हिन्दी गौरव:सच्चिदानन्द चौवे

हिन्दी भाषा में छिपी, मलयागिरि की बास।
महक उसी को ही मिले, रहे जो इसके पास।। १
अनहद की यह बाँसुरी, गूँजे स्वर भ+mकार।
संवेदन-संवेदना का, यह सुन्दर संसार।। २
जन-जन की भाषा यही, अभिव्यक्ति का श्रोत।
स्पन्दन यह हृदय का, ज्योति परम उद्योत।। ३
विश्वपटल पर, बह रही, पावन सलिलाधार।
राजनीति, संगीत में बजते वीणा तार।। ४
हिन्दी कविता, गीत, लय दुनियाँ में बेजोडÞ।
अन्य कोई भाषा नहीं, करे जो इसका तोडÞ।। ५
चिन्तक, गायक कला का हिन्दी है, आवास।
नहीं इतना लालित्य कहीं, भाषा मधुर सुभाष।। ६
ज्ञान और विज्ञान का भरा पडÞा भण्डार।र्
दर्शन, ज्योतिष, कला का, अनुपम यह संसार।। ७
हैं विभिन्न रंग के यहाँ, पुष्प विधा के रूप।
उपवन यह महके सदा, वन्दनीय सुरभूप।। ८
अवधी, थारु, मैथिली, भोजपुरी सब अंग।
हिन्दी से मिलकर चलें, नहीं छोडÞते संग।।-९
गंूथ सके एक माला में शtmि है हिन्दी माँहि।
हिन्दी की समकक्ष कहँू- भाषा देखि नाँहि।।- १०
अतः देश के नायको मन में करो विचार।
हिन्दी बिन्ाु-नेपाली का सूना है श्रृंगार।।- ११
निर्धारण अब कीजिये- हिन्दी का स्थान।
जन-जन की यह चाहना, यही है शुद्ध निदान।।- १२
सब भाषाओं सुमन की, गँूथ के सुन्दर माल।
धारण करके बनेगा, नव निर्मित नेपाल।।- १३
इन दोहों में भरा है हिन्दी का सब सार।
भाषा सरल-सुग्ाम्य है माने सब संसार।।- १४
सरस, मधुर, लालित्यमय, शुद्ध, किया संजाल।
हिन्दी भाषा से बने, सुखी सबल नेपाल।।- १५
हिन्दी का साहित्य पढÞ उपजय मन आनन्द।
वर्ण्र्ााहिन्दी का किया, कवि सच्चिदानन्द।।- १६
-लेखक अवधी सांस्कृतिक विकास परिषद्, बांके के अध्यक्ष हैं)

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