीय राजदूत रंजीत राय समारोह के सभापति थे । उक्त समारोह में उपराष्ट्रपति झा ने जिन शब्दों में हिन्दी की गरिमा का बखान किया और उसे जल्द से जल्द विश्व भाषा बनाने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किए जा रहे प्रयासों को सफल होने की कामना व्यक्त की, उसका सम्पादित अंश प्रस्तुत है । उपराष्ट्रपति झा ने तो इस भाषण में बिना किसी लाग लपेट के यहां तक कह डाला कि ”हिन्दी को विश्व भाषा बनाने का अभियान निकटतम पडÞोसी -नेपाल) से ही किया जाना चाहिए ।’
आज विश्व हिन्दी दिवस का कार्यक्रम है और इसलिए इस कार्यक्रम में हिन्दी भाषा का ही प्रयोग किया जाए तो आज के इस कार्यक्रम की गरिमा बढÞेगी । आज के इस कार्यक्रम के सभापति एवं भारतीय राजदूत श्री रंजीत रे जी,
कार्यर्क्र में उपस्थित भारतीय राजदूतावास के अधिकारीगण
तथा उपस्थित आदरणीय सज्जनों ।
हम सभी जानते हैं और ऐसा कहने में कोई अपराध नहीं होगा कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति वह महान पावन गंगासागर है, जिसमें हमारे नेपाल की पवित्र बागमती की धारा भी जा मिलती है । उसमें हमारा नेपाल भी शामिल है । इसकी संस्कृति और सभ्यता अत्यन्त ही प्राचीन है जिसका प्रमाण इस क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषाएँ हैं । चाहे हम संस्कृत को लें या हिन्दी को ।
जहाँ तक हिन्दी साहित्य की बात है तो यहर् इसा के १००० वर्षपहले से देखने में आता है । पहले यह अपभ्रंश के रूप में प्रयोग होता था और आगे चलकर वही अपभ्रंश, हिन्दी साहित्य के उत्पत्ति की पृष्ठ भूमि बनी । ऐसा माना जाता है कि १५वीं शदी, खासकर १४६र्०र् इ. के आसपास हिन्दी देश-भाषा के रूप में सामने आयी ऐसा कहना चाहिए । देशभाषा के रूप में दोहा, छन्द, गाथा का निकलना शुरू हुआ । उसी समय विद्यापति, चन्दर वरदाई, कबीर आदि साहित्यकारों एवं कवियों ने रचना शुरू किया । मुझे अभी चन्दर वरदाई की एक वह कविता याद है जिसने भारत में एक नये इतिहास की रचना कर दी-
”चार बांस चैबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण
एते पै सुल्तान है, मत चूको चैाहान”
”दरअसल में हुआ यह था, कि विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गोरी ने भारत के राजा पृथ्वीराज चौैहान पर हमला कर उनके राज्य पर कब्जा कर लिया और खुद बादशाह बन बैठा । इसके साथ ही मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान की दोनों आंखों में आग में तपी हर्ुइ लोहे की लाल छडÞों को घोंपकर, अन्धा बना दिया था । जिस कारण चौहान गोरी की जेल में युद्धबन्दी अन्धे का जीवन जी रहे थे । इसी बीच बादशाह गोरी तक यह खबर पहुंचायी गई कि पृथ्वीराज चैहान ”शब्द-भेदी” वाण चलाना जानते हैं, क्यों न उनकी कला को देखा जाए, बस क्या था, दरबार लगी जिसमें मुहम्मद गोरी तथा उनके दरबारी, कवि तथा उनके मंत्रीगण बैठ गए । परम्परा के अनुसार गोरी की दरबार में चन्द्र वरदाई नामक एक कवि भी उपस्थित थे । अन्धे बनाए गए राजा पृथ्वीराज चैहान को भरी दरबार में लाया गया । सभा में लोहे का एक तबा भी निशाना लगाने के लिए उंचे स्थान पर रखा गया । मंच की एक ओर बादशाह और दूसरी ओर तबा । तबे पर चोट दी गई और पृथ्वीराज चौहान को वाण चलाने को कहा गया । देशभक्त तथा चौहान के प्रति वादार कवि चन्दर वरदाई ने चौहान के निकट जाकर तख्त पर बैठे बादशाह का सही ठिकाना बताते हुए कहा- ”चार बांस, चैबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण, एते पै सुल्तान है, मत चूको चौहान ।’ अर्थात्, जहां तुम खडÞे हो वहां से ठीक चार बांस, चौबीस गज और आठ अंगुल की दूरी पर तुम्हें अन्धा बनानेवाला बादशाह बैठा है, इस अवसर को नहीं गंवाओ । इतना सुनते ही पृथ्वीराज चौहान ने बाण से निशाना साधकर, तबे की जगह मुहम्मद गोरी को मार गिराया था” -सर्ंदर्भ) ।
यह कविता लगभग १४६र्९र् इ. के ही आसपास की रचना है । वास्तव में १९वीं शताब्दी से आज तक हिन्दी का काफी विकास हो चुका है और आज की जो हिन्दी है, उसमें अधिक बंटबारा भी हो गया है । हिन्दी स्टाइल के इतने नाम हो चुके हैं कि कहना भी मुश्किल । आज मुर्ंबई सिनेमा की हिन्दी स्र्टाईल अलग है, दक्षिण भारत में हिन्दी बोलने का अलग स्र्टाईल है । दिल्ली में हिन्दी बोलने का अलग स्र्टाईल है । वास्तविकता तो यह है कि जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था, आन्दोलन चल रहा था, उस वक्त उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक, पूरे भारतवर्षमें हिन्दी भाषा का ही प्रयोग होता था । और, भारत स्वतंत्र होने के बाद इसका विकास तेजी से हुआ है । और, आज हिन्दी का पठन-पाठन विश्व के लगभग १४५ देशों में हो रहा है । अब हिन्दी का प्रयोग आइ. टी. क्षेत्र में भी होने लगा है । इस समय हिन्दी-भाषा, साहित्य, दर्शन और समाजशास्त्र की सीमा से बहुत आगे निकल चुकी है । इसका प्रयोग बैंकिंग सेवा, पर्यटन सेवा और विज्ञापन के फील्ड में बडÞे पैमाने पर हो रहा है । मैं विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में कामना करता हूँ कि यह जल्द से जल्द विश्व भाषा बने । संयुक्त राष्ट्रसंघ यू.एन.ओ में छह भाषाओं को मान्यता मिली हर्ुइ है जबकि अंग्रेजी, स्पेनिश और चाइनीज भाषा के बाद, विश्वभर में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में चौथे स्थान पर होने के बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में मान्यता नहीं मिली है । मुझे याद है कि भारत सरकार ने  संयुक्त राष्ट्रसंघ की सदन-कार्यवाही में हिन्दी भाषा को भी स्थान मिले और उसे रजिर्स्र्टड किया जाए, इसका प्रयास किया था । उसके बाद इस प्रयास में कितनी प्रगति हर्ुइ और कब तक हिन्दी यूनाईटेड नेशन में हिन्दी रजिर्स्र्टड होगी, इसकी जानकारी मुझे नहीं है ।
लेकिन, हां, भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, जो खुद हिन्दी बोलने में अधिक अभिरूचि रखते है,ं बहुत ही प्रसन्नता के साथ वह हिन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं, उनका प्रयास जरूर सफल होगा । मुझे इतनी जानकारी है कि उन्होंने अपने सभी भारतीय कूटनीतिज्ञों -डिप्लोमैट्स) को विदेशी कूटनीतिज्ञों के साथ हिन्दी भाषा में ही बातचीत करने का निर्देश दिया है । उनके इस प्रयास से आशा कर सकते हैं कि बहुत ही जल्द हिन्दी भाषा संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बनेगी । और, इसके साथ ही यह विश्व भाषा के रूप में अपना स्थान पा लेगी । वास्तव में किसी भी देश को जानने के लिए, किसी भी देश की संस्कृति और सभ्यता को पहचानने के लिए, भाषा की आवश्यकता होती है । और, भारत की शान उसकी राष्ट्र भाषा हिन्दी है । इसकी सभ्यता और संस्कृति को जानने समझने के लिए हिन्दी की आवश्यकता है ।
जहां तक मुझे मालूम है इस समय भारत की आबादी का ३५ प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी बोलते और समझते हैं फिर भी उनका इतना वर्चस्व है कि ३५ प्रतिशत अंग्रेजी बोलनेवाले भारतीय ही विदेश जा पाते हैं, विदेश घूम पाते हैं । इससे विश्व भर में ऐसा महसूस होता है कि भारत भी अंग्रेजी बोलनेवाला देश ही है । बाकी जो ६५ प्रतिशत लोग हंै वे अंग्रेजी के अभाव में गौण हो जाते हंै । लोग चाइनीज भाषा सीखते हंै, जापानी सीखते हैं, अंग्रेजी सीखते हैं, ठीक है भाषा सीखना बहुत अच्छी बात है । लेकिन, आज के जमाने में भाषा सीखने का अर्थ होता है- उससे कुछ अर्थाेपार्जन भी होना । मैं आग्रह करूंगा आपलोगों से, खासकर भारतीय राजदूतावास के जितने भी अधिकारीगण हैं, उनसे -कि भारत से नेपाल में जो पर्यटक आते हंै, उन्हें नेपाल दर्शन कराने के लिए, उन्हें गाईड करने के लिए, हिन्दीभाषी ”नेपाली गाईड” की नियुक्ति कीजिए । इससे नेपालियों को कुछ जीविका मिलेगी और वह हिन्दी भाषा सीखने में अभिरूचि लेंगे क्योंकि उन्हें हिन्दी भाषा जानने के कारण रोजगार मिलेगा ।
नेपाल में इस समय हिन्दी की स्थिति यह है कि तर्राई और मधेश क्षेत्र के जितनी भी जातियाँ हैं, वह हिन्दी बोलती हैं । भारतीय सीमा से लगे नेपाल-तर्राई क्षेत्र के निवासी यह जानकर हिन्दी नहीं बोलते कि हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है । नेपाल-भारत खुली सीमा के कारण तर्राई में ‘इस पार’ – ‘उस पार’ जो नेपाली और भारतीय रहते हैं । उन्होंने कभी नहीं सोचा कि ”भाई उधर ‘दसगजा’ के बाद हिन्दी बोलना” और ”इधर नेपाली बोलना” चाहिए । यह कभी भी उनलोगों के दिमाग में नहीं आया । वे तो सिर्फयह समझते हैं कि यह -हिन्दी) मेरी अपनी भाषा है । मैं खुद अपना उदाहरण दूं । मेरे दादाजी भी हिन्दी बोलते थे । मैंने हिन्दी कभी सीखा नहीं । मैं भी हिन्दी बोलता हूँ । मेरे पिताजी भी हिन्दी बोलते थे । मेरे बच्चे भी हिन्दी बोलते हैं । घर में पढÞानेवाला हिन्दी का कोई टीचर नहीं रखा । हमलोगों को स्वतः वंशानुगत रूप में यह गुण प्राप्त हुआ । इसलिए मैं हिन्दी का बहुत बडÞा अभारी हूँ । मैंन,े उपराष्ट्रपति बन जाने के बाद, हिन्दी में शपथ ग्रहण किया था । इस कारण मुझे छह महीने तक निलंबित रहना पडÞा ।
वास्तव में जब हिन्दी और नेपाली की बात आती है तो सबसे पहले यह जानें कि इनकी उत्पत्ति कहाँ से हर्ुइ । उसकी तह तक जाएंगे तो दोनों ही भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से ही हर्ुइ है । इसलिए हिन्दी और नेपाली एक दूसरे के बहुत ही निकट है । जो नेपाल में हिन्दी बोलते हैं, उस हिसाब से और भाषा की जननी के हिसाब से भी नेपाली भाषी और हिन्दी भाषियों के बीच, काफी निकटता है, हमलोग बहुत ही समीप हैंैं । भारत और नेपाल के बीच १८०० कि.मी. की खुली सीमा है तथा नेपाल की राजधानी काठमांडू या इससे भी उत्तर जाएंगे तो आपको बहुत से ऐसे परिवार एवं लोग मिलेंगे जिनकी शादी इंडिया में हर्ुइ । तो उन शादी विवाहों के कारण भी हिन्दी की आवश्यकता, अपनी बात कहने या रखने के माध्यम के रूप में इसका प्रयोग होते आ रहा है । जहाँ तक हिन्दी का प्रयोग नेपाल की राजनीति में किए जाने की बात है तो लगभग लगभग ५५-६० वर्षपहले, अर्थात् १९५र्८र् इ. के आसपास, पहाडÞी मूल के जितने भी राजनेता हुए, वे सभी तर्राई और मधेश में जाते थे, तो उनकी पार्टर्ीी्रचार-प्रसार का एजेंडा हिन्दी में ही हुआ करता था और वे र्सार्वजनिक जनसभाओं में भी हिन्दी में ही भाषण किया करते थे । वे लोग हिन्दी में ही लिखते थे, नेपाली भाषा का प्रयोग नहीं करते थे । वे लोग हिन्दी भाषा के पर्चा-पम्फलेट ही जनता में बांटा करते थे । यही नहीं, यहां के विद्यार्थी भी हिन्दी की ही पुस्तकें पढÞते थे और हिन्दी ही लिखा करते थे । यूनिर्वसिटी में भी हिन्दी की पढर्Þाई होती थी । क्योंकि, वह समय ऐसा था जब नेपाल में हिन्दी का वर्चस्व बहुत ज्यादा था ।
यह बहुत ही अच्छी बात है कि यहां नेपाली भाषा का विकास हुआ है, नेपाल के तर्राई क्षेत्र में भी नेपाली भाषा का प्रचार-प्रसार हुआ है, तर्राईवासी भी नेपाली बोलना सीखे हैं । नेपाली का बहुत ही सशक्त ढंग से गांव-गांव तक प्रचार-प्रसार हो गया है । अब गांवों के मधेशी मूल के लोग भी नेपाली समझते हैं । लेकिन, इसके बावजूद हिन्दी का वर्चस्व और हिन्दी का बोलना-समझना कम नहीं हुआ है । अभी भी तर्राई में जब दो भाई साथ बैठते हंै तो वे अपनी घरेलू बोली के अलावा हिन्दी का भी प्रयोग किया करते हैं । अभी आपके -भारत) जितने भी इंडियन टीवी चैनेल हैं, वह तर्राई से लेकर दर्ुगम बर्फीले और पहाडÞी गांवों तक में आसानी से देखे जाते हैं । आप उन क्षेत्रों में घूमने जाइए तो आप वहाँ जी टीवी, आजतक आदि आदि सभी प्रमुख हिन्दी चैनेल के कार्यक्रम आपको देखने को मिलेंगे । उन माध्यमों से भी नेपाल में हिन्दी का प्रचार काफी बढÞा है ।
मैं आग्रह करूँगा आप अधिकारियों से कि अब इसका तेजी से प्रचार-प्रसार करने की आवश्यकता है । अब सोचने का समय आ गया है । अब, जबकि, आप हिन्दी को विश्वभर के देशों में स्थापित करने जा रहे हैं, तो सबसे पहले निकटतम पडÞोसी देश -नेपाल­) में हिन्दी को स्थापित कीजिए । भाषा तो सिर्फविचार और भावना व्यक्त करने का माध्यम है । विभिन्न माध्यमों से इसका प्रचार-प्रसार हो । शुरूआत में इसका एक स्टेबलिसमेन्ट हो । भारत तथा विभिन्न देशों में जो भारत के राजदूतावास हैं, उनके अधिकारीगण इस पर ध्यान देंगे ।
मुझे लगता है कि हिन्दी अब बहुत ही जल्द विश्व भाषा के रूप में अपना स्थान ग्रहण करेगी । भारत के प्रधानमंत्री खुद हिन्दी बोलने में प्रसन्नता महसूस करते हैं । अभी हाल ही में उन्होंने अमेरिका में जगह-जगह पर हिन्दी में अपना विचार व्यक्त किया । संयुक्त राष्ट्र महासभा को भी उन्होंने हिन्दी में संबोधितकर, अपने हिन्दी संकल्प की पुष्टि की । वह जपान में भी हिन्दी में बोले । आस्ट्रेलिया में भी हिन्दी में बोले । फिर, उन्हें नेपाल में तो हिन्दी में भाषण देना ही था और उन्होंने नेपाल के संविधान सभा को हिन्दी में सम्बोधितकर, संविधान सदस्यों की तालियों से सदन को गुंजायमान करा दिया । यही नहीं उन्होंने नेपाल भ्रमण के अपने सभी कार्यक्रमों को हिन्दी में ही संबोधित कर, नेपाली जनता का मन मोह लिया ।
एक समय था महात्मा गांधी और पं. नेहरू का, जब भारत को इन्ट्रोड्यूस करने के लिए, भारत का परिचय कराने के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया गया था । जबकि, आज वह समय है जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्व भर के देशों को भारत का देने के लिए, भारत की पहचान के लिए, अपने ही देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी को माध्यम बनाया है । यह बहुत ही खुशी की बात है । इसमें भारत को शीघ्र सफलता मिले, इस कार्य को आगे बढÞाने में भारत के राजदूतों को भी अवसर प्राप्त हो, यह शुभकामना देते हुए मैं अपनी वाणी को यहीं विराम देता हूँ । धन्यवाद ।

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