हिन्दी नेपाल की आत्मा :रामाशीष

एक कहावत है -‘जादू वह, जो सिर चढकर बोले’। इसी प्रकार भाषा वह, जो बिना पढे बोले। और, ‘भाषा’ को यह जन्मजात स्थान प्राप्त है, शिशुओं के जन्मदाता माँ में, जो उसकेे सूक्ष्म तरंग संकेतों को भी सहज ही समझ जाती है और उसकी समस्या का झट समाधान कर देती है। इसी प्रकार वह नन्हीं सी जान भी जन्म के कुछ ही दिनों के अन्दर मां की हंसी-खुशियों की सूक्ष्म तरंगों को पहचानकर मुस्कुराहट बिखेर देती है। और, अपनी मीठी किलकारियों से मां को गद्-गद् कर देती है। इसी दौरान बच्चे के मुंह से जो पहला अक्षर या शब्द निकलता है, वही आगे चलकर उसकी मातृभाषा बन जाती है।
इस नजरिए से ‘नेपाल’ में देखें तो यहां हिन्दी को ‘मां-शिशु बीच की सूक्ष्म-तरंग- भाषा” से भी काफी उपर का स्थान अपने आप मिल चुका है। क्योंकि, नेपाल में हिन्दी के पठन-पाठन पर पिछले साठ वषर्ाें से पाबन्दी लगी हर्ुइ है, इसके बावजूद, आज स्कूल का मुंह तक नहीं देखे हुए यहां के बच्चे भी हिन्दी के दो-चार शब्द और दो चार वाक्य बोल लेते हैं। और, उनसे थोडे बडे अर्थात पांच से दस वर्षके उम्र के बच्चों की बात करें तो वह अपनी तोतली बोली में हिन्दी फिल्मों के गीत तथा भजनों की दो चार पंक्तियां भी गुनगुना लेते हैं। यही नहीं इस उम्र के बच्चे तो हिन्दी की ‘कार्टूनी-कहानियां’ भी बखूबी पढÞ लेते हैं और टीवी पर आनेवाली हिन्दी के कार्टून-फिल्मों का मजा भी खूब लेते हैं। कुछ ही वर्षपहले हिन्दी में निर्मित ”बाल गणेश” नामक कार्टून फिल्म का नेपाली बच्चों ने भी खूब मजा लिया और अभी भी जब कभी टीवी पर बाल-गणेश फिल्म दिख जाती है तो ये बच्चे उसे जरूर देखते हैं।
यहीं देखिए, हिन्दी के मामले में तो ‘जन्मदाता मां और शिशु’ का आमना-सामना भी नहीं है, फिर भी यहां के बच्चों की जुवान पर हिन्दी बैठती चली जा रही है जिसे उसने अपने मां-बाप या पास-पडÞोस से कभी सुना ही नहीं। राजधानी काठमांडू या अन्य पहाडÞी शहरों के बच्चों को तो हिन्दीभाषी पडÞोसियों का भी संगत नहीं मिला जिनके सर्म्पर्क से वह हिन्दी के दो-चार शब्द सीख पाए होते, फिर भी राजधानी सहित हिमालय पार के मुस्तांग जिले जैसे दर्ुगम क्षेत्र के बच्चे भी हिन्दी के कुछ शब्द बोल लेते हैं और हिन्दी फिल्मी गीतों को गुनगुना लेते हैं। यह हाल है राजधानी काठमांडू एवं अन्य पहाडÞी शहरों के बच्चों का, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है।
जबकि, भारत के पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों से जुडÞे नेपाल के तर्राई क्षेत्रों के बच्चों की बात करें तो वह तो सुबह से शाम तक केवल हिन्दी भजन और पर््रार्थना ही सुनते हैं क्योंकि इस क्षेत्र के सभी मठ-मंदिरों में सुबह पांच बजे से ही हिन्दी भजनों के स्वर सुनाई देने लगते हंै। इसके अलावा हाल के वषर्ाें में तर्राई के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित एफ। एम। रेडियो स्टेशनों से भी वही भजन, कर्ीतन और हिन्दी फिल्मी गानों के स्वर उनके कानों में जाते हैं। साथ ही अपने आसपास के समाज में भी हिन्दी से मिलती-जुलती भाषाएं उन्हें सुनने को मिलती हैं। वैसे भी भारतीय सीमा से लगी, एक करोडÞ से भी अधिक आबादवाली नेपाल की पर्ूर्वी सीमा मेची नदी से पश्चिमी सीमा महाकाली नदी तक की १७५० किलोमीटर लम्बी और ४० किलोमीटर चैडÞी पट्टी -मधेश-तर्राई) के शत प्रतिशत लोगों की बोलचाल की भाषा ‘मैथिली, भोजपुरी और अवधि की संगम भाषा’ हिन्दी है। इसका सबसे बडÞा कारण सीमापार के भारतीय क्षेत्र में सघन आबादीवाले राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड अवस्थित हैं जिनकी ‘संगम-भाषा’ हिन्दी है। इन राज्यों से सैकडÞो वषर्ाें से बेटी-रोटी, नाना-नानी, चाचा-चाची, फुआ-फूफा, मौसा-मौसी, दादा-दादी, बहन-बहनोई, मामा-भांजा और साला-जीजा आदि रिश्तों के अत्यन्त ही सुमधुर संबंध हैं, जो दोनों देशों की भूमि और कानूनी सीमाओं को नहीं मानते।
इस दृष्टि से मनन करने पर ऐसा लगता है जिस प्रकार शरीर में प्राण और आत्मा विद्यमान है, फिर भी वह दिखता नहीं। ठीक उसी प्रकार ‘हिन्दी’ नेपाल के मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों और जजों की कलमों से भले ही नहीं लिखी जाती हांे, सरकारी दस्तावेजों में हिन्दी के वाक्य भले ही अंकित नहीं हों, स्कूल-काँलेजों में हिन्दी भले ही नहीं पढÞायी जाती हों -फिर भी नेपाल केे मंत्रियों, अफसरों, शिक्षक-शिक्षिकाओं, विद्यार्थियों से लेकर साग-सब्जी और चाट-पकौडÞे बेचनेवालों तक की जुवान पर हिन्दी है। यहां की आम जनता हिन्दी समझ, बोल, पढÞ और लिख सकने में सक्षम है। इस रूप में हिन्दी नेपाल में र्सवव्याप्त है, वह नेपाल की अन्तरात्मा है, जिसका भौतिक अस्तित्व भले ही नहीं दिखता हो लेकिन वह तो नेपाली नागरिकों के दिलो-दिमाग का हिस्सा बन चुकी है, जनजन की बोली बन चुकी है। हिन्दी नेपाल में र्सवव्याप्त है, चाहे इस तथ्य को ‘एक वर्गविशेष के शासक वर्ग’ और ‘शासक जातियां’ अपनीे ‘भारत-विरोधी राष्ट्रवाद’ के हठ के कारण भले ही स्वीकार नहीं करें।
स्मरणीय है कि राजा महेन्द्र ने १९५९ में नवस्थापित बहुदलीय-संसदीय प्रजातंात्रिक प्रणाली की निर्वाचित सरकार की हत्या कर दी और १९६५ में अमेरिकी सहयोग से शिक्षा मंत्रालय के अर्न्तर्गत ‘शिक्षा सामग्री केन्द्र’ स्थापित कर, इसी के माध्यम से देश भर के लिए नया पाठ्यक्रम लागू कर दिया जिसमें पर््राईमरी से लेकर हाई स्कूल और काँलेजों तक में हिन्दी के पठन-पाठन पर पाबन्दी लगा दी। तब से तानाशाही निर्दलीय पंचायती शासन के तीस वषर्ाें तक तो हिन्दी के पठन-पाठन पर पाबन्दी लगी ही रही, १९९० में नेपाली कांग्रेस-नेकपा -एमाले) के नेतृत्व में हुए जनआन्दोलन के बाद पुनर्स्थापित बहुदलीय संसदीय प्रजातांत्रिक सरकारों के कार्यकाल में भी वह पाबन्दी नहीं हटायी गई। और, आज गणतंत्र की स्थापना हो जाने के बाद भी हिन्दी पर लगी वह पाबन्दी कायम ही है जबकि वर्तमान सरकार में हिन्दीभाषी मधेशी नेताओं की लगभग आधे की हिस्सेदारी है।
एक कटु सत्य
सबसे बडÞा कटु सत्य तो यह है कि नेपाल के उन्हीं तथाकथित राष्ट्रवादियों और राजनीतिकर्मियों के आतंक से ग्रस्त, रोजगार की तलाश में भारत घुसे बेचारे दीनहीन नेपालियों को चाहे होटलों और चाय दुकानों में प्लेट धोने या वेटरों का काम करना पडÞता हो या उन्हें दरवान, चैकीदार, ड्राइवर एवं मुर्म्बई की ‘बहुमंजिली इमारतों में गार्ड की सलामी-ड्यूटी देनी पडÞती हो, मीठी हिन्दी ही उन्हें विश्वसनीय और लोकप्रिय बनाती हैं। भारत के निजी घरों में झाडÞू-पोछा, चैका वर्तन -सफाई) और भोजन पकानेवाली नेपाली माता-बहनों की हालत देखेंगे तो रोंगटे खडÞे हो जाएंगे लेकिन उनकी टूटी-फूटी मीठी हिन्दी ही उन्हें मालिकों के घर आए मेहमानों से अच्छी-खासी टिप्स और इनाम-बख्शीस दिलवाती हैं। इससे भी थोडÞा और अधिक गहर्राई में जाएं तो पाएंगे कि पर्ूर्वी, दक्षिणी और पश्चिमी सीमा पार करते ही, नेपाल के बडÞे से बडÞे भारत विरोधी, हिन्दी-विरोधी तथाकथित राष्ट्रवादी, माओवादी, समाजवादी, राजावादी और नेपाल में उत्पन्न दिन प्रतिदिन के राजनीतिक घटनाक्रमों को भारत के विस्तारवाद से जोडÞनेवाले ‘नेपाल-भक्त’ नेता भी, यह भूल जाते हैं कि वह नेपाल की धरती पर नहीं हैं, वह भारत की धरती पर आ चुके हैं, उन्हें ‘विदेश भारत’ में अन्तर्रर्ाा्रीय भाषा अंग्रेजी में बोलना चाहिए। क्योंकि, सीमा पार करते हुए उन्हें रिक्शा चालकों, बस कंडक्टरों, रेलवे स्टेशनों पर कुली से लेकर टिकट काउन्टरों, प्लैटफार्माें, टिकट चेकरों, रेल गार्डर्ाा और रेल के डब्बों में बैठे हिन्दीभाषी यात्रियों से ही पाला पडÞता है और वही टूटी-फूटी मीठी हिन्दी उनके मुंह से स्वतः फूट पडÞती है जिसके प्रति नेपाल में घृणा फैलाकर वह भारत की धरती पर पांव धरे होते हैं। क्योंकि, यदि वह हिन्दी नहीं बोलें तो उन्हें एक कप चाय, एक बोतल पानी और रेल डब्बों में भोजन तक नहीं मिले।
प्रधानमंत्री की “बूझ-पचायी” या “बर्ेर्-इमानी”
शायद उन्हीं संघषर्ाें के कारण नेपाल की नई गणतांत्रिक हवा में देश भर की राष्ट्रीय भाषाओं की जो एक मान्य-सूची बनायी गयी है उसमें हिन्दी को सोलहवें स्थान पर रखा गया है। फिर भी, ‘हिन्दी’, नेपाल के शासन, प्रशासन, सत्ता और राजनीति पर सैकडÞो वषर्ाें से केंचुली मारकर बैठे हुए एक वर्गविशेष के महानुभावों के गले के नीचे नहीं उतर पा रही है। यहां तक कि नई दिल्ली में शिक्षा पाए तथा लाखों व्यक्तियों की हत्या कर चीन की सत्ता पर कब्जा करनेवाले माओत्से तुंग के कठमुल्ले भक्त प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टर्राई भी हिन्दी के कट्टर विरोधी हैं। वह तो पत्रकार सम्मेलनों में भी हिन्दी में किए गए सवालों का जबाब भी नेपाली में ही देते हैं। लेकिन, पिछले दिनों जब वह तर्राई के सिरहा जिले के एक दलित परिवार में ‘रैन बसेरा’ कार्यक्रम के तहत रात बिताने गए तो वहां उपस्थित गांव के लोगों -मधेशियों) को उन्होंने हिन्दी में ही सम्बोधित किया, उनके बीच हिन्दी में ही भाषण किया और उनलोगों से हिन्दी में ही बातचीत भी की। स्पष्ट है कि यहां एक भाषा-विशेष की आडÞ में, सदियों से शासन पर जमे हुए भट्टर्राई जैसे ‘कठमुल्ले’ नेताओं और शासक वर्ग को नेपाल में हिन्दी की जडÞों की गहर्राई के बारे में जानकारी है, फिर भी वह ‘बूझ-पचाने’ -जानकर भी अनजान बनने) का काम करते आ रहे हैं।
नेपाल के शेक्सपियर “बालकृष्ण सम” और हिन्दी
हिन्दी के इसी महत्व को स्वीकार करते हुए नेपाल के ‘शेक्सपियर’ मानेजानेवाले महान साहित्यकार, नाटककार और कवि स्व. बालकृष्ण सम ने नई दिल्ली में १९६७ में भारत-नेपाल मैत्री संघ द्वारा आयोजित एक सम्मान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि ”यदि हिन्दी नहीं होती तो नेपाल में जागृति नहीं आती। वास्तविकता तो यह है कि देवकी नन्दन खत्री द्वारा लिखित उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता संतति’ को पढÞने की लालसा में ही हमलोगों ने, उस समय चोरी-छुपे हिन्दी पढÞना शुरु किया, जब नेपाल में पढÞने-लिखने पर पाबन्दी लगी हर्ुइ थी। और, कुछ साधन-सम्पन्न एवं साहसी लोग ही अपने बच्चों को पढÞने के लिए चोरी-छुपे पटना, बनारस एवं सीमापार के स्कूलों में भेज दिया करते थे जहां उनकी शिक्षा हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम से होती थी”।
‘भारत-नेपाल मैत्री संघ के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. ओमप्रकाश शर्मा की अध्यक्षता में संसद मार्ग चौक स्थित नेशनल काँमर्सियल बैंक बिल्डिंग के एक हाँल में आयोजित उक्त कार्यक्रम में महान कवि सम ने इसके साथ ही एक बहुत ही मार्मिक प्रश्न उठा डाला। उन्होंने आयोजकों को खडÞी-खोटी सुनाते हुए कहा ”यह जो भारत-नेपाल मैत्री संघ है, आखिर इसकी क्या जरूरत – मैत्री संघ तो वैसे दो देशों के बीच बनाया जाता है जहां यह खोजना पडÞता है कि दोनों देशों के बीच कौन-कौन सी समानताएं हैं, किन-किन विन्दुओं पर दोनों देश के लोगों की मैत्री हो सकती है – जबकि, भारत और नेपाल के बीच तो मैत्री की कोई जरूरत ही नहीं। भारत और नेपाल तो खून के रिश्ते से जुडÞा हुआ देश है, दोनों ही देशों में माता-पिता, भाई-बहन, साला-जीजा और मामा-भांजा का रिश्ता है। हम दोनों ही देशों के लोग अयोध्या के राम और जनकपुर की सीता, मथुरा वृन्दावन के कृष्ण और राधा, पशुपतिनाथ और विश्वनाथ, मुक्तिनाथ और कन्याकुमारी, अमरनाथ, द्वारिका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम् के उपासक हैं, हम सभी अपने को उन्हीं अवतारों और ऋषि-मुनियों की सन्तान मानते हैं, तो फिर हम मित्र कैसे हो सकते – हमलोग उससे कहीं अधिक उपर हैं। इसलिए इस भारत-नेपाल मैत्री संघ की क्या आवश्यकता” – इस पर सारा हाँल सन्न रह गया था और ओमप्रकाश शर्मा तो हत्प्रभ हो गए, उनका गला भर आया, कुछ भी नहीं बोल सके।
सन्त नेता कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई और हिन्दी

सन्त नेता कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई और हिन्दी

हिन्दी के उसी महत्व को आत्मसात करते हुए १९९० के जनआन्दोलन के बाद गठित अन्तरिम सरकार के प्रथम प्रधानमंत्री स्व. कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई ने भारतीय दैनिक नवभारत र्टाईम्स को एक विशेष भेंट में कहा था -”हिन्दी तो वह भाषा है जो न केवल पर्ूर्वी तर्राई से पश्चिम तर्राई तक के मैथिली, भोजपुरी, थारू और अवधीभाषी लोगों को एक दूसरे से जोडÞती है, बल्कि ‘पहाडÞ और तर्राई के निवासियों’ को भी हिन्दी ही एक दूसरे से जोडÞती है। क्योंकि, जब कोई पहाडÞी युवक तर्राई के शहरों में काम की तलाश में आता है तो वह अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में ही साहू-महाजनों से सर्म्पर्क किया करता है। वह न तो भोजपुरी-मैथिली-अवधि बोलता है और न ही वह नेपाली भाषा से काम चला पाता है क्योंकि उनकी मातृभाषाएं अलग अलग हुआ करती हैं। वास्तविकता तो यह है कि एकमात्र हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो नेपाल को भारत से सरकारी और जनस्तर तक जोडÞ पाने में सक्षम है”-नभाटा)।
रेडियो टी.वी. -दो दिलों की कडÞी
हिन्दी दिवस के अवसर पर, नेपाल के लगभग ४०० एफ.एम. रेडियो स्टेशन हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं जो अपने महत्वपर्ूण्ा प्रसारणों में हिन्दी सिनेमा के गीतों और कर्ण्र्ाा्रय भजनों से नेपाली तथा सीमा पार के लगभग २५ करोडÞ हिन्दीभाषी भारतीय श्रोताओं को चैबीसो घंटे सराबोर करते रहते हैं। इस क्रम में नेपाल के लगभग दो दर्जन से अधिक टेलीविजन चैनेलों के साथ ही दर्जनों भारतीय टी। वी। चैनेल एवं नेपाल के केबुल आँपरेटर भी साधुवाद के पात्र हैं जो अपने लोकप्रिय हिन्दी और नेपाली सिरियलों तथा फिल्मों के माध्यम से नेपाल और भारत के दो दिलों को जोडÞने का महान काम करते हैं, इस रूप में रेडियो टीवी दो दिलों की कडÞी बन गए हैं। ये विद्युतीय माध्यम न केवल नेपाल, अपितु विश्व भर में ‘सहज हिन्दी’ का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और हिन्दी सीखने, समझने और बोलने में महत्वपर्ूण्ा योगदान कर रहे हैं। ये न केवल ‘नेपाली और हिन्दी’ दोनों ही ‘सगी-भाषा बहनों’ को अत्यन्त निकट ला रहे हैं बल्कि नेपाल और भारत की उस धर्मप्राण जनता को भी एक दूसरे के और अधिक निकट लाने में महत्वपर्ूण्ा भूमिका निभा रहे हैं जिन्हें नेपाल और भारत के राजनीतिक उतार-चढÞाव की विडÞम्बना तो यह है कि नेपाल की सरकार या नेपाल के पर्यटन व्यावसायियों की ओर से हिन्दी में ऐसी कोई भी ‘गाईड-बुक’ प्रकाशित नहीं की गई है जिसके माध्यम से भारत से हर वर्षलाखों की संख्या में नेपाल आनेवाले तर्ीथयात्रियों और पर्यटकों कोे नेपाली तर्ीथ-स्थानों, पर्यटन स्थलों और नेपाली वांगमय का सहजर्-दर्शन-ज्ञान प्राप्त हो सके। जबकि, सरकार और पर्यटन व्यावसायी इस तथ्य को भली-भांति जानते हैं कि नेपाल और नेपाली जनता -पूरब, दखिन और पश्चिम, तीनों ओर से लगभग २५ करोडÞ उन भारतीयों से जुडÞे हुए हैं जिनकी आम बोलचाल की भाषा से लेकर पढर्Þाई-लिखाई तक की भाषा हिन्दी है और इन्हीं में से अधिकांश लोग नेपाल में तर्ीथ और पर्यटकीय स्थलों का दर्शन-भ्रमण के लिए नेपाल आया करते हैं।
विडम्बना तो यह है कि नेपाल की सरकार या नेपाल के पर्यटन व्यावसायियों की ओर से अभी तक हिन्दी में ऐसी कोई भी ‘गाईड-बुक’ प्रकाशित नहीं की गई है जिसके माध्यम से भारत से हर वर्षलाखों की संख्या में नेपाल आनेवाले तर्ीथयात्रियों और पर्यटकों कोे नेपाली तर्ीथ-स्थानों, पर्यटन स्थलों एवं नेपाली वांगमय का सहजर्-दर्शन-ज्ञान प्राप्त हो सके। जबकि, सरकार और पर्यटन व्यावसायी इस तथ्य को भली-भांति जानते हैं कि नेपाल और नेपाली जनता -पूरब, दखिन और पश्चिम, तीनों ओर से लगभग उन २५ करोडÞ भारतीयों से जुडÞे हुए हैं जिनकी आम बोलचाल की भाषा से लेकर पढर्Þाई-लिखाई तक की भाषा हिन्दी है और इन्हीं में से अधिकांश लोग नेपाल में तर्ीथ और पर्यटन स्थलों के दर्शन-भ्रमण के लिए नेपाल आया करते हैं। र्
दर्जनों भाषाओं का संगमस्थल -हिन्दी
‘वास्तविकता तो यही है कि हिन्दी न तो बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश और दिल्लीवालों की मातृभाषा है और न ही वह शासन की तलवार के बल पर जनजन तक पहुंची है। हिन्दी तो मैथिली, भोजपुरी, अवधी, र्ऊदू, फारसी, बंगला, पंजाबी, हरियाणवी, राजस्थानी, बंगाली, गुजराती और नेपाली आदि भाषाओं का संगम स्थल है। हिन्दी साहित्य से यदि सन्त तुलसी दास, सूरदास, मीरा बाई, तुकाराम और नरसि मेहता जैसे महान सन्त कवियों की रचनाओं और र्ऊदू-फारसी के शेरो-शायरी एवं सूफी सन्तों की रचनाओं को निकाल दिया जाए तो उसका -हिन्दी) कोई अस्तित्व नहीं बचेगा। हिन्दी की जननी भी वही संस्कृत है जो नेपाली भाषा की जननी है। इस रूप में हिन्दी और नेपाली तो सगी बहनें हैं। यह तो सभी जानते हैं कि ‘हिन्दी’ बहन के केवल छू देने मात्र से, नेपाली कलाकर मनीषा कोइराला कहां से कहां पहंुच गई – उन्होंने हिन्दी फिल्मों के माध्यम से ही न केवल भारत, अपितु विश्वभर के सिने जगत में भारी सोहरत पाया अपितु भारत के साथ ही नेपाल का नाम भी विश्व सिने जगत में रौशन कर दिया।
मालूम हो कि एक सौ बीस करोडÞ की आबादीवाला देश भारत, इन दोनों बहनों को एक साथ रखने की संवैधानिक व्यवस्था कर चुकी है और १९७७ के बाद नेपाली, भारतीय संविधान की आठवीं सूची का अभिन्न अंग बन चुकी है। वह भारतीय संविधान में सम्मानित स्थान पा चुकी है। हिन्दी और नेपाली के इन पवित्र एवं अक्षुण्ण संबंधों को यदि नेपाली शासक वर्ग महसूस कर, उसे तहे दिल से आत्मसात कर लें, तो नेपाल में न केवल भाषा और सर्म्पर्क-भाषा का विवाद सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाएगा बल्कि ‘हिन्दी’ और ‘नेपाली’ के संगम पर नेपाल और भारत, दोनों ही देशों का ‘देवनागरी-साहित्य’ फूलेगा, फलेगा और सहज मधुर शब्द भंडारों से दोनों ही साहित्य का भंडार भरेगा, दोनों ही साहित्य समृद्ध होगा, दोनों ही भाषाओं के विकास में चार-चांद लग जाएगा”। िि
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